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Caste Census: जितनी आबादी, उतनी हिस्सेदारी? क्या 2029 का चुनाव Representation vs Population की होगी लड़ाई?

जातीय जनगणना और परिसीमन की बहस तेज है. क्या "जितनी आबादी, उतनी हिस्सेदारी" का सवाल 2029 के लोकसभा चुनाव में प्रतिनिधित्व बनाम आबादी का बड़ा मुद्दा बनेगा?

Caste Census: जितनी आबादी, उतनी हिस्सेदारी? क्या 2029 का चुनाव Representation vs Population की होगी लड़ाई?
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( Image Source:  ChatGpt )

देशभर में 2011 के बाद पहली बार जनगणना की प्रक्रिया शुरू होने के बाद से भारत की राजनीति में एक नई बहस तेजी से आकार ले रही है. दरअसल, 2026-27 की जनगणना, जातीय आंकड़ों की गिनती और उसके बाद संभावित परिसीमन (Delimitation) की प्रक्रिया केवल प्रशासनिक कवायद नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे आने वाले राजनीतिक शक्ति-संतुलन का आधार भी माना जा रहा है. सवाल यह है कि संसद में प्रतिनिधित्व का आधार केवल जनसंख्या होनी चाहिए या फिर उन राज्यों के विकास और जनसंख्या नियंत्रण की सफलता को भी महत्व मिलना चाहिए? यही बहस आने वाले वर्षों में “Representation vs Population” के रूप में राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकती है.

क्या संसद की बढ़ी सीटों तक पहुंची बहस?

"जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी" का नारा लंबे समय तक सामाजिक न्याय और आरक्षण की राजनीति से जुड़ा रहा है. लेकिन अब यह बहस संसदीय प्रतिनिधित्व तक पहुंचती दिखाई दे रही है. संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 के तहत लोकसभा सीटों का बंटवारा जनसंख्या के अनुपात में करने का सिद्धांत रखा गया था. इसी आधार पर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे अधिक आबादी वाले राज्यों का तर्क है कि संसद में उनकी सीटें भी आबादी के अनुसार बढ़नी चाहिए. डिलिमिटेशन कमिशन 2008 के मुताबिक वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटों के लिए हर पांच साल में एक बार चुनाव होता है. वर्तमान में सीटों की संख्या 1971 की जनगणना के आधार पर है.

परिसीमन क्यों राजनीतिक भूचाल ला सकता है?

भारत में सीटों के वितरण पर पहली बार 1976 में 42वें संविधान संशोधन के जरिए रोक लगाई गई थी. इसका उद्देश्य था कि परिवार नियोजन अपनाने वाले राज्यों को राजनीतिक नुकसान न हो. बाद में 84वें संविधान संशोधन (2001) के जरिए यह रोक 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक बढ़ा दी गई. इसका मतलब है कि 2027 की जनगणना के बाद परिसीमन की संवैधानिक प्रक्रिया शुरू होने का रास्ता खुल सकता है. यहां पर इस बात का भी जिक्र कर दें कि 84वें संविधान संशोधन ने सीटों के पुनर्वितरण पर लगी रोक को 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक बढ़ाया था.

दक्षिण को चुकानी पड़ेगी जनसंख्या नियंत्रण की कीमत?

तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों की चिंता यह है कि उन्होंने दशकों तक परिवार नियोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर निवेश करके जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया. यदि सीटों का पुनर्वितरण केवल आबादी के आधार पर हुआ तो इन राज्यों का संसद में अनुपातिक प्रभाव घट सकता है.

दक्षिण भारत के कई नेताओं ने पहले भी आशंका जताई है कि इससे राष्ट्रीय राजनीति में उनका प्रभाव कम हो सकता है, जबकि उत्तर भारत के राज्य सीटों में बढ़त हासिल कर सकते हैं. दक्षिणी राज्यों को डर है कि नई जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होने पर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों को ज्यादा सीटें मिल सकती हैं. हालांकि, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में दिए गए बयान में कहा था कि दक्षिण भारतीय प्रांतों की सीटों में कमी नहीं आएगी. उसमें बढ़ोतरी ही होगी, लेकिन इतना तय है कि औसतन कुछ न कुछ नुकसान तो होगा ही.

