'शिंदे सत्ता में हैं, लेकिन शिवसैनिक आज भी कन्फ्यूज', मातोश्री की आई याद, एकनाथ शिंदे को क्यों सता रहा 2022 वाला डर?
महाराष्ट्र की राजनीति में जो रास्ता सत्ता तक ले जाता है, वही कब कब्र बन जाए, पता नहीं चलता. 2022 में उद्धव ठाकरे की सरकार को गिराने वाले एकनाथ शिंदे, आज उसी डर में हैं कि कहीं कोई और 2022 उनके साथ ही न दोहरा दे. यानी जैसी करनी वैसी भरनी वाली कहावत, अब उन पर ही लागू न हो जाए. या फिर कहीं ये तो नहीं कि बाला साहब के सैनिकों को 'मातोश्री' वाला जज्बा फिर से याद आने लगी.
महाराष्ट्र में बीएमसी सहित 29 नगर निगमों के चुनाव परिणाम ने महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल लाकर खड़ा कर दिया है. खासकर बीएमसी के चुनाव परिणाम ने तो प्रदेश के डिप्टी सीएम और शिवसेना शिंदे के प्रमुख एकनाथ सिंदे को सकते में डाल दिया है. बीएमसी चुनाव परिणाम आने के बाद से वो इस डर के साये में है. कि कोई 2022 वाला इतिहास उन्हीं के खिलाफ न दुहरा दे. दरअसल, करीब चार साल पहले उन्होंने उद्धव ठाकरे को धोखा देकर शिवसेना को तोड़ने वाला पाप किया था. ऐसा कर वह बीजेपी के सहयोग से उद्धव को सत्ता हटाकर खुद सीएम बन गए थे. क्या अब वही कांड उनके साथ होगा?
शिंदे को क्यों सता रहा है 2022 वाला डर?
लोकल बॉडी चुनाव परिणाम आने के बाद 'शिंदे' सत्ता में तो हैं, लेकिन शिवसैनिक आज भी कन्फ्यूज हैं. वो यह नहीं सोच पा रहे कि किसका साथ दें और किसका नहीं. जिसके साथ हैं, वो खुद ही अवसरवादी है. शिवसेना शिंदे के एक धड़े ने तो विद्रोह का परदे के पीछे से संकेत भी दिए थे. उस समय तो दिल्ली में एकनाथ ने अमित शाह से मुलाकात कर पार्टी को टूट से बचा लिया था. वहीं, शाह के कहने पर सीएम देवेंद्र फडणवीस ने उनसे बातचीत कर लोकल बॉडी एक साथ चुनाव लड़ने का फैसला लिया था.
इस बात की चर्चा महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों इसलिए चर्चा में है कि शिंदे खुद पीठ दिखाकर गद्दी पाई थी, अब सियासी समीरकण एकसा बन गया है, जिससे लगता है कि उसके पीठ में भी कोई छुरा घोंप सकता है.
खुद की राजनीति का शिकार होंगे शिंदे?
महाराष्ट्र की राजनीति में एक कहावत है,"जो तलवार से सत्ता तक पहुंचता है, उसे उसी तलवार से डर भी लगता है." 2022 में उद्धव ठाकरे को सत्ता से बेदखल करने वाले एकनाथ शिंदे आज 2026 के बीएमसी चुनाव से पहले उसी डर में घिरे दिखते हैं.
2022 में क्या किया था?
इस बात को समझने के लिए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव परिणाम 2019 और उसकी बाद की घटना को याद करने की जरूरत है. उस समय बीजेपी को 106 सीटें मिली थी. बीजेपी शिवसेना मिलकर चुनाव लड़ी थी. एनडीए गठबंधन को प्रदेश की जनता ने बहुमत दिया था. बीजेपी की आधी सीट पाकर उद्धव ठाकरे बीजेपी से सीएम पद लेने की जिद पर अड़ गए थे. उनका यह जिद इस हद तक बढ़ गया कि उन्होंने एनसीपी शरद पवार और कांग्रेस के साथ गठजोडत्र का सरकार बना ली. बीजेपी के साथ दशकों पुरानी गठबंधन को उद्धव ठाकरे ने लात मार दिया था.
'ऑपरेशन शिवसेना'
उस समय उद्धव ठाकरे तो सीएम बन गए, लेकिन इसको लेकर एकनाथ शिंदे के मन में भी ख्याल पक रहा था. हालांकि, उद्धव ठाकरे ने मलाईदार विभाग का मंत्री शिंदे को बनाया था. शिंदे उद्धव के राइट हैंड भी थे. उद्धव भी उस समय उन पर सबसे ज्यादा भरोसा करते थे. लेकिन उन्हीं को जून 2022 में एकनाथ शिंदे ने 40 से ज्यादा विधायकों को साथ लेकर सियासी धोखा देकर शिंदे ने बीजेपी के साथ हाथ मिलाकर उनकी सरकार गिरा दी. खुद सीएम बन गए. उस समय बीजेपी सियासी और देवेंद्र फडणवीस सियासी जहर का घूंट पीकर रह गए थे. यही था 'ऑपरेशन शिवसेना', जिसने महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा बदल दी.
