किस्से नेताओं के: लंदन का बैरिस्टर, नक्सल आग के बीच खड़ा वो नेता, जिसने कांग्रेस का किला गिरा दिया - Jyoti Da की कहानी
नक्सलबाड़ी आंदोलन के दौर में उभरे ज्योति बसु ने कैसे बंगाल में कांग्रेस को हराया और 23 साल सत्ता में रहकर राजनीति की दिशा बदल दी, जानिए उनकी कहानी.
ज्योति बसु (Jyoti Basu) भारत, खासकर पश्चिम बंगाल की राजनीति का वो नाम, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता. उनकी कहानी सिर्फ एक नेता की जीवनी नहीं है, बल्कि यह उस पूरे दौर की कहानी है, जब पश्चिम खास राजनीतिक विचारधार और हिंसा का राज था. हिंसक आंदोलन के दौर में बंगाल में कांग्रेस का राज था. यह वह समय था जब एक तरफ कांग्रेस की मजबूत पकड़ थी और दूसरी तरफ वामपंथ धीरे-धीरे एक वैकल्पिक शक्ति के रूप में उभर रहा था. इस बदलाव के केंद्र में एक शांत लेकिन बेहद प्रभावशाली नेता थे, जिन्हें लोग “ज्योति दा” कहते थे, जिन्होंने सत्ता से नेहरू और इंदिरा के कांग्रेस को 1977 में ऐसे बेदखल कि पांच दशक बाद भी वो सत्ता में अभी तक लौट नहीं पाई. आइए, जानतें हैं बंगाल में 23 साल तक लगातार सीएम रहे और सीपीआईएम द्वारा पीएम पद पर काबिज होने का चांस को गंवाने वाली घटना को हिस्टोरिक ब्लंडर कहने वाले ज्योति बसु की.
ज्योति दा एक ऐसे शख्स थे, जिनको लेकर कई लेखकों ने पुस्तकों लिखीं. शुताता पॉल की पुस्तक - दीदी द अनटोल्ड ममता बनर्जी में भी उनके साइलेंट पॉलिटिक्स की चर्चा है. इस पुस्तक में पॉल ने लिखा है कि ज्योति ऐसे नेता, जिसे कांग्रेस का एक बड़ा तबका भी सीएम पद से नहीं हटाना चाहता था. जिसका विरोध ममता बनर्जी ने किया तो उनके सामने ऐसी स्थिति की, उन्होंने कांग्रेस छोड़कर टीएमसी पार्टी बना ली. वह पिछले 15 साल से सीएम हैं और चौथी बार सत्ता में वापसी के लिए चुनावी मैदान में हैं. इसके अलावा ज्योति दा का जिक्र डिटेल में जॉर्ज मैथ्यू की पुस्तक ज्योति बसु: एक राजनीतिक जीवनी, रामचंद्र गुहा की इंडिया आफ्टर गांधी, फ्रैन्सीन आर. फ्रैंकल की बुक भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था 1947–2004 और प्रकाश सिंह की पुस्तक भारत में नक्सलवादी आंदोलन सहित कई किताबों में उनके बारे में जिक्र है.
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1. लंदन का छात्र कैसे बना विचारधारा का क्रांतिकारी?
पश्चिम बंगाल के पूर्व सीएम ज्योति बसु का जन्म 1914 में कोलकाता में एक संपन्न परिवार में हुआ. पिता डॉक्टर थे और घर में किसी तरह की आर्थिक कमी नहीं थी. शुरुआती जीवन सामान्य और सुविधाजनक था, लेकिन उनकी सोच आगे चलकर पूरी तरह असामान्य बन गई.
उच्च शिक्षा के लिए वे लंदन गए. यहीं उनका जीवन बदल गया. लंदन में उन्होंने कानून की पढ़ाई की, लेकिन असली शिक्षा किताबों से ज्यादा विचारों की दुनिया में मिली. उन्होंने देखा कि औद्योगिक समाज में अमीरी और गरीबी के बीच कितनी गहरी खाई है.
यहीं से उनका संपर्क वामपंथी विचारधारा से हुआ. वे कम्युनिस्ट पार्टी आफ ब्रिटेन से जुड़े और मार्क्सवादी विचारों को गहराई से समझने लगे. यही वह मोड़ था, जिसने उनके जीवन की दिशा बदल दी.
