क्या है इमरजेंसी वाला ADM जबलपुर केस, जिसका योगेंद्र यादव अब कर रहे जिक्र, SC के SIR फैसले पर ऐसे उठाए सवाल
SIR फैसले पर योगेंद्र यादव ने Emergency के चर्चित ADM Jabalpur केस का जिक्र कर सुप्रीम कोर्ट, लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं.
सुप्रीम कोर्ट द्वारा भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा कराए जा रहे ‘Special Intensive Revision’ यानी SIR को संवैधानिक और कानूनी रूप से वैध ठहराने फैसले ने इस मसले पर नये सिरे से बहस छिड़ गई है. शीर्ष अदालत का फैसला आने के बाद एक वीडियो पोस्ट कर सैफोलॉजिस्ट ने अदालत के फैसले की तुलना ADM Jabalpur v. Shivkant Shukla के फैसले की है. उन्होंने कहा कि उस समय भी शीर्ष अदालत ने गलत फैसला सुनाया था, आज भी वैसा ही हुआ है. इसके परिणाम खतरनाक आएंगे.
योगेंद्र यादव ने क्या कहा?
सैफोलॉजिस्ट योगेंद्र यादव ने अपने वीडियो में बताया, "खबर ये नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय ने आज चुनाव आयोग के SIR को संवैधानिक बता दिया है. असली खबर ये है कि अब इस देश में भाजपा तय करेगी कि कौन वोट कर सकता है और कौन नहीं. इस फैसले से ऐसा लगता है कि इस देश के संविधान को बचाने का जो शायद अंतिम स्तंभ था, उसके कुछ हिस्से भी आज टूटकर गिर गए."
उन्होंने कहा कि आपने गलत खबर सुनी है. खबर ये ये नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के एसआईआर को वैलिड और संवैधानिक बता दिया है. असली खबर यह है कि 'अभी तक इस देश में वोटर सरकार को नहीं चुनती थी, अब सरकार वोटर को चुनेगी.' बाकी सर्वोच्च अदालत का 124 पेज का जजमेंट हैं. यह अंग्रेजी में है. पूरा पढ़ने के बाद ही पता चलेगा कि खबर क्या है. फिलहाल, असली खबर यह है कि अब बीजेपी यह तय करेगी कौन वोट कर सकता है, कौन वोट नहीं कर सकता है?
खबर ये है कि इस चुटकुले को लोकतांत्रिक चुनाव बताया जाएगा. खबर ये है कि आज एडीआर वाले केस में शीर्ष अदालत ने ठीक वही किया है जो आज से 50 साल पहले इमरजेंसी के दौरान ADM Jabalpur v. Shivkant Shukla के अदालत ने कहा था. उस समय सुप्रीम कोर्ट ने कहा दिया था सरकार जो मर्जी चाहे कर ले. जान ले ले. सवाल नहीं पूछा जा सकता.
एसआईआर मामले में भी शीर्ष अदालत ने एक बार फिर वही किया है. खबर यह है कि इस देश के संविधान को बचाने का जो शायद अंतिम स्तंभ है, उसके कुछ हिस्से टूटकर गिर गए हैं.
क्या है ADM Jabalpur v. Shivkant Shukla केस?
Emergency के दौरान चर्चित ADM Jabalpur v. Shivkant Shukla केस में Supreme Court of India ने 1976 में ऐतिहासिक लेकिन बेहद विवादित फैसला दिया था. इसे “हैबियस कॉर्पस केस” भी कहा जाता है. उस समय देश में इमरजेंसी लागू थी और सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 21 समेत कई मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया था. सवाल यह था कि क्या इमरजेंसी के दौरान कोई व्यक्ति अपनी अवैध गिरफ्तारी को अदालत में चुनौती दे सकता है या नहीं.
सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच में 4-1 के बहुमत से फैसला आया कि इमरजेंसी के दौरान यदि किसी व्यक्ति को सरकार ने हिरासत में लिया है, तो वह अदालत में हैबियस कॉर्पस याचिका दाखिल कर अपनी स्वतंत्रता की मांग नहीं कर सकता. यानी नागरिकों को अदालत से राहत पाने का अधिकार लगभग खत्म कर दिया गया था.
सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश A. N. Ray, न्यायमूर्ति M. H. Beg, Y. V. Chandrachud और P. N. Bhagwati बहुमत के पक्ष में थे. लेकिन न्यायमूर्ति H. R. Khanna ने ऐतिहासिक असहमति जताई. उन्होंने कहा कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार केवल संविधान से नहीं, बल्कि प्राकृतिक अधिकार है, जिसे सरकार पूरी तरह खत्म नहीं कर सकती.
बाद में इस फैसले की व्यापक आलोचना हुई और इसे भारतीय न्यायपालिका के सबसे विवादित फैसलों में गिना गया. 2017 में Justice K. S. Puttaswamy v. Union of India मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अप्रत्यक्ष रूप से ADM जबलपुर फैसले को गलत ठहराया था.
SIR का मामला क्या?
सुप्रीम कोर्ट ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा कराए जा रहे ‘स्पेशल इनटेंसिव रिविजन’ यानी SIR को संवैधानिक और कानूनी रूप से वैध ठहरा दिया है. मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने साफ कहा कि मतदाता सूचियों की शुद्धता और विश्वसनीयता बनाए रखना स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए बेहद जरूरी है. अदालत ने माना कि ECI को संविधान के अनुच्छेद 324 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 21(3) के तहत SIR कराने का पूरा अधिकार है. इस फैसले के बाद राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर बड़ी बहस शुरू हो गई है. बीजेपी इसे चुनावी शुद्धिकरण और लोकतंत्र की मजबूती बता रही है, जबकि विपक्ष इसे नागरिकता की जांच के “पिछले दरवाजे” के तौर पर पेश कर रहा है.




