₹81 हजार करोड़ का खजाना, ₹1.5 लाख करोड़ की देनदारी! क्या सब्सिडी की राजनीति BMC को कंगाल कर देगी?
मुंबई की बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) चार साल बाद निर्वाचित पार्षदों की वापसी के साथ एक बड़े आर्थिक इम्तिहान के दौर में प्रवेश कर चुकी है. महायुति सरकार ने सब्सिडी आधारित वादों के दम पर सत्ता हासिल की है, लेकिन घटते रिज़र्व, 1.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक के मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और बढ़ती स्थायी देनदारियों ने BMC की वित्तीय स्थिति को दबाव में डाल दिया है.
मुंबई की राजनीति और प्रशासन में चार साल बाद एक बार फिर निर्वाचित पार्षदों की वापसी होने जा रही है. लेकिन बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) के लिए यह वापसी सिर्फ लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली नहीं, बल्कि एक कठिन आर्थिक इम्तिहान की शुरुआत भी है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार एशिया की सबसे अमीर नगर निकाय कही जाने वाली BMC आज जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां सबसे बड़ा सवाल राजनीति का नहीं, बल्कि पैसे का है.
महायुति सरकार - बीजेपी और शिवसेना गठबंधन - ने भारी बहुमत सब्सिडी-प्रधान वादों के दम पर हासिल किया है. अब चुनौती यह है कि क्या BMC घटते रिज़र्व, बढ़ते इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च और नई-पुरानी वित्तीय जिम्मेदारियों के बीच इन वादों को निभा पाएगी?
₹75,000 करोड़ का बजट, लेकिन सिकुड़ती तिजोरी
BMC का सालाना बजट करीब ₹75,000 करोड़ का है, जो कई राज्यों के बजट से भी बड़ा है. वित्त वर्ष 2025-26 के लिए BMC के पास कुल ₹81,774 करोड़ का रिज़र्व कॉर्पस है. हालांकि, यह आंकड़ा देखने में भले ही बड़ा लगे, लेकिन सच्चाई यह है कि पिछले पांच वर्षों में BMC के रिज़र्व में कम से कम ₹10,000 करोड़ की गिरावट आ चुकी है. 2021 में जहां रिज़र्व ₹91,690 करोड़ था, वहीं अब यह तेजी से घट रहा है. यह पूरा रिज़र्व अलग-अलग बैंकों में फिक्स्ड डिपॉजिट के रूप में रखा गया है, जिससे मिलने वाला ब्याज BMC की आय का एक अहम स्रोत है.
1.5 लाख करोड़ से ज्यादा के मेगा प्रोजेक्ट
पिछले कुछ वर्षों में BMC ने ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट हाथ में लिए हैं, जो बेहद पूंजी-प्रधान हैं. इनमें शामिल हैं: मुंबई कोस्टल रोड प्रोजेक्ट, गोरेगांव-मुलुंड लिंक रोड (GMLR), वेस्ट वॉटर ट्रीटमेंट फैसिलिटी (WWTF) - 7 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और मेगा रोड कंक्रीटीकरण प्रोजेक्ट. अधिकारियों के मुताबिक, इन सभी बड़े प्रोजेक्ट्स पर कुल खर्च अब ₹1.5 लाख करोड़ से ज्यादा पहुंच चुका है - जो कि BMC के मौजूदा रिज़र्व से लगभग दोगुना है.
पूरा रिज़र्व भी खर्च करने लायक नहीं
सबसे बड़ी चिंता यह है कि BMC का पूरा रिज़र्व इस्तेमाल के लिए उपलब्ध नहीं है. कुल रिज़र्व में से करीब ₹51,000 करोड़ पहले से ही आंतरिक प्रतिबद्धताओं के लिए आरक्षित है, जैसे कर्मचारियों की ग्रेच्युटी, पेंशन, प्रोविडेंट फंड, ठेकेदारों की बैंक गारंटी (जो प्रोजेक्ट पूरा होने पर लौटानी होती है).
इसका मतलब यह है कि ₹81,000 करोड़ के रिज़र्व में से केवल 49% यानी करीब ₹39,500 करोड़ ही वास्तविक रूप से इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च किए जा सकते हैं. एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “जब उपयोग योग्य पैसा चार गुना छोटे प्रोजेक्ट साइज के सामने खड़ा हो, तो आने वाले वर्षों में BMC के लिए लिक्विडिटी क्राइसिस तय है.”
