Begin typing your search...

जब-जब अमेरिका पर घिरती है मोदी सरकार, तब-तब क्यों उठता है 2013 का देवयानी मामला, मनमोहन सरकार ने ऐसे दिया था जवाब

तीन भारतीयों की मौत के बाद फिर चर्चा में आया देवयानी खोबरागड़े मामला. जानिए यूपीए और मोदी सरकार की अमेरिकी मुद्दों पर प्रतिक्रिया में क्या फर्क है.

जब-जब अमेरिका पर घिरती है मोदी सरकार, तब-तब क्यों उठता है 2013 का देवयानी मामला, मनमोहन सरकार ने ऐसे दिया था जवाब
X

तीन भारतीयों की मौत, भारतीय नाविकों वाले जहाजों पर लगातार हमले और भारत की ओर से सिर्फ औपचारिक कूटनीतिक विरोध, इन घटनाओं ने एक बार फिर 2013 के देवयानी खोबरागड़े प्रकरण की याद ताजा कर दी है. तब एक भारतीय राजनयिक के साथ कथित बदसलूकी पर दिल्ली से वॉशिंगटन तक राजनीतिक भूचाल आ गया था. आज सवाल यह है कि जब भारतीय नागरिक अपनी जान गंवा रहे हैं, तब क्या भारत की प्रतिक्रिया उतनी ही मुखर और सख्त दिखाई दे रही है?

खास बात यह है कि जैसे ही ऐसी घटनाएं होती हैं, राजनीतिक बहस में 2013 का देवयानी खोबरागड़े मामला फिर सामने आ जाता है. वजह सिर्फ घटना नहीं, बल्कि दोनों दौरों की प्रतिक्रिया की तुलना है. तो क्या दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी के नाम पर अमेरिका के प्रति नरम रुख अपनाया जा रहा है या फिर बदलती वैश्विक राजनीति ने भारत की कूटनीतिक भाषा और प्राथमिकताएं बदल दी हैं?

दरअसल, पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के बीच भारतीय नागरिकों की मौत और भारतीय नाविकों वाले जहाजों पर हमलों ने भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर एक बार फिर बहस छेड़ दी है. हाल के दिनों में अमेरिकी कार्रवाई में भारतीय नाविकों की मौत हुई है. जबकि MT Jalveer समेत भारतीय क्रू वाले जहाज भी प्रभावित हुए हैं. भारत ने औपचारिक विरोध दर्ज कराया है और अमेरिकी राजनयिक को तलब भी किया है.

क्या था देवयानी खोबरागड़े मामला?

साल 2013 में भारतीय राजनयिक Devyani Khobragade को न्यूयॉर्क में वीजा धोखाधड़ी और घरेलू कर्मचारी के वेतन संबंधी आरोपों में गिरफ्तार किया गया था. गिरफ्तारी के बाद उनके साथ स्ट्रिप-सर्च किए जाने और अपराधियों की तरह व्यवहार किए जाने के आरोप लगे, जिससे भारत में भारी राजनीतिक और कूटनीतिक आक्रोश पैदा हुआ.

उस समय भारत सरकार ने अमेरिकी राजनयिकों की कुछ विशेष सुविधाएं वापस लीं. अमेरिकी दूतावास के बाहर सुरक्षा बैरिकेड हटाए गए और अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के साथ कई भारतीय नेताओं ने मुलाकात करने तक से इनकार कर दिया. संसद से लेकर विपक्ष तक, लगभग पूरा राजनीतिक वर्ग एक स्वर में अमेरिका के खिलाफ खड़ा दिखाई दिया.

यूपीए सरकार का संदेश क्या था?

यूपीए सरकार का संदेश स्पष्ट था- मामला केवल एक अधिकारी का नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय गरिमा का है. तत्कालीन विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने सार्वजनिक रूप से कड़ा विरोध दर्ज कराया. अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी को भी खेद व्यक्त करना पड़ा. राजनीतिक रूप से यह वह दौर था जब भारत और अमेरिका के संबंध महत्वपूर्ण थे, लेकिन भारत ने सार्वजनिक रूप से नाराजगी दिखाने में संकोच नहीं किया.

आज का मामला अलग है या समान?

यहीं से बहस शुरू होती है. उस समय देवयानी मामला एक भारतीय राजनयिक के सम्मान और राजनयिक प्रतिरक्षा से जुड़ा विवाद था. दूसरी तरफ वर्तमान घटनाएं युद्धग्रस्त क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और समुद्री सुरक्षा से जुड़ी हैं, जिनमें भारतीय नागरिक हताहत हुए हैं. इसलिए दोनों मामलों की कानूनी और कूटनीतिक प्रकृति पूरी तरह समान नहीं है.

फिर भी, जब भारतीय नागरिकों की जान गई है, तब सरकार की प्रतिक्रिया और अधिक सार्वजनिक तथा आक्रामक दिखाई देनी चाहिए थी. वहीं, सरकार समर्थकों का कहना है कि आज भारत-अमेरिका संबंध रक्षा, तकनीक, व्यापार और इंडो-पैसिफिक रणनीति के स्तर पर कहीं अधिक गहरे हैं, इसलिए प्रतिक्रिया का तरीका भी अलग है.

