UPI हर जगह नहीं चलता! जानिए क्यों आज भी जेब में नगद रखना है जरूरी
आप अगर भारत के बड़े शहरों और कस्बों में रहते हैं तो जान लीजिए कि बढ़िया इंटरनेट कनेक्शन और सस्ते डाटा पैक की आपको मिलने वाली सुविधा यूरोप के कई विकसित देशों से काफी बेहतर है. इसके बावजूद जेब में कुछ नगदी रखना क्यों जरूरी है? जानिए नेटवर्क फेल, साइबर फ्रॉड, इमरजेंसी और भारतीय आदतों से जुड़ी अहम वजहें.
नेटवर्क गया तो डिजिटल पेमेंट गया. भारत में चाहे मेट्रो सिटी हो या कस्बा-नेटवर्क डाउन होना आम बात है. बात मंदिर में चढ़ावे की हो गया सब्जी मंडी, चायवाला, पानवाला, अचानक ऑटो/ई-रिक्शा वाला सभी को यूपीआई से पेमेंट करने के लोग आदी हो गए हैं. पर अचानक सर्वर डाउन हो जाए तो आज भी यह कहना पड़ता है 'भइया, नेटवर्क नहीं है.' यह डायलॉग सबसे आम है.
ऐसे में अगर कैश है तो काम चालू. कभी-कभी बड़े मौकों पर भी ऐसी घटनाएं होती हैं. इसलिए, जरूरी है कि आप अपने जेब कुछ नगदी जरूर रखें. ऐसा करने पर चिक-चिकबाजी बचने में मदद मिलती है, नहीं तो कई अजीबोगरीब स्थिति उत्पन्न हो जाती है, ऐसे में आपके पास असहज स्थिति का सामना करने के सिवाय और कोई चारा नहीं बचता है.
ऐसा नया साल हो, होजी, दिवाली, दशहरा, छठ, ईद, क्रिसमस डे पर भी होता है. बाजार में इस तरह की खरीददारी करते यूपीआर काम न करने पर मन में खीझ उत्पन्न होना स्वभाविक है. साथ ही मूड भी आफ होता है. अहम सवाल यह है कि जब सब कुछ डिजिटल है, तो फिर एक्सपर्ट आज भी क्यों कहते हैं, जेब में थोड़ी नगदी जरूर रखें? दरअसल, डिजिटल सुविधा के पीछे कुछ ऐसी हकीकतें छिपी हैं, जो इमरजेंसी में कैश को ही असली हीरो बना देती हैं.
यूपीआई के दौर में भी जेब में नगद क्यों रखें?
1. नेटवर्क फेल यानी डिजिटल फेल
भारत में नेटवर्क आज भी भरोसेमंद नहीं है. गांव, कस्बे, बेसमेंट, लिफ्ट, भीड़भाड़ वाले मेले जैसे मौके पर अक्सर जवाब मिलता है, “नेट नहीं आ रहा.” ऐसे में कैश ही तुरंत काम आता हैत्र
2. UPI सर्वर डाउन का खतरा
त्योहार, सैलरी डे या बड़े इवेंट के दौरान UPI स्लो होने पर ट्रांजैक्शन पेंडिंग दिखाने लगता है. पैसा आपके अकाउंट से कट जाता है, पर सामने नहीं पहुंचा. इन हालात में दुकानदार भी कहता है, “भैया कैश है तो दे दो.”
3. छोटे दुकानदार आज भी कैश पर निर्भर
भारत की असली अर्थव्यवस्था चलती है, ठेले, ऑटो, सब्जी मंडी, धार्मिक स्थलों व दैनिक जरूरतों की गतिविधियों से. यहां डिजिटल है, लेकिन भरोसा आज भी नगद पर.
4. साइबर फ्रॉड का डर
OTP, लिंक, QR स्कैम…, जैसी सुविधा डिजिटल में सुविधा है, लेकिन रिस्क भी है. कैश में न OTP, न हैकिंग, न सॉरी सर पैसा कट गया का झंझट. आप काम करते, आगे चल पड़ते हैं. फिर, नगद इमरजेंसी में कैश लाइफसेवर का काम करता है. अचानक फोन डिस्चार्ज हो जाए तो आप क्या करेंगे. न तो कैब वाले को पैसा दे पाएंगे, न मेट्रो का टिकट ले पाएंगे. कई बार तो ऐप ही लॉगआउट हो तो है. रेयर केस में कार्ड भी ब्लॉक हो जाता है.
5. डिजिटल से सुविधा, कैश से सुरक्षा
कहते हैं न कि 'टेक्नोलॉजी पर भरोसा रखो, पर बैकअप भी रखो.” ऐसा करने में आपकी सुरक्षा भी शामिल है. वैसे भी, भारत में शादी में नेग, पंडित जी की दक्षिणा, दरगाह, गुरुद्वारा और मंदिर में दान, कैश में देने की परंपरा का हिस्सा है. ऐसे मामलों में कैश ही चलता है. ऐसे मौकों पर जेब का 500–1000 रुपया होना, हनुमान जी जैसा संजीवनी बन जाता है. फिर कई बार खुद नहीं तो आपके जानकार भी यूपीआई काम न करने पर छोटी मोटी रकम मांगते मिल जाते है.





