Work Life Balance vs Target Culture : चीन आगे क्यों है? हम ‘वर्क-लाइफ बैलेंस’ पर अटके, वो टारगेट पर टिके
Work Life Balance vs Target Culture : इंडियन CEO की चीनी एंटरप्रेन्योर से बातचीत ने वर्क-लाइफ बैलेंस पर नई बहस छेड़ दी. सोशल मीडिया पर लोग चीन की वर्क कल्चर बनाम भारत के मॉडल की तुलना कर रहे हैं.
Work Life Balance vs Target Culture : भारत में वर्क-लाइफ बैलेंस पर बहस तेज है. मेंटल हेल्थ, 9-5 जॉब, वीकेंड ऑफ और सस्टेनेबल लाइफस्टाइल की बातें लगातार चर्चा में रहती हैं. वहीं, चीन की कार्य संस्कृति को अक्सर ‘टारगेट-ड्रिवन’ और ‘नो-नॉनसेंस’ बताया जाता है. सवाल यह है कि क्या चीन की तेज आर्थिक तरक्की के पीछे उसकी सख्त वर्क कल्चर है? या फिर भारत का संतुलित मॉडल ज्यादा टिकाऊ है? यह सिर्फ काम के घंटों की बहस नहीं, बल्कि सोच और प्राथमिकताओं की लड़ाई भी है.
क्या होता है चीनी वर्क कल्चर?
चीन की वर्क कल्चर को अक्सर इन विशेषताओं से जोड़ा जाता है. जैसे 996 मॉडल यानी सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक, हफ्ते में 6 दिन काम. हालांकि, इस मॉडल की आलोचना भी हुई है, लेकिन कई स्टार्टअप्स और टेक कंपनियों में यह प्रचलित रहा.
चीनी उद्यमी ध्यान बहस पर नहीं, बल्कि आउटपुट पर होता है. टारगेट पूरा करना प्राथमिकता मानी जाती है. कंपनी के लक्ष्य को व्यक्तिगत सुविधा से ऊपर रखा जाता है. कई विश्लेषक मानते हैं कि चीन में आर्थिक प्रगति को व्यक्तिगत उपलब्धि से जोड़ा जाता है. हालांकि, यह भी सच है कि चीन में अब ‘ओवरवर्क’ के खिलाफ आवाजें उठ रही हैं और सरकार भी टेक सेक्टर में सख्ती कर चुकी है.
भारत में वर्क-लाइफ बैलेंस का मतलब क्या है?
भारत में वर्क-लाइफ बैलेंस की चर्चा इन मुद्दों से जुड़ी होती है. जैसे युवा प्रोफेशनल अब मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दे रहे हैं.फ्लेक्सिबल वर्क मॉडल, वर्क फ्रॉम होम, हाइब्रिड जॉब और फिक्स्ड वर्किंग आवर्स की मांग बढ़ी है. कुछ उद्योगपति ‘हसल कल्चर’ का समर्थन करते हैं, तो कई लीडर्स सस्टेनेबल ग्रोथ मॉडल की वकालत करते हैं. भारतीय समाज में पारिवारिक जिम्मेदारियों को भी करियर जितना अहम माना जाता है.
असली सवाल क्या है?
यह सिर्फ भारत बनाम चीन की तुलना नहीं है. असल सवाल है कि क्या तेज विकास के लिए कठोर वर्क कल्चर जरूरी है? या लंबी दौड़ में संतुलन ही सफलता की कुंजी है? दोनों मॉडलों के अपने फायदे और जोखिम हैं. चीन की तेज रफ्तार है, तो भारत का डेमोग्राफिक डिविडेंड और इनोवेशन पोटेंशियल भी कम नहीं.
चीन की सोच: ‘वर्क-लाइफ बैलेंस’ नहीं, सिर्फ काम या निजी समय
एनर्जी AI लैब्स के फाउंडर शुभम मिश्रा ने एक चीनी एंटरप्रेन्योर के साथ बातचीत साझा की, जिसमें उन्हें साफ जवाब मिला, “हम वर्क-लाइफ बैलेंस की बहस में विश्वास नहीं करते.” यह बयान भारत-चीन बिजनेस माइंडसेट की तुलना को फिर चर्चा में ले आया है.
इंडियन CEO ने पूछा था सीधा सवाल
शुभम मिश्रा ने अपने संभावित चीनी डिस्ट्रीब्यूशन पार्टनर से पूछा कि भारतीय और चीनी एंटरप्रेन्योर में सबसे बड़ा अंतर क्या है. उन्हें उम्मीद थी कि जवाब फिलॉसॉफिकल होगा, लेकिन सामने आया बेहद व्यावहारिक दृष्टिकोण.
सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस
इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं. कुछ लोगों ने कहा कि यह ‘फोकस्ड अटेंशन’ की सोच है. वहीं, कई यूजर्स ने सवाल उठाया कि क्या यह मॉडल मानसिक स्वास्थ्य पर दबाव नहीं डालता?
क्या चीन की ग्रोथ का यही मॉडल है?
दरअसल, चीन की तेज आर्थिक प्रगति को अक्सर उसकी ‘हार्ड वर्क’ संस्कृति से जोड़ा जाता है. 996 कल्चर (सुबह 9 से रात 9, हफ्ते में 6 दिन काम) जैसे मॉडल भी चर्चा में रहे हैं. हालांकि चीन में भी अब इस मॉडल की आलोचना बढ़ रही है.
भारत में वर्क-लाइफ बैलेंस की बहस क्यों तेज?
भारत में स्टार्टअप इकोसिस्टम के बढ़ने के साथ ‘हसल कल्चर’ बनाम ‘मेंटल वेल-बीइंग’ की बहस तेज हुई है. कुछ उद्योगपति कहते हैं कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए कड़ी मेहनत जरूरी है. वहीं युवा प्रोफेशनल सस्टेनेबल लाइफस्टाइल की वकालत करते हैं.
शुभम मिश्रा कौन हैं?
शुभम मिश्रा केंद्रीय विद्यालय से स्कूली शिक्षा पाने वाले और IITRAM से हायर एजुकेशन और IIM अहमदाबाद से एग्जीक्यूटिव प्रोग्राम कर चुके हैं. 2025 में Energy AI Labs की स्थापना की. इससे पहले BatteryOK Technologies की शुरुआत की थी.
भारत-चीन बिजनेस माइंडसेट तुलना कितनी सही?
विशेषज्ञ मानते हैं कि हर देश की कार्य-संस्कृति उसके सामाजिक ढांचे, आर्थिक स्थिति और जनसंख्या प्रोफाइल से जुड़ी होती है. इसलिए, सीधे तुलना करना आसान नहीं, लेकिन यह बहस भविष्य के स्टार्टअप इकोसिस्टम को जरूर प्रभावित करेगी.





