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महिला आरक्षण की पहली आवाज : कौन थीं बेगम जहांआरा शाहनवाज? जानिए 16 करोड़ महिलाओं की 94 साल पुरानी कहानी

महिला आरक्षण पर आज की बहस की जड़ें 1930 के दशक तक जाती हैं, जब Begum Shah Nawaz ने 16 करोड़ भारतीय महिलाओं की आवाज बनकर मताधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग उठाई. गोलमेज सम्मेलनों से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक, उन्होंने महिलाओं के अधिकारों के लिए निर्णायक भूमिका निभाई. आज ‘महिला आरक्षण बिल’ की चर्चा के बीच उनकी विरासत फिर सुर्खियों में है.

Begum Jahanara Shah Nawaz biography, Women Reservation Bill
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जब संयुक्त भारत में महिलाएं राजनीतिक अधिकारों के लिए आवाज उठाने की शुरुआती कोशिश कर रही थीं, उस दौर में एक नाम ऐसा था जिसने सत्ता के गलियारों तक उनकी बात पहुंचाई. वो थीं बेगम जहांआरा शाहनवाज (Begum Shah Nawaz). वह सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि उस सोच की प्रतिनिधि थीं जिसने महिलाओं को ‘हाशिये’ से निकालकर ‘निर्णय लेने’ की मेज तक लाने की लड़ाई लड़ी. ब्रिटिश भारत के दौर में आयोजित गोलमेज सम्मेलनों में 16 करोड़ भारतीय महिलाओं की आवाज बनना हो या मताधिकार और प्रतिनिधित्व की मांग को अंतरराष्ट्रीय मंच पर रखना, जहांआरा शाहनवाज़ ने हर मोर्चे पर अपनी छाप छोड़ी. एक बार फिर आजाद भारत में महिला आरक्षण पर बहस तेज है. सरकार इस बिल को संसद में पास कराने को लेकर एक्टिव मोड में आ गई है. ऐसे में बेगम शाहनवाज की सियासी विरासत और संघर्ष फिर से सुर्खियों में हैं. आइए, जानते हैं कौन थी शाहनवाज, जिसने गुलाम भारत में महिला के लिए उठाई थी बुलंद आवाज.

Begum Shah Nawaz कौन थीं?

बेगम जहांआरा शाहनवाज (1896-1979) भारतीय उपमहाद्वीप की उन चुनिंदा महिला नेताओं में से थीं, जिन्होंने न सिर्फ राजनीति में अपनी मजबूत पहचान बनाई, बल्कि महिलाओं के अधिकारों, मताधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की लड़ाई को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया. वह आजादी से पहले वाले भारत के पंजाब की एक प्रभावशाली राजनीतिक परिवार से थीं और स्वतंत्रता-पूर्व भारत की सक्रिय राजनीतिक हस्ती रहीं.


बेगम शाहनवाज का सबसे बड़ा योगदान महिलाओं को राजनीतिक अधिकार दिलाने के संघर्ष में माना जाता है. 1920 और 1930 के दशक में जब भारतीय महिलाएं सामाजिक और राजनीतिक रूप से हाशिये पर थीं, तब उन्होंने खुलकर महिलाओं के वोट के अधिकार और विधानसभाओं में उनकी भागीदारी की मांग उठाई. उन्होंने All India Women's Conference के मंच से महिलाओं के मताधिकार और आरक्षण की वकालत की और 1927 में सायमन कमिशन के सामने भी यह मुद्दा मजबूती से रखा.

गोलमेज सम्मेलनों में उनकी क्या भूमिका रही?

उनकी राजनीतिक सक्रियता का सबसे अहम पड़ाव गोलमेज सम्मेलन (1930–1933) रहा, जहां वह भारतीय महिलाओं का प्रतिनिधित्व करने वाली प्रमुख नेता थीं. वह तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भाग लेने वाली एकमात्र महिला थीं और उन्होंने 16 करोड़ भारतीय महिलाओं की आवाज़ को ब्रिटिश सरकार के सामने रखा. उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि महिलाओं को सिर्फ सामाजिक नहीं, बल्कि राजनीतिक अधिकार भी मिलने चाहिए, जिसमें वोट का अधिकार और विधानसभाओं में आरक्षण शामिल हो.

