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बिहार में जंगलराज, यूपी में गोलीकांड तो पंजाब में सिख दंगे... मुद्दे पुराने फिर भी BJP के लिए कैसे बने हुए हैं ओल्ड इज गोल्ड?

बिहार का जंगलराज, यूपी का अयोध्या गोलीकांड और 1984 के सिख दंगे बीजेपी के लिए आज भी बड़े सियासी हथियार हैं. जानिए पुराने मुद्दों के पीछे की चुनावी रणनीति.

बिहार में जंगलराज, यूपी में गोलीकांड तो पंजाब में सिख दंगे... मुद्दे पुराने फिर भी BJP के लिए कैसे बने हुए हैं ओल्ड इज गोल्ड?
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देश की राजनीति में इन दिनों दिलचस्प नजारा दिखाई दे रहा है. विपक्ष जब मौजूदा सरकारों से सवाल पूछता है तो बीजेपी उसके सामने इतिहास के पुराने पन्ने खोलकर रख देती है. तो क्या यह मान लें कि बीजेपी के विकास का एजेंडा काम नहीं कर रहा. ऐसा नहीं है तो फिर बीजेपी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जब योगी सरकार की खिलाफ आवाज ​बुलंद करती है तो बीजेपी 1990 में अयोध्या में कारसेवकों पर हुई पुलिस फायरिंग की याद दिलाती है. इसी तरह जब दिल्ली में वोट चोरी और एसआईआर के खिलाफ कांग्रेस के नेतृत्व में इंडिया ब्लॉक के नेता रैली करते हैं कि बीजेपी दिल्ली में 1984 के दंगों का दर्द निकालकर सामने लाती है. अब बिहार में सीएम सम्राट चौधरी अपराध और क्राइम के बयान पर फंसे तो भगवा पार्टी ने वहां पर लालू यादव के जंगलराज को उछाल दिया है.

इन तीनों घटनाओं का समय, परिस्थितियां और राजनीतिक संदर्भ अलग-अलग हैं, लेकिन बीजेपी की रणनीति में एक समानता दिखाई देती है. वह अपने विरोधियों के शासनकाल की उन घटनाओं को फिर से चर्चा में ला रही है, जिनकी यादें आज भी लोगों के बीच मौजूद हैं. सवाल यह है कि क्या बीजेपी सिर्फ इतिहास की याद दिला या गड़े मुर्दे उखाड़ कर जनता को सतर्क करना चाहती है या फिर मौजूदा राजनीतिक सवालों से ध्यान हटाकर विरोधियों को बचाव की मुद्रा में लाने की कोशिश कर रही है?

1990 की गोलीबारी को फिर क्यों बना रही है मुद्दा?

यूपी में बीजेपी ने समाजवादी पार्टी को घेरने के लिए अयोध्या में 30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 को हुई पुलिस फायरिंग का मुद्दा फिर उठा दिया है. उस समय मुलायम सिंह यादव प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन के तहत विश्व हिंदू परिषद, आरएसएस और बीजेपी के आह्वान पर बड़ी संख्या में कारसेवक पहुंचे थे. प्रशासन ने विवादित ढांचे की सुरक्षा के लिए कड़े इंतजाम किए थे. जब कारसेवकों ने आगे बढ़ने की कोशिश की तो पुलिस ने गोली चलाई.

इस गोलीकांड की घटना में कई कारसेवकों की जान गई. हालांकि मरने वालों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे होते रहे हैं. मुलायम सिंह यादव ने बाद में खुद 28 लोगों के मारे जाने की बात कही थी. इस घटना के बाद उनकी छवि को लेकर राजनीतिक विवाद भी खड़ा हुआ. उन्हें विरोधियों खासकर भाजपा वालों ने 'मुल्ला मुलायम' तक कहा.

अब बीजेपी इसी घटना को अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के खिलाफ इस्तेमाल कर रही है. बीजेपी मुजफ्तरनगर दंगे को भी याद दिलाना नहीं भूलती, सपा के जंगलराज को भी सामने लाने की कोशिश करती दिखाई देती है. बीजेपी की राजनीतिक बैठकों और नेताओं के भाषणों में 1990 की गोलीबारी का जिक्र किया जा रहा है. इसके जरिए अखिलेश यादव को अपने पिता के शासनकाल की कार्रवाई पर जवाब देने के लिए मजबूर किया जा रहा है.

