Explainer: 1931 से 2029- कैसे जातीय जनगणना ने बदल दिया BJP-Congress का पूरा सियासी खेल?
जातीय जनगणना पर बदले BJP और Congress के रुख की पूरी कहानी. जानिए 1931 से 2029 तक कैसे जाति के आंकड़े भारतीय राजनीति का नया केंद्र बन गए.
बिहार जातीय जनगणना 2023 और लोकसभा चुनाव 2024 के बाद भारतीय राजनीति में यदि कोई मुद्दा सबसे तेजी से राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आया है तो वह जातीय जनगणना है. एक समय ऐसा था जब कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही इस मुद्दे पर खुलकर आगे आने से बचती थीं, लेकिन अब स्थिति बदलती दिखाई दे रही है. विपक्ष लंबे समय से "जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी" का नारा देता रहा है, जबकि बीजेपी ने पिछले कुछ वर्षों से जातीय आंकड़ों के संग्रह को लेकर सकारात्मक रुख दिखाना शुरू कर दिया है. सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या बदल गया कि दशकों तक हाशिए पर रहा मुद्दा अब राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया? इतना ही नहीं, इसने BJP-Congress का पूरा सियासी खेल ही बदलकर रख दिया है.
यहां पर इस बात का जिक्र कर दें कि भारत में आखिरी बार सभी जातियों की विस्तृत गणना 1931 की जनगणना में हुई थी. आज भी अधिकांश राजनीतिक और सामाजिक चर्चाओं में ओबीसी आबादी के अनुमान के लिए 1931 के आंकड़ों का ही उपयोग किया जाता है.
कांग्रेस और बीजेपी दोनों इससे दूर क्यों रहीं?
कांग्रेस और बीजेपी लंबे समय तक राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी राजनीति करना चाहती थी. ताकि जातीय पहचान से ऊपर व्यापक सामाजिक गठबंधन तैयार कर सके. कांग्रेस की राजनीति लंबे समय तक "छत्रछाया गठबंधन" मॉडल पर आधारित रही, जिसमें दलित, मुस्लिम, आदिवासी और सवर्ण वर्गों का मिश्रण शामिल था. जातीय जनगणना से यह संतुलन प्रभावित होने का खतरा था.
दूसरी ओर बीजेपी हिंदुत्व और व्यापक हिंदू पहचान की राजनीति पर जोर देती रही. पार्टी का मानना था कि जातियों की विस्तृत गणना सामाजिक विभाजन को बढ़ा सकती है और "हिंदू एकता" के राजनीतिक संदेश को कमजोर कर सकती है.
क्षेत्रीय दल लगातार इसकी मांग क्यों करते रहे?
जातीय जनगणना की सबसे मुखर मांग हमेशा क्षेत्रीय दलों की ओर से आई है. Lalu Prasad Yadav, Nitish Kumar, Akhilesh Yadav और दक्षिण भारत के कई दल लंबे समय से कहते रहे हैं कि सामाजिक न्याय की नीतियां वास्तविक आबादी के आंकड़ों के आधार पर तय होनी चाहिए.
क्षेत्रीय पार्टियों को इसके पीछे तर्क रहा है कि जब तक यह नहीं पता होगा कि किस समुदाय की आबादी कितनी है, तब तक आरक्षण, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सरकारी योजनाओं का निष्पक्ष वितरण संभव नहीं होगा.
अब बीजेपी समर्थन में क्यों उतरी?
- पहला, 2024 के चुनावों में विपक्ष ने सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व का मुद्दा मजबूती से उठाया.
- दूसरा, बीजेपी अब केवल सवर्ण और शहरी वोटों की पार्टी नहीं रहना चाहती. पार्टी ने पिछले एक दशक में गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वर्गों में मजबूत आधार बनाया है. ऐसे में उसे लगता है कि जातीय आंकड़े इन वर्गों में अपनी राजनीतिक पहुंच साबित करने का अवसर भी बन सकते हैं.
- तीसरा, यदि जातीय जनगणना की मांग को पूरी तरह विपक्ष के हाथ में छोड़ दिया जाता है तो राजनीतिक लाभ भी विपक्ष को मिल सकता है. इसलिए बीजेपी अब इस मुद्दे पर रक्षात्मक नहीं बल्कि सक्रिय दिखाई देना चाहती है.
जातीय जनगणना से आखिर बदलेगा क्या?