2. राजनीति में पहला कदम कैसे रखा?
ब्रिटेन से भारत लौटने के बाद ज्योति बसु ने सीधे सत्ता की राजनीति में प्रवेश नहीं किया. उन्होंने जमीन से जुड़ी राजनीति चुनी और वो राजनीति थी ट्रेड यूनियन आंदोलन की. 1946 में वे बंगाल विधानसभा के सदस्य बने. उस समय राजनीति में कांग्रेस का दबदबा था, लेकिन बसु ने मजदूरों और आम जनता के मुद्दों को मजबूती से उठाना शुरू किया. रेलवे मजदूरों, फैक्ट्री कर्मचारियों और शहरी गरीबों के बीच उनकी पकड़ मजबूत होने लगी. वे धीरे-धीरे विपक्ष के सबसे मजबूत चेहरों में गिने जाने लगे.
3. नक्सलबाड़ी आंदोलन ने बंगाल को कैसे बदल दिया?
1967 में Naxalbari uprising ने बंगाल की राजनीति को हिलाकर रख दिया था. यह आंदोलन किसानों और ग्रामीण गरीबों द्वारा जमीन के अधिकार के लिए शुरू हुआ था, लेकिन जल्द ही यह सशस्त्र संघर्ष में बदल गया. राज्य में हिंसा, डर और राजनीतिक अस्थिरता फैल गई. वामपंथी विचारधारा के भीतर भी दो धड़े बन गए. एक जो सशस्त्र संघर्ष का समर्थन करता था और दूसरा जो लोकतांत्रिक रास्ते पर विश्वास रखता था.
ज्योति दा स्पष्ट रूप से हिंसा का विरोध किया. उनका मानना था कि समाज में बदलाव बंदूक से नहीं, बल्कि जनता के संगठन और चुनावी प्रक्रिया से आएगा. यही फैसला आगे चलकर उनकी राजनीतिक पहचान बन गया.
4. कांग्रेस का दबदबा कैसे टूटा और वाम मोर्चा कैसे बना सिरमौर?
1970 के दशक में पश्चिम बंगाल की स्थिति बेहद खराब हो गई थी. बेरोजगारी, प्रशासनिक अव्यवस्था और राजनीतिक हिंसा ने लोगों का भरोसा तोड़ दिया था. ठीक उसी समय वामपंथी दलों ने मिलकर एक मजबूत गठबंधन बनाया, जिसे लेफ्ट फ्रंट (West Bengal) कहा गया. सीपीआई (Marxist) इस गठबंधन की सबसे बड़ी ताकत बनी. ज्योति बसु ने संगठन को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई. उन्होंने गांव-गांव पार्टी ढांचा खड़ा किया, मजदूर संगठनों को मजबूत किया और पंचायत स्तर तक राजनीतिक नेटवर्क बनाया. यही रणनीति कांग्रेस के खिलाफ सबसे बड़ी ताकत साबित हुई.
5. 1977 में बंगाल में सत्ता परिवर्तन कैसे हुआ?
1977 भारतीय राजनीति का ऐतिहासिक वर्ष था. इसी साल वाम मोर्चा ने भारी जीत हासिल की और पश्चिम बंगाल में सत्ता बदल गई. Jyoti Basu मुख्यमंत्री बने. यह सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं थी, बल्कि एक पूरी राजनीतिक व्यवस्था के बदलने का संकेत था. लोगों ने पहली बार देखा कि कोई वैकल्पिक विचारधारा भी लंबे समय तक शासन कर सकती है. कांग्रेस का लगभग एकछत्र राज समाप्त हो गया.
6. 23 साल का शासन: उपलब्धियां और विवाद क्या थे?
ज्योति बसु ने 1977 से 2000 तक मुख्यमंत्री के रूप में लंबे समय तक शासन किया. यह भारत के सबसे लंबे मुख्यमंत्रित्व कालों में से एक था. उन्होंने ग्रामीण सुधारों पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया. “ऑपरेशन बर्गा” जैसी नीतियों ने किसानों को जमीन पर अधिकार दिया. पंचायत व्यवस्था को मजबूत करके उन्होंने गांवों में लोकतंत्र को गहराई दी. ग्रामीण बंगाल में उनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई. गरीब और किसान वर्ग उन्हें अपना नेता मानने लगे.