बेगम शाहनवाज़ को 1933 में बनी जॉइंट सिलेक्ट कमेटी की एकमात्र महिला सदस्य भी बनाया गया, जिसने बाद में भारत सरकार अधिनियम 1935 का मसौदा तैयार किया. इस अधिनियम के तहत लगभग 6 लाख महिलाओं को मताधिकार मिला और विधानसभाओं में उनके लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया. यह उस दौर में महिलाओं के अधिकारों की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी.

वह आल इंडिया मुस्लिम लीग की भी सक्रिय सदस्य रहीं और बाद में पाकिस्तान आंदोलन से जुड़ीं. स्वतंत्रता के बाद वह पाकिस्तान की संविधान सभा की सदस्य भी बनीं. हालांकि, उनकी पहचान केवल एक राजनीतिक नेता तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह एक समाज सुधारक और शिक्षाविद भी थीं. उन्होंने पंजाब विधानसभा में महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुधारों के मुद्दों को जोर-शोर से उठाया.

16 करोड़ महिलाओं की आवाज कैसे बनीं?

बेगम शाहनवाज़ एक लेखिका भी थीं. उनकी प्रसिद्ध पुस्तक “Father & Daughter: A Political Autobiography” उनके राजनीतिक जीवन, स्वतंत्रता आंदोलन और महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई का विस्तृत दस्तावेज है. कुल मिलाकर, बेगम जहांआरा शाहनवाज़ उन अग्रणी महिलाओं में थीं जिन्होंने भारत में महिला सशक्तिकरण, मताधिकार और राजनीतिक आरक्षण की नींव रखी. आज का महिला आरक्षण बिल और महिलाओं की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी कहीं न कहीं उनके जैसे नेताओं के संघर्ष का ही परिणाम है.

Nari Shakti Vandan Adhiniyam क्या है और क्यों अहम?

भारत में महिला आरक्षण की बहस कोई नई नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें स्वतंत्रता आंदोलन के दौर तक जाती हैं, जब बेगम शाहनवाज और सरोजिनी नायडू जैसी नेताओं ने महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों की आवाज़ उठाई थी. समय के साथ यह मुद्दा और मजबूत हुआ, लेकिन संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी सीमित ही रही.

इसी पृष्ठभूमि में 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम' (Nari Shakti Vandan Act) पारित किया गया, जिसका उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करना है. यह कानून ऐतिहासिक माना गया, क्योंकि इसे लगभग सभी राजनीतिक दलों का समर्थन मिला. हालांकि, इसके लागू होने को जनगणना और परिसीमन से जोड़ दिया गया है, जिसके कारण इसका प्रभाव 2029 के आम चुनावों से पहले दिखाई देना मुश्किल है.

आज महिला प्रतिनिधित्व की स्थिति क्या कहती है?

आज भी संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी सीमित है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों की इच्छाशक्ति भी जरूरी है. यह अधिनियम महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम है, लेकिन इसका वास्तविक असर तभी दिखेगा जब इसे समय पर और प्रभावी तरीके से लागू किया जाएगा.

2023 में, 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' सर्वसम्मति से पारित किया गया, जिसका उद्देश्य विधानसभाओं और संसद में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करना था. लेकिन क्या इससे महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में कोई बदलाव आया? नहीं, जैसा कि आंकड़े बताते हैं. विधेयक का समर्थन करने के बावजूद, राजनीतिक दलों ने उसकी मूल भावना के अनुरूप काम नहीं किया. अगले वर्ष हुए लोकसभा चुनावों में, राज्य-स्तरीय दलों के केवल 14.4 प्रतिशत और राष्ट्रीय दलों के 11.8 प्रतिशत उम्मीदवार ही महिलाएं थीं. लोकसभा की लगभग 27.6 प्रतिशत सीटों पर कोई भी महिला उम्मीदवार नहीं थी. 'एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स' की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, पूरे देश में 4,666 सांसदों/विधायकों में से केवल 464 ही महिलाएं हैं.

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