क्या मोदी सरकार अमेरिका पर चुप है?

यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा कि भारत ने बिल्कुल चुप्पी साध रखी है. भारत ने अमेरिकी हमलों पर औपचारिक विरोध दर्ज कराया, अमेरिकी राजनयिक को तलब किया और भारतीय नाविकों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई. विदेश मंत्रालय ने क्षेत्र में तनाव कम करने और समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग भी की. हालांकि, राजनीतिक आलोचना यह है कि विरोध का स्वर उतना सार्वजनिक और टकरावपूर्ण नहीं दिखा जितना 2013 में दिखाई दिया था. यही तुलना विपक्ष और सरकार के आलोचक लगातार उठाते हैं.

मोदी सरकार पर अमेरिका को लेकर कब-कब सवाल उठे?

अमेरिका से जुड़े किन मुद्दों पर मोदी सरकार पर नरम रहने के आरोप लगते रहे हैं? विपक्ष और कई राजनीतिक विश्लेषक समय-समय पर कुछ मुद्दों पर सरकार की अपेक्षाकृत संयमित प्रतिक्रिया की ओर इशारा करते हैं.

1. खालिस्तानी गतिविधियां और प्रवासी नेटवर्क

अमेरिका और कनाडा में सक्रिय खालिस्तान समर्थक समूहों को लेकर भारत ने चिंता जताई, लेकिन आलोचकों का कहना है कि सार्वजनिक दबाव उतना तीखा नहीं दिखा, जितना होना चाहिए था.

2. भारत पर मानवाधिकार रिपोर्टें

अमेरिकी संस्थानों और विभागों की कई रिपोर्टों में भारत की आलोचना होती रही है. भारत आमतौर पर इन्हें खारिज करता है, लेकिन बड़े कूटनीतिक टकराव से बचता है.

3. व्यापार और वीजा विवाद

एच-1बी वीजा, व्यापार शुल्क और भारतीय कंपनियों पर अमेरिकी प्रतिबंधों जैसे मुद्दों पर भी भारत ने अक्सर बातचीत और वार्ता का रास्ता चुना है.

4. पश्चिम एशिया में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा

इराक, ईरान, यमन और अब खाड़ी क्षेत्र में तनाव के दौरान भारत ने आम तौर पर संतुलित कूटनीति अपनाई है, न कि किसी एक पक्ष के खिलाफ खुली राजनीतिक भाषा.

क्या 2013 वाला भारत और 2026 वाला भारत अलग है?

सबसे बड़ा अंतर यही है. 2013 में भारत-अमेरिका संबंध महत्वपूर्ण थे, लेकिन आज दोनों देश रक्षा सहयोग, सेमीकंडक्टर, तकनीक, चीन-नीति, इंडो-पैसिफिक सुरक्षा और निवेश के स्तर पर रणनीतिक साझेदार हैं. ऐसे में सरकारें अक्सर सार्वजनिक नाराजगी और वास्तविक कूटनीति के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती हैं.

लेकिन सवाल उठना भी स्वाभाविक है. जब भारतीय नागरिकों की मौत होती है, तब जनता यह तुलना जरूर करती है कि देवयानी मामले में राष्ट्रीय सम्मान के नाम पर जो आक्रोश दिखाई दिया था, क्या वैसी ही राजनीतिक दृढ़ता आज भी दिखाई देती है या नहीं?

यही वजह है कि अमेरिका से जुड़ा कोई भी विवाद सामने आते ही 2013 का देवयानी खोबरागड़े प्रकरण भारतीय राजनीतिक बहस में फिर जीवित हो जाता है.

मित्र देश की गलती पर भी मोदी सरकार खामोश क्यों?

यहां पर इस बात का जिक्र कर दें कि अच्छे संबंधों का मतलब यह नहीं होता कि एक देश दूसरे देश की हर कार्रवाई पर चुप्पी साध ले. अंतरराष्ट्रीय रिश्तों की असली परीक्षा तब होती है जब मित्र देशों के बीच मतभेद पैदा हों. यदि किसी अमेरिकी कार्रवाई में भारतीय नागरिकों की जान जाती है, भारत के हित प्रभावित होते हैं या उसकी संप्रभुता और सुरक्षा से जुड़े सवाल उठते हैं, तो भारत का कर्तव्य है कि वह स्पष्ट और मजबूत विरोध दर्ज कराए.

ऐसा इसलिए कि रणनीतिक साझेदारी का अर्थ बराबरी का संबंध होता है, न कि एक पक्ष के हर कदम को स्वीकार करना. दोस्ती तभी टिकाऊ मानी जाती है जब दोनों देश एक-दूसरे की चिंताओं का सम्मान करें.

नरेंद्र मोदीडोनाल्ड ट्रंपअमेरिका
अगला लेख