हालांकि, उनके शासन की आलोचना भी हुई. औद्योगिक विकास धीमा रहा और निजी निवेश सीमित हो गया. ट्रेड यूनियनों का अत्यधिक प्रभाव भी एक बड़ी समस्या माना गया. इस कारण बंगाल की औद्योगिक प्रगति प्रभावित हुई.
7. पीएमका मौका क्यों चूक गए, क्यों कहा historic blunder?
1996 में भारतीय राजनीति में बड़ा मोड़ आया. ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला, लेकिन उनकी ही पार्टी यानी सीपीआईएम ने इसे स्वीकार नहीं किया. पार्टी के फैसले के कारण यह ऐतिहासिक अवसर हाथ से निकल गया. बाद में बसु ने स्वयं इसे “historic blunder” कहा. यह घटना भारतीय राजनीति में आज भी चर्चा का विषय है, क्योंकि यह बताती है कि व्यक्तिगत क्षमता और पार्टी राजनीति के बीच कितना बड़ा अंतर हो सकता है.
8. ज्योति बसु की राजनीति इतनी अलग क्यों थी?
ज्योति बसु की राजनीति की सबसे बड़ी खासियत उनकी स्थिरता और रणनीतिक सोच थी. वे भीड़ जुटाने वाले नेता नहीं थे, बल्कि संगठन बनाने वाले नेता थे. उन्होंने शोर की राजनीति की जगह संरचना की राजनीति को चुना. वे लोगों को सुनते ज्यादा थे, बोलते कम थे और निर्णय बेहद सोच-समझकर लेते थे. यही कारण था कि वे इतने लंबे समय तक सत्ता में बने रहे.
9. “ज्योति दा” क्यों याद किए जाते हैं?
बंगाल के पूर्व सीएम ज्योति बसु की कहानी हमें यह सिखाती है कि राजनीति सिर्फ भाषणों या लोकप्रियता का खेल नहीं है. यह संगठन, धैर्य और रणनीति का भी खेल है. उन्होंने दिखाया कि बदलाव के लिए हिंसा जरूरी नहीं, अगर संगठन मजबूत हो और सोच स्पष्ट हो. उन्होंने कांग्रेस के लंबे शासन को चुनौती दी और पश्चिम बंगाल की राजनीति को नई दिशा दी.
Jyoti Basu केवल एक नेता नहीं थे, बल्कि एक ऐसे सिस्टम बिल्डर थे जिन्होंने आंदोलन को संगठन में और संगठन को स्थायी सत्ता में बदला. उनकी राजनीति शोर से नहीं, बल्कि रणनीति और स्थिरता से चलती थी. यही उन्हें बाकी नेताओं से अलग बनाता है. उनकी विरासत आज भी यही सवाल छोड़ती है. क्या सत्ता बदलने के लिए करिश्मा जरूरी है, या सिर्फ सही रणनीति ही काफी है?
Jyoti Basu के 10 अनसुने किस्से
ICS छोड़कर “क्रांति” का रास्ता चुना : लंदन में पढ़ाई के दौरान Jyoti Basu ने इंडियन सिविल सर्विस (ICS) की तैयारी शुरू की थी, जो उस दौर में सबसे प्रतिष्ठित करियर माना जाता था, लेकिन उन्होंने बीच में ही यह रास्ता छोड़ दिया. वजह सिर्फ करियर बदलना नहीं थी, बल्कि सोच का बदलाव था. उनका मानना था कि सत्ता का हिस्सा बनकर नहीं, बल्कि व्यवस्था को बदलकर ही असली परिवर्तन लाया जा सकता है.
कम्युनिस्ट लेकिन “इंग्लिश जेंटलमैन” : वामपंथी नेता होने के बावजूद उनका व्यक्तित्व पारंपरिक कम्युनिस्ट नेताओं जैसा नहीं था. वे अक्सर सूट-बूट पहनते, पाइप पीते और अंग्रेजी में धाराप्रवाह बोलते थे. विरोधियों को यह विरोधाभास लगता था, लेकिन यही उनका अलग आकर्षण भी था. विचारधारा में सख्त, लेकिन व्यक्तित्व में पूरी तरह से मैच्योर.
