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ओवैसी कैसे बनते जा रहे मुसलमानों के रहनुमा, AIMIM ने बदल दिया मुस्लिम राजनीति का खेल? किस-किसकी राजनीति खतरे में

पिछले कुछ सालों में असदुद्दीन ओवैसी सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि मुस्लिम राजनीति का तेज आवाज वाला ब्रांड बनते जा रहे हैं. तो क्या असदुद्दीन ओवैसी कैसे मुस्लिम राजनीति के पोस्टर बॉय बन गए हैं? अगर ऐसा है तो किस-किसकी राजनीति खतरे में है. जानें AIMIM का तेलंगाना से महाराष्ट्र, बिहार, यूपी तक विस्तार और सियासी असर.

AIMIM Asaduddin Owaisi Muslim politics
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एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी (असदुद्दीन Owaisi) अब सिर्फ हैदराबाद के सांसद नहीं, बल्कि मुस्लिम राजनीति (मुस्लिम Politics) का रहनुमा बनते जा रहे हैं. सवाल ये नहीं कि वो सत्ता में आएंगे या नहीं. सवाल ये है कि कांग्रेस, सपा, आरजेडी, बसपा, टीएमसी सहित बाकी पार्टियां मुस्लिम वोटर को फिर से भरोसा दिला पाएंगी? ओवैसी कैसे बनते जा रहे मुसलमानों के नए रहनुमा? कांग्रेस और सपा से हो गया है मुस्लिम वोटर का मोहभंग?

पिछले कुछ सालों में असदुद्दीन ओवैसी सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि मुस्लिम राजनीति का तेज आवाज वाला ब्रांड बनते जा रहे हैं. या फिर यूं कहें कि वो मुसलमानों के पोस्टर बॉय बनते जा रहे हैं. जहां कांग्रेस 'सॉफ्ट हिंदुत्व' और सपा 'चुप्पी की राजनीति' में उलझी दिखती है, वहीं ओवैसी खुले मंच से मुस्लिम अस्मिता, संविधान और अधिकारों की बात करते हैं. यही वजह है कि AIMIM अब सिर्फ हैदराबाद तक सीमित नहीं रही, उसका दायरा तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद से चलकर महाराष्ट्र, बिहार, यूपी तक अपना पांव पसार चुकी है.

हैदराबाद है उनकी राजनीति का गढ़

वैसे तो तेलंगाना ओवैसी का सियासी गढ़ माना जाता है. तेलंगाना विधानसभा में उनकी पार्टी के सात विधायक हैं. कई सालों से लगातार वह इस सीटों पर चुनाव जीतते आए हैं. लोकसभा चुनाव में हैदराबाद सीट असदुद्दीन ओवैसी लगातार जीतते आ रहे हैं. यह इलाका AIMIM की राजनीति का कोर बेस माना जाता है.

महाराष्ट्र में दिखा जलवा

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 में एआईएमआईएम 2 सीटें जीतने में कामयाब हुई थी. एआईएमआईएम ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2024 में सिर्फ एक सीट Malegaon Central (मालेगांव सेंट्रल) से चुनाव जीतने में कामयाब हुई. पार्टी के उम्मीदवार मुफ्ती मोहम्मद इस्माइल अब्दुल खलीक ने 162 वोटों के बेहद छोटे अंतर से जीत हासिल की. 16 सीटों पर पार्टी के प्रत्याशी चुनाव हार गए.

महाराष्ट्र के 29 नगर निगम (Municipal Corporations) चुनाव 2026 में ओवैसी की पार्टी AIMIM (एआईएमआईएम) शानदार प्रदर्शन किया है. एआईएमआईएम ने इन चुनावों में कुल 125 सीटों पर जीत दर्ज की है. यह पार्टी स्थानीय चुनावों में अपना अब तक का सबसे मजबूत प्रदर्शन दिखा रही है. खासकर मुस्लिम बहुल इलाकों में. छत्रपति संभाजीनगर (पूर्व में औरंगाबाद) में 24 सीटें जीतने में कामयाब रहीं. यहां पर AIMIM दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. मालेगांव में 20 सीटें, सोलापुर, धुले, नांदेड़ में 8-8 सीटें, अमरावती में 6 सीटें, ठाणे में 5 सीटें, नागपुर में 4 सीटें, बीएमसी में 9 सीटें जीतने में कामयाब हुई. कुल 13 नगर निगमों में पार्टी के प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की है. AIMIM ने पहली बार बीएमसी में जीत हासिल कर इतिहास रच दिया है. एक सीट पर एआईएमआईएम के टिकट पर हिंदू प्रत्याशी ने भी जीत हासिल की है.