बजट में अभी राहत, लेकिन खतरा बरकरार
फरवरी में पेश किए जाने वाले BMC बजट में फिलहाल कोई बड़ा वित्तीय संकट नहीं दिखा है. पिछले साल का बजट ₹74,527 करोड़ था, जिसमें से 58% यानी ₹43,000 करोड़ कैपिटल एक्सपेंडिचर के लिए रखे गए थे. अधिकारियों का कहना है कि प्रॉपर्टी टैक्स कलेक्शन बढ़ा है, बिल्डिंग प्रपोजल डिपार्टमेंट से मिलने वाला प्रीमियम भी बढ़ा है. लेकिन चेतावनी भी साफ है - अगर खर्च पर नियंत्रण और देनदारियों पर सख्ती नहीं हुई, तो हालात धीरे-धीरे हाथ से निकल सकते हैं.
पार्षदों की वापसी और खर्च का विस्फोट
चार साल बाद पार्षदों की वापसी BMC पर स्थायी खर्च का नया बोझ डालेगी.
- कुल पार्षद: 237
- हर पार्षद का मासिक वेतन: ₹25,000
- हर पार्षद को सालाना विकास निधि: ₹1.6 करोड़
इन सबको मिलाकर अगले पांच सालों में BMC पर ₹1,931.6 करोड़ का अतिरिक्त निश्चित खर्च आएगा. यह खर्च अनिवार्य है, क्योंकि MMC एक्ट के तहत इसे रोका नहीं जा सकता.
सबसे विवादित वादा: महिलाओं के लिए बस किराया सब्सिडी
महायुति के सबसे चर्चित और आलोचित वादों में से एक है - BEST बसों में महिलाओं के लिए 50% किराया सब्सिडी. BEST पहले से ही BMC की ग्रांट पर निर्भर है. 2024-25 में BMC ने BEST को ₹1,000 करोड़ दिए, इससे पहले यह राशि ₹850 करोड़ थी. BEST पर कुल देनदारी ₹9,286 करोड़ रुपये है जबकि इसका सालाना घाटा ₹2,200 करोड़ है. किराया बढ़ाने के बाद BEST की रोज़ाना कमाई ₹2.5 करोड़ से बढ़कर ₹3.5 करोड़ हुई. लेकिन अगर 50% सब्सिडी लागू हुई, तो रोज़ाना आय में ₹1.4 करोड़ (40%) की गिरावट आएगी जिसकी वजह से उसे सालाना ₹511 करोड़ का नुकसान उठाना पड़ेगा. BEST के एक अधिकारी के मुताबिक, यह घाटा अंततः BMC को ही भरना होगा.
पानी पर राजनीति बनाम अर्थशास्त्र
महायुति ने अगले पांच साल तक पानी टैक्स न बढ़ाने का भी वादा किया है. जबकि सच्चाई यह है कि:
- BMC रोज़ाना 3,870 MLD पानी सप्लाई करता है
- सप्लाई लागत टैक्स से करीब दोगुनी है
- 2023 से कोई बढ़ोतरी नहीं हुई
- आखिरी बढ़ोतरी 2022 में 7.12% थी
अगर टैक्स नहीं बढ़ाया गया, तो BMC को हर साल कम से कम ₹200 करोड़ का नुकसान झेलना पड़ेगा.
PPP मॉडल: मजबूरी या समाधान?
बढ़ते खर्च और घटते संसाधनों के बीच BMC अब तेजी से Public-Private Partnership (PPP) मॉडल की ओर बढ़ रही है.
कुछ बड़े उदाहरण:
- कोस्टल रोड के साथ 70 हेक्टेयर ओपन स्पेस डेवलपमेंट
- 11 हेक्टेयर BMC
- 53 हेक्टेयर रिलायंस इंडस्ट्रीज़
- 5 हेक्टेयर टाटा संस
- ₹1,250 करोड़ का देवनार एबेटॉयर रिडेवलपमेंट
- कालाचौकी टेक्सटाइल म्यूजियम (₹80–100 करोड़)
- परिधीय अस्पतालों में कार्डियोलॉजी, डायलिसिस, ब्लड बैंक जैसी सेवाओं का निजीकरण
हालांकि इन कदमों का मकसद वित्तीय दबाव कम करना है, लेकिन इससे निजीकरण और जनहित पर बहस भी तेज हो गई है.
राजनीति से आगे अर्थनीति की परीक्षा
BMC आज जिस दौर से गुजर रही है, वह सिर्फ मुंबई का नहीं, बल्कि शहरी भारत की वित्तीय हकीकत को दर्शाता है. सवाल साफ है - क्या सब्सिडी की राजनीति, मेगा प्रोजेक्ट्स और सीमित संसाधनों के बीच संतुलन संभव है? महायुति सरकार के लिए BMC अब सत्ता का नहीं, साख और समझदारी का टेस्ट केस बन चुकी है. आने वाले बजट और फैसले तय करेंगे कि एशिया की सबसे अमीर नगर पालिका अपनी अमीरी बचा पाएगी या नहीं.





