कौन हैं AIMIM के इकलौते हिन्दू पार्षद विजय उबाले, आवाम ने क्यों जताया भरोसा?
बीएमसी चुनाव में एआईएमआईएम के टिकट पर जय उबाले की जीत बताती है कि पार्षद चुनावों में अभी भी भारत का वोटर सबसे पहले काम देखता है. AIMIM के इकलौते हिंदू पार्षद की यह कहानी पहचान की राजनीति से आगे, भरोसे की राजनीति का संकेत देती है, जहां पार्टी नहीं, परिचय और परिश्रम जीत दिलाते हैं. वह एआईएमआईएम के टिकट पर जीतने वाले एक मात्र हिंदू पार्षद हैं.
बीएमसी चुनाव में AIMIM के इकलौते हिंदू पार्षद विजय उबाले की गोवंडी सीट से जीत इन दिनों सियासी गलियारों में सुर्खियों में है. आमतौर पर मुस्लिम वोट बैंक से जोड़ी जाने वाली पार्टी AIMIM पर भरोसा जताकर जनता ने एक हिंदू चेहरे को चुना, जिसे स्थानीय राजनीति में काम, पकड़ और जमीनी जुड़ाव का नतीजा माना जा रहा है. इसके बावजूद उबाले की जीत चर्चा में इसलिए है कि भारतीय राजनीति में अक्सर पार्टियों की पहचान धर्म, जाति या वोटबैंक से जोड़कर देखी जाती है. ऐसे में जब AIMIM जैसी पार्टी से एक हिंदू पार्षद जीतकर सामने आता है, तो सवाल उठना लाज़िमी है, कौन हैं विजय उबाले और जनता ने उन पर भरोसा क्यों जताया?
दरअसल, विजय उबाले की जीत सिर्फ एक सीट की नहीं, बल्कि उस राजनीति की है जहां नाम नहीं, काम बोला और जहां मोहल्ले की नालियां, पानी, सड़क और सुनवाई, बड़े नारों से ज्यासदा अहम साबित हुईं.
कौन हैं विजय उबाले?
विजय उबाले बेहद सामान्य पृष्ठभूमि के व्यक्ति हैं, लेकिन लोकल स्तर पर उनकी पकड़ मजबूत है. वह किसी बड़े राजनीतिक परिवार से भी नहीं आते. वे स्थानीय स्तर पर सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता रहे हैं. वर्षों से वार्ड/इलाके की समस्याओं को उठाते रहे हैं. लोगों के बीच सुलभ रहने वाले शख्स हैं. उनकी पहचान एक ऐसे व्यक्ति की रही है जो, चुनाव के समय नहीं, हर समय उपलब्ध रहता है.
विजय उबाले ने सोमैया कॉलेज से बीएससी की पढ़ाई की है और वह पेशे से एक शिक्षक हैं. वह प्राइवेट ट्यूशन क्लासेस भी लेते हैं. इसलिए, उनकी चर्चा बच्चों और अभिभावकों के जरिए दूर-दूर तक है. पेशे से शिक्षक विजय उबाले 2012 से टीचिंग कर रहे हैं. उन्होंने गणित से 2013 में बीएससी की थी. वह मुंबई यूनिवर्सिटी के पढ़े हैं. वह नौवीं, दसवीं (राज्य विद्यालय, सीबीएसई), प्रथम वर्ष और माध्यमिक विद्यालय (विज्ञान, वाणिज्य) और डिप्लोमा छात्रों को गणित पढ़ाते हैं.
विजय उबाले जब एफिडेविट बनवाने के लिए गए थे, तब उनके पास एडबोकेट की फीस देने के लिए 3,000 रुपये भी नहीं थे, जिससे उन्होंने एडवोकेट से उधारी में काम करवाया. यह घटना उनके सादगीपूर्ण और लो- प्रोफाइल व्यक्तित्व का प्रतीक है.