जातीय जनगणना केवल आंकड़ों का मामला नहीं है, बल्कि यह नीति निर्माण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित कर सकती है. इससे ओबीसी आबादी के वास्तविक आंकड़े सामने आ सकते हैं. आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था पर नई बहस शुरू हो सकती है. सरकारी योजनाओं के लक्ष्य निर्धारण में बदलाव आ सकता है. राजनीतिक दल उम्मीदवार चयन की रणनीति बदल सकते हैं. विभिन्न जातीय समूहों की हिस्सेदारी की मांग तेज हो सकती है. यानी इसका प्रभाव प्रशासनिक, सामाजिक और राजनीतिक तीनों स्तरों पर पड़ सकता है.
बीजेपी और कांग्रेस का सियासी खेल कैसे बदल सकता है?
अगर जातीय आंकड़े सार्वजनिक होते हैं तो राजनीति का केंद्र केवल धर्म, विकास और नेतृत्व नहीं रहेगा, बल्कि प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी भी बड़ा मुद्दा बन जाएगी. कांग्रेस सामाजिक न्याय के एजेंडे को और आक्रामक तरीके से आगे बढ़ा सकती है. पार्टी पहले ही जातीय जनगणना को संसाधनों और अवसरों के न्यायपूर्ण वितरण का आधार बता चुकी है.
वहीं, बीजेपी की चुनौती यह होगी कि वह हिंदू एकता के अपने राजनीतिक नैरेटिव को बनाए रखते हुए विभिन्न पिछड़े वर्गों की आकांक्षाओं को भी संतुष्ट करे. पार्टी संभवतः "सामाजिक न्याय + विकास + हिंदू एकता" के संयुक्त मॉडल पर आगे बढ़े.
2029 का चुनाव ‘प्रतिनिधित्व बनाम पहचान’ ?
कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति का बड़ा विमर्श "प्रतिनिधित्व" बनाम "पहचान" के बीच हो सकता है. एक तरफ वे दल होंगे जो आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी की मांग को आगे बढ़ाएंगे, दूसरी तरफ वे दल होंगे जो व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय पहचान को प्राथमिकता देंगे. हालांकि व्यवहार में दोनों पक्षों को अंततः इन दोनों मुद्दों के बीच संतुलन बनाना पड़ेगा.
आंकड़ों से ज्यादा राजनीति का सवाल
जातीय जनगणना केवल जनसंख्या की गिनती नहीं है. यह सत्ता, प्रतिनिधित्व, संसाधनों के बंटवारे और राजनीतिक रणनीतियों का सवाल भी है. यही वजह है कि जो मुद्दा कभी क्षेत्रीय दलों तक सीमित माना जाता था, वह अब राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में पहुंच चुका है. आने वाले वर्षों में यह तय करेगा कि भारत की राजनीति विकास और पहचान के साथ-साथ प्रतिनिधित्व की नई बहस को किस तरह स्वीकार करती है.
भारत में जनगणना का इतिहास
1872 – पहली जनगणना की शुरुआत: ब्रिटिश भारत में पहली बार जनगणना का प्रयास किया गया. यह एकसमान और समकालिक जनगणना नहीं थी, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों में अलग समय पर हुई थी.
1881 – पहली नियमित राष्ट्रीय जनगणना: ब्रिटिश सरकार ने पूरे भारत में पहली व्यवस्थित और समकालिक जनगणना कराई. जाति संबंधी आंकड़े भी दर्ज किए गए.
1891 – दूसरी जनगणना: विभिन्न जातियों और उपजातियों का विस्तृत वर्गीकरण किया गया. प्रशासनिक उपयोग के लिए जातिगत डेटा एकत्र किया गया.
1901 – जाति आधारित वर्गीकरण पर जोर: जनगणना आयुक्त Herbert Hope Risley ने भारतीय समाज को जाति आधारित श्रेणियों में वर्गीकृत करने का प्रयास किया. जाति और सामाजिक पदानुक्रम को सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा बनाया गया.
1911 – जातिगत आंकड़ों का संग्रह जारी: ब्रिटिश शासन ने जातियों का विस्तृत रिकॉर्ड तैयार किया. प्रशासनिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े सवालों में इन आंकड़ों का उपयोग होने लगा.
1921 – जनगणना और सामाजिक प्रतिनिधित्व: जातीय आंकड़े राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी की बहस का आधार बनने लगे.