रेलवे प्लेटफॉर्म से की राजनीति की शुरुआत : Jyoti Basu ने अपनी राजनीति बड़े मंचों से नहीं, बल्कि रेलवे कर्मचारियों और मजदूरों के बीच से शुरू की. वे प्लेटफॉर्म पर बैठकर मीटिंग करते, रात-रात भर यूनियन चर्चाएं चलतीं. यही वह दौर था जिसने उन्हें “ज्योति दा” बनाया. एक ऐसा नेता जो सीधे जनता से जुड़ा हुआ था.
नक्सलबाड़ी के दौर में पकड़ी अहिंसा की राह : 1967 के Naxalbari uprising के समय जब कई वामपंथी नेता सशस्त्र संघर्ष की ओर झुक रहे थे, तब Jyoti Basu ने लोकतांत्रिक रास्ता चुना. उनका स्पष्ट मानना था कि बदलाव बंदूक से नहीं, बल्कि बैलेट से आएगा. यह निर्णय उनकी राजनीति की सबसे बड़ी पहचान बन गया.
ट्रेन यूनियन के खिलाफ खड़े होना ज्योति दा से सीखें : एक समय ऐसा आया जब एक बड़ी फैक्ट्री बंद होने की कगार पर थी. मजदूर यूनियन हड़ताल पर थी और उम्मीद थी कि बसु मजदूरों के पक्ष में खड़े होंगे. लेकिन उन्होंने अलग रुख अपनाया. उन्होंने कहा कि अगर उद्योग ही खत्म हो जाएगा, तो मजदूरों का भविष्य भी खत्म हो जाएगा. यह उनके व्यावहारिक और संतुलित नेतृत्व का उदाहरण था.
पार्टी के फैसले को क्यों कहा historic blunder: 1996 में Jyoti Basu को प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला, लेकिन उनकी पार्टी Communist Party of India (Marxist) ने इसे अस्वीकार कर दिया. बाद में बसु ने खुद इस फैसले को “historic blunder” कहा. यह घटना आज भी भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित क्षणों में गिनी जाती है.
बिना बड़े भाषणों के लंबे समय तक सत्ता रहे काबिज : जहां अन्य नेता भीड़ जुटाने और बड़े भाषण देने पर निर्भर रहते थे, वहीं Jyoti Basu शांत और तार्किक शैली के लिए जाने जाते थे. वे कम बोलते थे, लेकिन स्पष्ट बोलते थे. यही वजह थी कि बिना आक्रामक राजनीति के भी वे 23 साल तक मुख्यमंत्री बने रहे.
इंदिरा गांधी से 36 का आंकड़ा : देश की पूर्व पीएम इंदिरा गांधी के कार्यकाल में केंद्र और पश्चिम बंगाल के बीच कई बार टकराव हुआ. इस दौरान ज्योति बसु ने खुलकर केंद्र सरकार की नीतियों का विरोध किया. उनका मानना था कि राज्यों को अपने फैसले लेने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए.
बिना सुरक्षा के हिंसाग्रस्त गांवों का दौरा : हिंसाग्रस्त दौर में भी ज्योति कई बार बिना ज्यादा सुरक्षा के ग्रामीण इलाकों में जाते थे. वे सीधे लोगों से मिलते, उनकी समस्याएं सुनते और भरोसा बनाने की कोशिश करते. यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी, जमीन से जुड़ाव.
23 साल बाद चुपचाप खुद को किया सत्ता से बेदखल : 1977 से 2000 तक लगातार मुख्यमंत्री रहने के बाद Jyoti Basu ने खुद पद छोड़ने का फैसला लिया. एक दिन पार्टी के नेताओं अचानक कहा, अब नई पीढ़ी को काम का मौक देने की जरूरत है. इस बयान के कुछ दिन बाद उन्होंने सत्ता से चिपके रहने की बजाय नई पीढ़ी को मौका देने को प्राथमिकता दी. भारतीय राजनीति में यह एक दुर्लभ उदाहरण माना जाता है. उनके बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य बने सीएम.