सियासी समीकरण
आईएमआईएम के नेता और कार्यकर्ताओं का कहना है कि विजय सर किस धर्म से संबंध रखते हैं, यह मायने नहीं रखता. वे बैरिस्टर असदुद्दीन ओवैसी से प्रेरित हैं और भारतीय संविधान के उनके ज्ञान और व्यवहार से प्रभावित हैं. वार्ड 140 दो विधानसभा क्षेत्रों में विभाजित है. एक पर समाजवादी पार्टी के अबू आजमी का नेतृत्व है और दूसरे पर एनसीपी की सना मलिक का. मतदाता दोनों पार्टियों से नाराज थे और एक तीसरा विकल्प चाहते थे. ऐसा शख्स जो उनकी स्थानीय समस्याओं को समझता हो, इसलिए विजय सर ने जीत हासिल की है.
ओवैसी की रैली ने बदला जीत का गणित
एआईएमआईएम के कार्यकर्ताओं का उनकी शानदार जीत को लेकर कहना है कि चुनाव से ठीक पहले पार्टी प्रमुख ओवैसी की रैली हुई और उस रैली में 50 हजार से ज्यादा लोगों की भीड़ जुटी थी. वहीं से विजय के पक्ष में माहौल बन गया, विजय साल 2024 में महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के दौरान AIMIM में शामिल हुए थे और वो ओवैसी के विचारों से काफी प्रेरित हैं.
विजय उबाले ने प्रभाग क्रमांक-140 से 16 प्रत्याशियों को हराते हुए 4945 मतों के साथ जीत दर्ज की है. इस प्रभाग में कुल 25,950 वोट पड़े, जिसमें 20% वोट उबाले को मिला. इस क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 50% से अधिक है. वार्ड 140 के AIMIM अध्यक्ष दिलशाद अंसारी का कहना है कि इस सीट पर हिन्दू और मुस्लिम मतदाताओं का अनुपात लगभग बराबर का है.
AIMIM से जुड़ने का फैसला क्यों अहम?
विजय उबाले का AIMIM से जुड़ना कई लोगों के लिए चौंकाने वाला था, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि एआईएमआईएम ने पार्टी नहीं, उम्मीदवार देखा. धर्म नहीं, डिलिवरी ट्रैक रिकॉर्ड देखा. AIMIM नेतृत्व ने भी इस चुनाव में स्थानीय चेहरे को पूरी छूट दी, यानी इलाके के मुद्दे, इलाके की भाषा और इलाके की रणनीति के हिसाब से उबाले को मैदान में उतारा.
आवाम ने क्यों जताया भरोसा?
लोकल लेवल पर विजय उबाले का रिकॉर्ड अच्छा है. वह पार्षद का चुनाव जीतने से पहले भी अपने एरिया में पानी, सफाई, स्ट्रीट लाइट जैसे बुनियादी मुद्दों पर सक्रियता दिखाते रहे हैं. नगर निगम/पालिका के चक्कर कटवाने के बजाय सीधा समाधान कराने पर जोर देते हैं. हिंदू-मुस्लिम, मराठी-उर्दू जैसे खांचों से बाहर निकलकर राजनीति करने वाले शख्स की उनकी पहचान है. बीएमसी चुनाव में इस बार उबाले को लोगों ने उन्हें नेता नहीं, पड़ोसी की तरह देखा. यही वजह रही कि पार्टी टैग पीछे रह गया.
AIMIM की रणनीतिक बदलाव की ओर इशारा?
वहीं, राजनीतिक जानकार मानते हैं कि AIMIM अब स्थानीय निकाय चुनावों में प्रयोग कर रही है. हर जगह मुस्लिम चेहरा उतारना जरूरी नहीं है. जहां समीकरण बनें, वहां विश्वसनीय गैर-मुस्लिम चेहरे भी उतारे जा सकते हैं. विजय उबाले की जीत इसी रणनीति का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर उभरी है.





