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5500 KM दूर मिस्र की रेत में मिला ब्राह्मी का निशान! 2000 साल पुराने शिलालेख ने खोला भारत-रोमन व्यापार का राज

मिस्र के प्राचीन बंदरगाह बेरेनिके में तमिल-ब्राह्मी लिपि के शिलालेख मिले हैं, जो दक्षिण भारत और रोमन मिस्र के बीच गहरे व्यापारिक संबंध का संकेत देते हैं. यह खोज प्राचीन वैश्विक व्यापार नेटवर्क की नई परत खोलती है.

5500 KM दूर मिस्र की रेत में मिला ब्राह्मी का निशान! 2000 साल पुराने शिलालेख ने खोला भारत-रोमन व्यापार का राज
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( Image Source:  Sora AI )

भारत के तामिलनाडु से करीब 5500 किलोमीटर दूर मिस्र की रेत के नीचे दफन 2000 साल पुराना रहस्य आखिरकार सामने आ गया. लाल सागर के किनारे स्थित प्राचीन बंदरगाह बेरेनिके में तमिल-ब्राह्मी लिपि में लिखे नाम मिले हैं, जिसने भारत और रोमन मिस्र के बीच गहरे समुद्री व्यापारिक रिश्तों को लेकर नई बहस छेड़ दी है. अब चर्चा का विषय यह है कि भारतीय व्यापारी वहां बस गए थे? या यह सिर्फ व्यापार का निशान मात्र है.

मिस्र की भारत से कितनी दूरी है?

भारत से मिस्र की सीधी हवाई दूरी लगभग 5500 किलोमीटर है. समुद्री मार्ग से यह दूरी और बढ़ जाती है. क्योंकि जहाज अरब सागर, अदन की खाड़ी और लाल सागर होते हुए पहुंचते हैं. इतनी दूरी के बावजूद पहली सदी ईसा पूर्व से तीसरी सदी ईस्वी तक दोनों क्षेत्रों के बीच सक्रिय व्यापारिक संपर्क था. यह अपने आप में चौकाने वाला है.

मिस्र में तमिल-ब्राह्मी शिलालेख कहां मिले?

तमिल-ब्राह्मी लिपि में लिखे शिलालेख मिस्र के लाल सागर तट पर स्थित प्राचीन रोमन बंदरगाह बेरेनिके (Berenike) में मिले हैं. यह रोमन साम्राज्य का प्रमुख समुद्री व्यापारिक केंद्र था, जहां से भारत, अरब और अफ्रीका के बीच वस्तुओं का आदान-प्रदान होता था.1990 के दशक में खुदाई के दौरान मिट्टी के बर्तनों के टुकड़ों और दीवारों पर तमिल नाम पढ़े गए.

‘कोर्रन’ नाम क्यों बना चर्चा का केंद्र?

खुदाई में “कोर्रन” (Korran) नाम बार-बार मिला. यह नाम संगम साहित्य और चेरा राजवंश से जुड़ा पाया गया है. विशेषज्ञों के अनुसार, कोर्रन तमिल मूल का नाम है. इसका संबंध युद्ध और विजय के अर्थ से भी जोड़ा जाता है. यह नाम बेरेनिके में मिले एक बर्तन पर भी अंकित मिला था. यह संकेत देता है कि भारतीय व्यापारी न केवल वहां पहुंचे, बल्कि अपनी पहचान भी दर्ज कर गए.

ब्राह्मी लिपि कब तक प्रचलन में रही?

ब्राह्मी लिपि का उद्भव तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व माना जाता है. सम्राट अशोक के शिलालेख ब्राह्मी में लिखे गए थे. यह लिपि लगभग चौथी-पांचवीं शताब्दी CE तक प्रचलन में रही और बाद में इससे देवनागरी, बंगाली, तमिल, कन्नड़ जैसी कई आधुनिक लिपियां विकसित हुईं. इसी कारण इसे भारत की 'मदर स्क्रिप्ट' भी कहा जाता है.

तमिलनाडु से मिस्र तक ब्राह्मी कैसे पहुंची?

ऐतिहासिक प्रमाण बताते हैं कि दक्षिण भारत (चेरा-चोल-पांड्य क्षेत्र) का रोमन साम्राज्य से गहरा व्यापार था. मसाले, काली मिर्च, मोती, हाथीदांत और कपास का निर्यात होता था. बदले में सोना और चांदी भारत आते थे. संभावना है कि भारतीय व्यापारी लंबे समय तक मिस्र के बंदरगाहों पर ठहरते थे और अपने नाम या पहचान चिह्न अंकित करते थे. यह सांस्कृतिक उपस्थिति का प्रमाण है, न कि स्थानीय लिपि के रूप में ब्राह्मी के अपनाए जाने का.

क्या यह केवल व्यापार था या स्थायी बसावट?

विशेषज्ञों का मानना है यह व्यापारिक उपस्थिति का संकेत है. भारतीय समुदाय अस्थायी रूप से वहां रहता था. यह 2000 साल पुराने ग्लोबलाइजेशन का प्रमाण है.तमिलनाडु स्टेट डिपार्टमेंट ऑफ आर्कियोलॉजी के विशेषज्ञों ने इसे मालाबार कोस्ट और रोमन साम्राज्य के बीच मजबूत समुद्री नेटवर्क का ठोस साक्ष्य बताया है.

क्यों अहम है यह खोज?

यह भारत के प्राचीन वैश्विक प्रभाव को दर्शाती है. यह संगम युग के व्यापार को प्रमाणित करती है. यह रोमन-भारतीय समुद्री मार्ग की ऐतिहासिक पुष्टि है. मिस्र की रेत में दर्ज यह नाम आज भी 2000 साल पुराने भारतीय व्यापारियों की कहानी कह रहा है

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