बीजेपी के लिए इस मुद्दे का महत्व सिर्फ पुरानी घटना याद दिलाना नहीं है. इसके जरिए पार्टी राम मंदिर आंदोलन से जुड़ी अपनी राजनीतिक विरासत को भी दोबारा मजबूत करना चाहती है. दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी को ऐसी स्थिति में लाने की कोशिश है, जहां उसे अपने शासनकाल की घटनाओं पर सफाई देनी पड़े.

1984 के दंगों पर कांग्रेस को क्यों घेर रही है BJP?

दिल्ली में कांग्रेस के खिलाफ बीजेपी ने 1984 के सिख विरोधी दंगों का मुद्दा फिर से उठाया है. इसकी ताजा वजह एक नवंबर को इंडिया गठबंधन की रामलीला मैदान में हुई रैली भी बनी. यह रैली मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के विरोध में आयोजित की गई थी. इसी दिन बीजेपी ने वेस्ट दिल्ली के हरि नगर में कांग्रेस के खिलाफ विरोध मार्च निकाला और 1984 के दंगों के लिए माफी मांगने की मांग की.

दरअसल, 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके सिख अंगरक्षकों ने हत्या कर दी थी. इसके बाद दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में सिख समुदाय के खिलाफ हिंसा भड़क उठी. PUDR और ह्यूमन राइट वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में तीन दिनों के दौरान 2,733 लोगों की हत्या हुई. हिंसा में घरों और दुकानों को जलाया गया, लोगों को निशाना बनाया गया और बड़ी संख्या में परिवार बेघर हुए.

1984 दंगों में कांग्रेस के कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं की भूमिका पर गंभीर आरोप लगे. नानावटी आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में कुछ कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ मिले साक्ष्यों का जिक्र किया था. पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार को 2025 में दो सिखों की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई गई.

अब बीजेपी इस पूरे घटनाक्रम को कांग्रेस की राजनीति से जोड़कर उछाल रही है. एक नवंबर को केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और बीजेपी के अन्य नेताओं ने विरोध मार्च में हिस्सा लिया. बीजेपी ने कांग्रेस से माफी की मांग की.

ऐसा क्यों करती है बीजेपी?

गड़े मुर्दों का उखाड़कर बीजेपी को दो तरह का राजनीतिक फायदा मिलता है. पहला, सिख समुदाय के बीच कांग्रेस के खिलाफ पुराने जख्मों को फिर चर्चा में लाना. दूसरा, जब विपक्ष लोकतंत्र और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहा हो, तब कांग्रेस को उसके पुराने शासनकाल के सवालों पर जवाब देने के लिए मजबूर करना.

जंगलराज की याद दिला क्या हासिल करना चाहती है?

बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव के शासनकाल को जंगलराज बताना बीजेपी और एनडीए की पुरानी रणनीति रही है. 1990 में लालू प्रसाद यादव पहली बार मुख्यमंत्री बने थे. उनका शासनकाल 1990 से 1997 तक रहा. इसके बाद चारा घोटाले में नाम आने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा और उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया. हालांकि सत्ता की राजनीतिक कमान लंबे समय तक लालू परिवार के पास ही रही.

लालू के शासनकाल को लेकर अपहरण, फिरौती, जातीय हिंसा, अपराध और कमजोर कानून व्यवस्था जैसे मुद्दे लगातार उठते रहे. उस दौर में बिहार में कई बड़े नरसंहार हुए. 1992 का बारा नरसंहार, 1996 का बथानी टोला नरसंहार और 1997 का लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार राज्य की कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करने वाली घटनाएं थीं.

इसके अलावा, 1996 में चारा घोटाला सामने आया. पशुपालन विभाग में फर्जी बिल और गैर-मौजूद आपूर्तिकर्ताओं के नाम पर सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये निकाले गए थे. इस मामले में लालू प्रसाद यादव के खिलाफ भी मुकदमे चले और उन्हें अलग-अलग मामलों में दोषी ठहराया गया.

बीजेपी ने इन घटनाओं को लालू परिवार की राजनीति से जोड़कर जंगलराज का नैरेटिव तैयार किया. 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में भी एनडीए ने इसी मुद्दे को खूब उठाया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर नीतीश कुमार तक ने अपनी सभाओं में लालू-राबड़ी शासनकाल की याद दिलाई. जनता को बताया गया कि अगर आरजेडी सत्ता में आती है तो बिहार फिर उसी दौर में लौट सकता है.