उसके बाद सबकुछ ठीक चलता रहा. 2026 में विधानसभा चुनाव हुए और महायुति ने सरकार बनाई. महायुति में शिंदे और अजीत पवार की पार्टी भी शामिल थी. दोनों इस समय महाराष्ट्र सरकार में डिप्टी सीएम हैं. उसके बाद से शिवसेना के बड़े हिस्से में असंतोष पनपने लगा. अब शिंदे को डर क्यों लग रहा है? क्योंकि इतिहास खुद को दोहराता है. बीएमसी चुनाव महाराष्ट्र की राजनीति का IPL फाइनल की तरह होता है, जिसके हाथ बीएमसी, उसके हाथ मुंबई की सत्ता, पैसा, नेटवर्क और कंट्रोल. फिर बीएमसी का बजट भी तो 75 हजार करोड़ रुपये है.
शिंदे को उद्धव से नहीं अपनों से डर
यही वजह है कि शिंदे को पता है कि उन्होंने जो रास्ता अपनाया, वही रास्ता उनके खिलाफ भी इस्तेमाल हो सकता है. शिंदे को किससे डर है? इसका जवाब यह है कि उद्धव से नहीं, अपनों से. यानी शिंदे का डर बाहरी नहीं, अंदरूनी है. अपने विधायकों और नगरसेवकों से उन्हें डर लगता है.
साल 2022 के बाद से बीजेपी ने महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत की है. जबकि शिवसेना (शिंदे) का संगठना कमजोर हुआ है. बीजेपी आज शिंदे की बैसाखी के सहारे महाराष्ट्र में है, लेकिन बीएमसी में बीजेपी खुद नंबर-1 है. हालात भी वैसे ही बन गए हैं. जबकि शिंदे अपना मेयर चाहते हैं, पर ऐसा होने की संभावना नहीं है. तो क्या मेयर पद को लेकर टूटेगी शिंदे की पार्टी, 2022 जैसा खेल शिंदे के साथ हो सकता है? इसका जवाब हां, तरीका वही, पर खिलाड़ी बदल सकते हैं.
शिंदे जानते हैं - कल बोझ बन सकता हूं
जैसे शिंदे ने उद्धव के विधायकों को तोड़ा वैसे ही आज शिंदे के कई नेता बीजेपी के सीधे संपर्क में हैं. यही वजह है कि आज शिंदे को उद्धव ठाकरे भी याद आने लगे है. इस बीच मेयर पद और बीएमसी के फंड यूज करने को लेकर फैसला दिल्ली से हो रहा हैत्र शिंदे जानते हैं, भले ही आज में बीजेपी के लिए जरूरी हूं, कल बोझ बन सकता हूं.
शिवसेना शिंदे को कौन तोड़ सकता है?
जहां तक बात शिवसेना शिंदे को कौन तोड़ सकता है, तो इसके तीन संभावित खिलाड़ी हैं. बीजेपी, अगर प्रदेश सकरार और बीएमसी में शिंदे की बैसाखी का जुगाड़ हो जाए तो. अगर ऐसा होता है तो बीजेपी को शिंदे की जरूरत खत्म. इस मुहिम के तहत शिंदे के नेता बीजेपी में शिफ्ट हो सकते हैं. दूसरी चुनौती उद्धव ठाकरे हो सकते हैं. आज शिंदे के साथ दिख रहे बाला साहब के सैनिक भावनात्मक रूप से आज भी मातोश्री और शिवसैनिक से ही जुड़े हैं. मराठी अस्मिता और ठाकरे ब्रांड आज भी उनके लिए सबसे ज्यादा अहम है.
बीएमसी में मेयर पद के चुनाव में इस दिशा में आखिरी लड़ाई साबित होने की संभावना है. उसके बाद शिवसेना में अंदरूनी बगावत तेज होने की संभावना है. जिन नेताओं को मंत्री नहीं मिला, जिनका भविष्य अधर में है, वही बीजेपी का नया शिंदे बन सकता है.
एकनाथ शिंदे की राजनीति है भी तो वैसी
शिवसेना शिंदे प्रमुख एकनाथ शिंदे की राजनीति सत्ता-केंद्रित है. जबकि उनका पर पकड़ कमजोर है. शिंदे जनभावना से ज्यादा सत्ता समीकरण पर भरोसा करते हैं. उनके पास अब ना ठाकरे जैसा करिश्मा है, ना बीजेपी जैसा कैडर. उनकी राजनीति "आज साथ, कल हालात के हिसाब से बदलेंगे डाल वाली है. यानी महाराष्ट्र की राजनीति में जो रास्ता सत्ता तक ले जाता है, वही कब कब्र बन जाए, पता नहीं चलता." संभवत: वही होने का शिंदे को अंदेशा है. शिंदे इतिहास बनेंगे या महाराष्ट्र में इतिहास दोहराया जाएगा.





