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क्या है ‘Anti ambition’ ट्रेंड? प्रमोशन नहीं, मानसिक फ्लेक्सिबिलिटी को तरजीह, Gen Z री-डिफाइन कर रहा कॉरपोरेट करियर!

भारत समेत दुनिया भर में Gen Z प्रोफेशनल्स पारंपरिक कॉरपोरेट एंबिशन से दूरी बना रही है. सर्वे बताता है कि 52% युवा करियर ग्रोथ से ज्यादा इमोशनल स्टेबिलिटी को प्राथमिकता दे रहे हैं.

क्या है ‘Anti ambition’ ट्रेंड? प्रमोशन नहीं, मानसिक फ्लेक्सिबिलिटी को तरजीह, Gen Z री-डिफाइन कर रहा कॉरपोरेट करियर!
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( Image Source:  Sora AI )

कॉरपोरेट दुनिया में सालों तक एक ही मंत्र गूंजता रहा - तेज भागो, ऊपर चढ़ो, बड़ा टाइटल पाओ, लेकिन अब इस रेस ट्रैक पर एक नई पीढ़ी खड़ी है, जो पूछ रही है, “अगर इस दौड़ की कीमत मेरी नींद, मानसिक शांति और निजी जिंदगी है, तो क्यों भागूं?” यही सवाल ‘एंटी-एंबिशन’ (anti ambition ) ट्रेंड को जन्म दे रहा है. Gen Z के बीच उभरता यह ट्रेंड महत्वाकांक्षा से भागना नहीं, बल्कि उसे नए सिरे से परिभाषित करना है. प्रमोशन, कॉर्नर ऑफिस और हाई-पावर रोल की जगह अब मानसिक फ्लेक्सिबिलिटी, इमोशनल स्टेबिलिटी और वर्क-लाइफ बाउंड्री को तरजीह दी जा रही है. कई युवा प्रोफेशनल्स साफ कह रहे हैं कि अगर सफलता का मतलब लगातार बर्नआउट है, तो वह सफलता उन्हें मंजूर नहीं.

महामारी, छंटनी और आर्थिक अस्थिरता ने इस सोच को और मजबूत किया है. Gen Z ने अपने आसपास देखा कि सालों की वफादारी भी नौकरी की गारंटी नहीं देती. ऐसे में वे करियर को ‘लाइफ का हिस्सा’ मानते हैं, ‘लाइफ का केंद्र’ नहीं. उनके लिए एंबिशन अब सिर्फ ऊंचा पद नहीं, बल्कि ऐसी जिंदगी है जिसमें समय, संतुलन और मानसिक सुकून हो.

क्या बदल रहे काम के मायने?

‘एंटी-एंबिशन’ दरअसल कॉरपोरेट कल्चर के लिए एक वेक-अप कॉल है. यह बताता है कि नई पीढ़ी काम से दूरी नहीं बना रही, बल्कि काम के मायने बदल रही है. सवाल अब यह नहीं कि आप कितनी तेजी से ऊपर बढ़े, बल्कि यह है कि उस सफर में आपने खुद को कितना बचाए रखा.

क्या है ‘एंटी-एंबिशन’ ट्रेंड?

दशकों तक एंबिशन का मतलब था - तेज प्रमोशन, बड़ा पैकेज, कॉर्नर ऑफिस और बड़ी टीम. लेकिन अब Gen Z उस दौड़ से बाहर निकलती दिख रही है. वे महत्वाकांक्षा को छोड़ नहीं रहे, बल्कि उसे री-डिफाइन कर रहे हैं.

52% Gen Z क्यों चुन रही इमोशनल स्टेबिलिटी?

इंडिया टुडे ने हालिया वर्कफोर्स सर्वे के आधार पर बताया है कि 52% युवा इमोशनल स्टेबिलिटी को करियर ग्रोथ से ऊपर रखते हैं. 41% कम वेतन स्वीकार करने को तैयार हैं. अगर काम में मानसिक सुरक्षा और निश्चित घंटे मिलें. 47% कर्मचारी कॉरपोरेट सीढ़ी चढ़ने में रुचि नहीं रखते. यह संकेत है कि प्रमोशन अब सफलता का एकमात्र पैमाना नहीं रहा.

Gen Z जॉब हॉपिंग को ग्रोथ स्ट्रेटेजी क्यों मानती है?

20 की उम्र की शुरुआत में नौकरी बदलना अब अस्थिरता नहीं, बल्कि एक्सपेरिमेंट माना जा रहा है. HR विशेषज्ञों के अनुसार Gen Z एक ही कंपनी में टिके रहना 'लॉयल्टी नहीं, बल्कि रिस्क' मानती है. भारत में शुरुआती करियर में औसत नौकरी अवधि लगभग एक साल के आसपास सिमट रही है.

युवा कर्मचारी कॉरपोरेट रेस से बाहर क्यों हो रहे हैं?

  • कोविड-19 समेत दो-दो महामारी का अनुभव ने युवाओं को करियर को लेकर नई समझ दी है. Gen Z ने अपने सीनियर्स को बर्नआउट और छंटनी झेलते देखा है.
  • महंगाई, ऑटोमेशन और लेऑफ के डर ने स्थिरता को प्राथमिकता बना दिया.
  • Gen Z खुलकर कहती है कि वर्क कल्चर चिंता और डिप्रेशन से जुड़ा है.

‘ड्रीम जॉब’ का कॉन्सेप्ट क्यों कमजोर पड़ रहा है?

जेन जी के बीच एक प्रतिष्ठित संगठन में लंबी नौकरी अब अंतिम लक्ष्य नहीं रहा. कई युवा अब फ्रीलांसिंग, कंटेंट क्रिएशन, साइड हसल, एंटरप्रेन्योरशिप को करियर के साथ जोड़ना चाहते हैं.

एंटी-एंबिशन काम पर कैसा दिखता है?

एंटी एंबिशन का सबसे बेहतर लक्षण यह है कि युवा अब प्रमोशन को ठुकराने लगे हैं. अगर उसमें वर्क-लाइफ बैलेंस खराब हो. अतिरिक्त घंटे बिना अतिरिक्त वेतन के स्वीकार नहीं कर रहे हैं. केवल रोल की डिमांड तक काम करना पसंद कर रहे हैं. वो पर्सनल टाइम और बाउंड्री को प्राथमिकता देने लगे हैं.

क्या यह चेतावनी है या बदलाव का संकेत?

  • एम्प्लॉयर्स के लिए यह वेक-अप कॉल है. टाइटल और भविष्य के वादे अब पर्याप्त मोटिवेशन नहीं हैं.
  • युवाओं की प्राथमिकताएं पहले से अलग हैं. ट्रांसपेरेंट सैलरी, फ्लेक्सिबल ग्रोथ पाथ, आउटपुट-आधारित मूल्यांकन और मानसिक सुरक्षा सफलता की नई परिभाषा बन गई है.
  • Gen Z काम से भाग नहीं रही. वे ऐसे काम को ठुकरा रही हैं जो जीवन को खा जाए और बदले में कुछ न दे. कॉरपोरेट दुनिया में अब सवाल यह नहीं है कि आप कितनी ऊंचाई पर चढ़ते हैं बल्कि यह है कि वहां पहुंचकर आप कितने सस्टेनेबल तरीके से जी पाते हैं.
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