यहां बीजेपी की रणनीति समझना जरूरी है. नीतीश कुमार लंबे समय तक सत्ता में रहे और सरकार के खिलाफ स्वाभाविक नाराजगी भी हो सकती थी. ऐसे में एनडीए ने चुनाव को सिर्फ अपने कामकाज के आधार पर नहीं रखा, बल्कि मतदाताओं के सामने एक दूसरा सवाल भी खड़ा किया कि अगर सरकार बदली तो क्या पुराने दौर की वापसी होगी?

BJP को क्या फायदा मिलता है?

यूपी, बिहार पंजाब और दिल्ली की राजनीति को देखें तो बीजेपी की राजनीति का एक ही पैटर्न उभरकर सामने आया है. वह विरोधियों के शासनकाल की ऐसी घटनाएं चुनती है, जिनसे लोगों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं. फिर उन घटनाओं को मौजूदा राजनीतिक बहस का हिस्सा बना देती है.

पहला फायदा यह है कि इससे विपक्ष बचाव की मुद्रा में आ जाता है. जब बीजेपी समाजवादी पार्टी से 1990 की गोलीबारी पर सवाल करती है तो अखिलेश यादव को अपने पिता के शासनकाल की कार्रवाई पर जवाब देना पड़ता है. जब कांग्रेस से 1984 के दंगों पर सवाल होता है तो राहुल गांधी और उनकी पार्टी को अपने पुराने नेताओं की भूमिका पर सफाई देनी पड़ती है. इसी तरह आरजेडी को जंगलराज के आरोपों का जवाब देना पड़ता है.

दूसरा फायदा यह है कि बीजेपी अपनी सरकारों के कामकाज की तुलना पिछली सरकारों से कर पाती है. उत्तर प्रदेश में माफिया के खिलाफ कार्रवाई, राम मंदिर और कानून व्यवस्था को इसी तुलना के साथ पेश किया जा रहा है. बिहार में भी एनडीए अपनी सरकार के कामकाज को लालू-राबड़ी शासनकाल से बेहतर बताता रहा है.

तीसरा फायदा भावनात्मक मुद्दों के जरिए मतदाताओं को जोड़ने का है. राम मंदिर आंदोलन, सिख विरोधी हिंसा और जंगलराज जैसे मुद्दे केवल राजनीतिक घटनाएं नहीं हैं. इनसे अलग-अलग समुदायों और परिवारों की यादें जुड़ी हैं. बीजेपी इन मुद्दों के जरिए अपने समर्थकों को एकजुट रखने और विरोधियों के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश करती है.

इसके अलावा ऐसा करने के पीछे बीजेपी का मुख्य मकसद पुराने मुद्दों को उठाने से मौजूदा राजनीतिक बहस का रुख बदलना भी हो सकता है. जब विपक्ष बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और सरकारी कामकाज पर सवाल उठाता है तो पुराने मुद्दों को सामने रखकर बहस का केंद्र बदला जा सकता है. इससे सरकार के सामने मौजूद सवालों का दबाव कुछ हद तक कम हो सकता है.

क्या पुराने मुद्दों के सहारे होगी 2027 की सियासी लड़ाई?

बीजेपी की यह रणनीति उसके लिए नई नहीं है, लेकिन 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को देखते हुए इसकी अहमियत बढ़ गई है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार करीब दस साल पूरे करने जा रही है. ऐसे में पार्टी के सामने अपने कामकाज का हिसाब देने की चुनौती भी होगी. सिर्फ पिछली सरकारों की गलतियां गिनाकर जनता को लंबे समय तक संतुष्ट रखना आसान नहीं होगा.

असल में लोकतंत्र में पुरानी सरकारों के कामकाज का हिसाब मांगना गलत नहीं है. 1984 के दंगों के पीड़ितों को न्याय मिलना चाहिए, अयोध्या गोलीकांड पर सवाल उठना चाहिए और बिहार के पुराने अपराधों की चर्चा भी होनी चाहिए. लेकिन यही सवाल मौजूदा सरकारों से भी पूछे जाने चाहिए. आखिर जनता को सिर्फ यह नहीं जानना कि पहले क्या गलत हुआ था, बल्कि यह भी जानना है कि आज क्या सही हो रहा है और क्या नहीं.

यही बीजेपी की रणनीति की असली परीक्षा होगी. पुराने जख्म कुरेदकर विरोधियों को घेरा जा सकता है, लेकिन चुनाव में जनता को अपने कामकाज का जवाब भी देना पड़ता है.

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