बिहार में RJD को खतरा

बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में सीमांचल की 24 में से 5 सीटों पर जीत दर्ज की थी. 2025 में भी एआईएमआईएम पांच सीट जीतने में कामयाब हुई. जबकि 2020 में से जीते पांच में से चार 4 विधायक RJD में चले गए थे. बावजूद इसके सीमांचल में AIMIM ने कांग्रेस-RJD को बड़ा झटका दिया है.

यूपी में सपा-कांग्रेस और बसपा के लिए चुनौती

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में दो बार से ओवैसी काफी जोर लगा रहे हैं, लेकिन उन्हें अभी वहां पर सफलता नहीं मिल पाई है. हार के बावजूद एआईएमआईएम पूर्वांचल और पश्चिम यूपी में मुस्लिम बहुल सीटों पर सपा-कांग्रेस के वोट काटने में सफल हुई. यहीं वजह है कि ओवैसी को वोटकटवा कहा जाने लगा है.

किन मुद्दों को उठा बने मुसलमानों के रहनुमा?

CAA-NRC का सबसे मुखर विरोध ओवैसी ने ही किया था. ज्ञानवापी और बाबरी मसले का भी उन्होंने खुल्लम खुल्ला विरोध किया था. उन्होंने संविधान के दायरे में रहकर सवाल उठाए. हिजाब विवाद पर उन्होंने देश भर में घुमकर धार्मिक स्वतंत्रता को खतरे में डालने की दलील दी. इसी तरह मॉब लिंचिंग और बुलडोजर राजनीति, तीन तलाक कानून पर भी उन्होंने सवाल उठाए.

हरिद्वार में मुसलमानों पर बैन को कहा - तालिबानी सोच

हरिद्वार में धर्म संसद और मुसलमानों के प्रतिबंध पर ओवैसी ने कहा था कि ये तालिबानी सोच है. अगर संविधान है तो ऐसे फरमान नहीं चलेंगे. भारत किसी की जागीर नहीं है. इसी तरह की तीखी भाषा ओवैसी को युवाओं में लोकप्रिय बनाती है. इस भाषा का इस्तेमाल वो हैदराबाद से लेकर हर जगह, यहां तक कि संसद तक में इस्तेमाल करते हैं.

ओवैसी की पहचान किन बातों से बनी?

असदुद्दीन ओवैसी अपने धारदार भाषण का इस्तेमाल संविधान की व्याख्या, बिना घुमाए सीधे सवाल, बहुसंख्यक राजनीति को खुली चुनौती, मुस्लिम वोट बैंक को साधने के लिए करते हैं. वह अपने पक्ष में नैरेटिव तैयार करने के लिए ये भी कहते हैं कि इस देश में “हमारी बात कोई नहीं करता.” इसके अलावा, वो ये भी कहते हैं कि मुसलमानों को अपना नेता चुनना होगा. संविधान बनाम सत्ता की बहस में वह युवा मुस्लिमों को सीधा साथ देने की अपील करते हैं. उन्हें कहते हैं कि सोशल मीडिया पर आक्रामक मौजूदगी दर्शाए. स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय बनाएं. वह खुद को निडर नेता बताता हैं. ये भी कहते हैं कि मैं, किसी से डरने वाला नहीं. साथ ही राष्ट्रीयत के मसले पर पाकिस्तान के खिलाफ बोलने से भी परहेज नहीं करते.

ओवैसी किस-किस के लिए खतरा?

कई सालों से उनके इस आक्रामक रुख की वजह से ही वह कांग्रेस, सपा, आरजेडी, टीएमसी, आईयूएमएल, बीएसपी, आम आदमी पार्टी व अन्य क्षेत्रीय क्षत्रपों के लिए खतरा बनते जा रहे है. कांग्रेस से उसका पारंपरिक मुस्लिम वोट छीन रहे हैं. सपा और RJD को सीमांचल और यूपी में सीधा नुकसान पहुंचा रहे हैं. TMC के लिए वह बंगाल में भविष्य की चुनौती बन गए हैं. इस खास बात और है, वो यह है कि वह अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी के लिए लाभकारी साबित हो रहे हैं, क्योंकि AIMIM की वजह से हर जगह सेक्युलर वोट में बंटवारे के संकेत मिले हैं.

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