क्या मंडल पॉलिटिक्स की शुरुआत?

1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों ने भारतीय राजनीति को स्थायी रूप से बदल दिया था. अब कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि जातीय जनगणना और परिसीमन का संयोजन वैसा ही बड़ा राजनीतिक बदलाव ला सकता है. सरकार ने घोषणा की है कि 2027 की जनगणना में जातिगत आंकड़े भी शामिल किए जाएंगे. यह 1931 के बाद पहली बार होगा जब पूरे देश में व्यापक जातीय आंकड़े जुटाए जाएंगे.

यदि इन आंकड़ों को सार्वजनिक किया जाता है तो राजनीतिक दलों पर सामाजिक प्रतिनिधित्व के सवाल का दबाव बढ़ सकता है. तब केवल जाति नहीं, बल्कि क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व भी चुनावी बहस का हिस्सा बन जाएगा.

चुनाव Representation vs Population बन सकता है?

2024 तक राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र नेतृत्व, कल्याणकारी योजनाएं और विकास मॉडल रहे हैं. लेकिन 2029 तक तस्वीर बदल सकती है. यदि जनगणना के आंकड़े सामने आते हैं, जातीय संरचना पर नई बहस शुरू होती है और परिसीमन की प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो राजनीतिक दलों को यह स्पष्ट करना होगा कि लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व का आधार क्या होना चाहिए? क्या यह जनसंख्या, सामाजिक न्याय, क्षेत्रीय संतुलन या इन तीनों का मिश्रण होगा?

सिर्फ जनगणना नहीं, सियासी दिशा भी तय करेगी

2027 की जनगणना केवल आंकड़ों का संग्रह नहीं होगी. इसके साथ जुड़ी जातीय गणना, परिसीमन और संसदीय प्रतिनिधित्व की बहस आने वाले दशक की राजनीति की दिशा तय कर सकती है. एक तरफ "वन पर्सन, वन वोट, वन वैल्यू" का लोकतांत्रिक सिद्धांत होगा, तो दूसरी तरफ जनसंख्या नियंत्रण और विकास मॉडल के आधार पर राजनीतिक संतुलन बनाए रखने की मांग होगी. ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि 2029 का लोकसभा चुनाव विकास बनाम विपक्ष की लड़ाई से आगे बढ़कर "Representation vs Population" की सबसे बड़ी राजनीतिक बहस में बदल सकता है.

इस बार उठेगा आर्थिक न्याय का सवाल'

आरजेडी के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रोफेसर नवल किशोर यादव का मानना है कि आगामी जनगणना केवल आबादी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के आंकड़े सामने लाने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि देश की सामाजिक-आर्थिक असमानताओं पर भी नई बहस को जन्म दे सकती है. उनके अनुसार, इस बार चर्चा सिर्फ "Representation vs Population" की नहीं होगी, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि देश में किस वर्ग के पास कितनी संपत्ति और संसाधन हैं.

नवल किशोर यादव का कहना है कि जनगणना के आंकड़े यह स्पष्ट कर सकते हैं कि विभिन्न समुदायों और सामाजिक वर्गों के बीच आर्थिक असमानता कितनी गहरी है. ऐसे में सरकारों पर यह दबाव बढ़ेगा कि वे गरीबों, दलितों, पिछड़ों और निम्न आय वर्ग के लोगों के लिए नई नीतियां और कल्याणकारी योजनाएं लेकर आएं. उनका तर्क है कि बढ़ती आर्थिक विषमता देश के सामने एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है, इसलिए केवल राजनीतिक हिस्सेदारी नहीं, बल्कि आर्थिक हिस्सेदारी की बहस भी केंद्र में आनी चाहिए.

आरजेडी का मानना है कि जनगणना के बाद संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण जैसे मुद्दे राष्ट्रीय राजनीति के प्रमुख विषय बन सकते हैं. पार्टी इस बात पर जोर देगी कि गरीब और वंचित वर्गों को देश के संसाधनों में उनकी वास्तविक हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए.

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