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BJP में विलय करेंगे AAP के 7 सांसद, क्यों खेला गया 2/3 का खेल, समझें दल बदल कानून

AAP के 7 सांसदों के BJP में संभावित विलय की चर्चा तेज है. जानिए 2/3 नियम, दल-बदल कानून और कैसे सांसद अपनी सदस्यता बचा सकते हैं, पूरा गणित आसान भाषा में.

BJP में विलय करेंगे AAP के 7 सांसद, क्यों खेला गया 2/3 का खेल, समझें दल बदल कानून
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दिल्ली की राजनीति में 2/3 का खेल अचानक चर्चा में इसलिए आता है क्योंकि यह सीधे भारत के दल-बदल कानून से जुड़ा है. फिलहाल, जिस मामले में चर्चा है, वो आम आदमी पार्टी से कनेक्टेड है. पार्टी के राज्यसभा संसदों की ओर से दावा किया जा रहा है कि AAP के 7 सांसद BJP में शामिल हो सकते हैं. ऐसे में सवाल यह उठता है, ऐसा क्यों हो रहा है? आखिर सात सांसद ही दूसरी पार्टी में क्यों जा रहे हैं? इसका जवाब संविधान में मौजूद उस कानूनी व्यवस्था में छिपा है, जो तय करती है कि कब दल बदलने पर सदस्यता बचेगी और कब जाएगी? इसलिए, यह जानना जरूरी हो जाता है कि दल बदल कानून क्या है, जिसके तहत सांसदी बचाने में लिए पार्टी के खिलाफ जाने वाले सांसदों का समूह दो/तिहाई संख्या का सहारा लेने की कोशिश करते हैं.

क्या है दल-बदल कानून?

भारत में दल-बदल कानून को 1985 में 52वां संविधान संशोधन के जरिए लागू किया गया था. इसका मकसद राजनीतिक दलों में टूट-फूट रोकना, खरीद-फरोख्त (horse trading) पर लगाम लगाना और चुने हुए प्रतिनिधियों को पार्टी के प्रति जवाबदेह बनाए रखना है. ताकि सरकार और राजनीतिक व्यवस्था में स्थिरता बनी रहे.

2/3 बहुमत का नियम क्या कहता है?

दल-बदल कानून के तहत अगर किसी पार्टी के लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा या विधान परिषद के कम से कम 2/3 विधायक या सांसद या विधायक एक साथ पार्टी छोड़ते हैं, तो इसे विलय (merger) माना जाता है. ऐसे मामलों में दल बदल कानून के तहत अयोग्यता (disqualification) का प्रावधान लागू नहीं होती. लेकिन अगर 2/3 से कम सदस्य पार्टी छोड़ते हैं, तो उन्हें दलबदलू मानते हुए उनकी सदस्यता खत्म की जा सकती है. यही वह कानूनी सीमा है, जो राजनीतिक रणनीतियों का आधार बनती है.

7 सांसद क्यों अहम?

मान लीजिए किसी पार्टी के कुल सांसदों की संख्या ऐसी है कि उसका 2/3 हिस्सा 7 के आसपास बैठता है, तब 7 सांसदों का एक साथ पार्टी छोड़ना उन्हें सांसदी जाने से सुरक्षा देता है. यानी यह संख्या कोई संयोग नहीं, बल्कि एक तय कानूनी गणित (legal threshold) है. इसी वजह से खबरों में “7 सांसद” जैसे आंकड़े अचानक अहम हो जाते हैं और सियासी चर्चाओं का केंद्र बन जाते हैं. आम आदमी पार्टी के राज्यसभा में 10 सांसद हैं. ऐसे में राघव चड्ढा सहित अगर 7 सांसद टूटकर किसी और पार्टी में विलय कर लेते हैं, तो उनकी सांसदी बची रहेगी.

2/3 का खेल कैसे काम करता है?

राजनीति में इसे एक रणनीति के तौर पर देखा जाता है, जहां किसी विपक्षी दल के पर्याप्त सांसदों या विधायकों को एक साथ तोड़कर 2/3 संख्या तक पहुंचाया जाता है. इसके बाद इस समूह को विलय के रूप में पेश किया जाता है, जिससे वे अयोग्यता से बच जाते हैं. इस प्रक्रिया से न सिर्फ दल बदल संभव होता है, बल्कि सरकारों का गणित और सत्ता संतुलन भी बदल सकता है.

क्या राज्यसभा सांसदों पर भी लागू होता है दल-बदल कानून?

लोकसभा सांसदों और विधानसभा के विधायकों की तरह राज्यसभा सांसदों पर भी दल-बदल कानून पूरी तरह लागू होता है. यह प्रावधान भी दसवीं अनुसूची के तहत ही आता है. यदि कोई राज्यसभा सांसद अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ता है या पार्टी के व्हिप के खिलाफ वोट करता है अथवा बिना अनुमति अनुपस्थित रहता है, तो उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है. वहीं, निर्दलीय सदस्य अगर बाद में किसी पार्टी में शामिल होता है, तो वह भी अयोग्यता के दायरे में आता है. इन मामलों में अंतिम निर्णय राज्यसभा के सभापति द्वारा लिया जाता है.

हालांकि, यहां विलय का अपवाद लागू होता है. अगर किसी पार्टी के कम से कम 2/3 सांसद एक साथ दूसरी पार्टी में शामिल हो जाते हैं, तो उनकी सदस्यता बची रहती है. इसके अलावा, यदि सांसद को पहले से पार्टी की अनुमति मिल जाती है, तो वह व्हिप के खिलाफ जाकर भी अयोग्यता से बच सकता है.

दल बदल कानून से पहले पार्टी के 1/3 टूट को भी मान्यता थी, लेकिन 91वां संविधान संशोधन के बाद इस प्रावधान को खत्म कर दिया गया और अब केवल 2/3 संख्या के साथ ही वैध विलय माना जाता है.

यही कारण है कि '2/3 का खेल' कोई रहस्यमयी रणनीति नहीं, बल्कि संविधान में दिया गया एक स्पष्ट कानूनी प्रावधान है. अगर किसी दल के पर्याप्त सदस्य एक साथ पार्टी बदलते हैं, तो वे अयोग्यता से बच सकते हैं. यही कारण है कि राजनीति में 2/3 का आंकड़ा बेहद अहम बन जाता है और हर बड़े सियासी घटनाक्रम में इसकी चर्चा जरूर होती है.

क्या है पूरा मामला?

यह पूरा मामला आम आदमी पार्टी के भीतर बढ़ते मतभेदों और राजनीतिक अटकलों से जुड़ा बताया जा रहा है. हाल ही में अरविंद केजरीवाल ने राज्यसभा में संगठनात्मक फेरबदल करते हुए राघव चड्ढा को उपनेता पद से हटा दिया, जिसके बाद से दोनों के बीच दूरी की चर्चाएं तेज हो गईं. इसी बीच दावा किया जा रहा है कि राघव चड्ढा ने पार्टी से इस्तीफा देने का फैसला कर लिया है और उन्होंने सार्वजनिक रूप से पार्टी नेतृत्व पर गंभीर आरोप भी लगाए. यह कहते हुए कि AAP अपने मूल सिद्धांतों से भटक गई है.

आम आदमी पार्टी में जारी इन घटनाओं ने सियासी माहौल को और गर्म कर दिया है. अब ऐसी भी अटकलें हैं कि राघव चड्ढा के साथ संदीप पाठक, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, राजेंद्र गुप्ता, स्वाति मालीवाल और विक्रमजीत साहनी छोड़ देंगे. ये लोग एक साथ भारतीय जनता पार्टी में विलय करेंगे.

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