1931 – आखिरी पूर्ण जातीय जनगणना: ब्रिटिश भारत में सभी जातियों की विस्तृत गणना हुई. आज भी OBC आबादी के कई अनुमान 1931 की जनगणना पर आधारित हैं. यही वह जनगणना है जिसे जातीय आंकड़ों का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है.
1941 – युद्धकालीन जनगणना: द्वितीय विश्व युद्ध के कारण जनगणना हुई, लेकिन विस्तृत जातीय आंकड़े व्यवस्थित रूप से प्रकाशित नहीं किए गए.
इसलिए 1931 को आखिरी विश्वसनीय पूर्ण जातीय जनगणना माना जाता है.
स्वतंत्र भारत में क्या हुआ?
1951 – पहली भारतीय जनगणना: स्वतंत्र भारत ने निर्णय लिया कि केवल अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) का डेटा दर्ज किया जाएगा. अन्य जातियों की गणना बंद कर दी गई. 1961, 1971, 1981, 1991 और 2001 सभी जनगणनाओं में SC-ST का डेटा लिया गया. OBC और अन्य जातियों की अलग गणना नहीं हुई.
1979 – मंडल आयोग का गठन: पूर्व पीएम Morarji Desai सरकार ने पिछड़ा वर्ग आयोग (मंडल आयोग) बनाया. आयोग को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान का काम सौंपा गया.
1980 – मंडल आयोग रिपोर्ट: आयोग ने OBC आबादी लगभग 52% होने का अनुमान लगाया. यह अनुमान 1931 की जनगणना और अन्य आंकड़ों पर आधारित था.
1990 – मंडल आयोग लागू: V. P. Singh सरकार ने OBC आरक्षण लागू करने की घोषणा की. इसके बाद जातीय आंकड़ों की मांग और तेज हुई.
आधुनिक दौर की जातीय गणना.
2010 – जातीय जनगणना की मांग तेज: कई क्षेत्रीय दलों ने संसद में OBC की अलग गणना की मांग उठाई.
2011 – SECC (Socio-Economic and Caste Census): केंद्र सरकार ने सामाजिक-आर्थिक एवं जातीय जनगणना कराई. इसमें जाति संबंधी जानकारी जुटाई गई, लेकिन जातिगत आंकड़ों को त्रुटियों और वर्गीकरण संबंधी समस्याओं का हवाला देकर सार्वजनिक नहीं किया गया.
2015 – SECC का सामाजिक-आर्थिक डेटा जारी: गरीबी, आवास और सामाजिक स्थिति से जुड़े आंकड़े जारी हुए. जातीय डेटा जारी नहीं हुआ.
2021 – राष्ट्रीय जनगणना में जातीय गणना की मांग: कई राज्यों और क्षेत्रीय दलों ने केंद्र से OBC जातीय जनगणना कराने की मांग की. केंद्र सरकार ने संसद में कहा कि सामान्य जनगणना में OBC की अलग गणना नहीं होगी.
2022 – बिहार में जातीय सर्वेक्षण शुरू : Nitish Kumar सरकार ने राज्य स्तर पर जातीय सर्वेक्षण शुरू कराया.
2023 – बिहार जातीय सर्वेक्षण रिपोर्ट: बिहार सरकार ने जाति आधारित सर्वेक्षण के आंकड़े सार्वजनिक किए. रिपोर्ट के अनुसार राज्य में OBC और EBC की आबादी लगभग 63% से अधिक पाई गई. इसके बाद पूरे देश में जातीय जनगणना की बहस तेज हो गई.
2024 – लोकसभा चुनाव में बड़ा मुद्दा: Rahul Gandhi और कई विपक्षी दलों ने जातीय जनगणना को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया. "जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी" का नारा राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना.
2025–2026 – राष्ट्रीय स्तर पर नई बहस: जातीय जनगणना को लेकर केंद्र और राज्यों में राजनीतिक चर्चा तेज हुई. बीजेपी और कांग्रेस दोनों इस मुद्दे पर पहले की तुलना में अधिक सक्रिय दिखाई देने लगे.
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य
- भारत में आखिरी पूर्ण जातीय जनगणना 1931 में हुई थी.
- स्वतंत्र भारत में केवल SC-ST की नियमित गणना होती रही है.
- 2011 का SECC पहला बड़ा प्रयास था, लेकिन उसका जातीय डेटा सार्वजनिक नहीं किया गया.
- बिहार का 2023 जातीय सर्वेक्षण इस बहस का सबसे बड़ा आधुनिक आधार बना.
- जातीय जनगणना अब केवल सामाजिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा बन चुकी है.




