गजोधर भैया से डार्क कॉमेडी तक: कैसे बदल गया भारत का स्टैंडअप कॉमेडी कल्चर, क्यों हंस रही है नई पीढ़ी मौत और डिप्रेशन पर?
भारतीय स्टैंडअप कॉमेडी ने पारिवारिक चुटकुलों से निकलकर डार्क ह्यूमर और सामाजिक-राजनीतिक व्यंग्य तक का लंबा सफर तय किया है. नई पीढ़ी की बदलती सोच, ओटीटी और सोशल मीडिया ने इस बदलाव को तेज किया, लेकिन इसके साथ विवाद भी बढ़े.
हम सभी को वो दौर याद है जब लगभग पूरा परिवार टीवी स्क्रीन के सामने बैठकर शेखर सुमन के 'मूवर्स एंड शेकर्स' या 'द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज' में राजू श्रीवास्तव के 'गजोधर भैया' पर ठहाके लगाता था. वो एक ऐसा दौर था जहां चुटकुले साफ-सुथरे, पारिवारिक और सामाजिक मर्यादाओं के दायरे में बंधे होते थे. लेकिन आज, वक्त पूरी तरह बदल चुका है. आज की युथ जनरेशन बंद कमरों, कश लगाते युथ और डिम लाइट कॉमेडी क्लब्स में बैठकर ऐसे जोक्स पर ठहाके लगा रही है, जिन्हें सुनकर शायद पुरानी जनरेशन के लोग अपने कान बंद कर लें. बात सिर्फ 'डबल मीनिंग' जोक्स तक नहीं रही है. अब बात हो रही है मौत, डिप्रेशन, सुसाइड, आतंकवाद और गंभीर बीमारियों पर बनने वाले जोक्स जो कब 'डार्क कॉमेडी' में बदल गए इसका पता ही नहीं चला.
जब 'चुटकुलों' से शुरू हुआ था सफर
भारत में स्टैंडअप कॉमेडी का इतिहास कोई 10-15 साल पुराना नहीं है. अगर हम इसकी जड़ों में जाएं तो, हमारे देश में 'हास्य कवि सम्मेलनों' और 'मुशायरों' की एक बेहद समृद्ध परंपरा रही है. सुरेंद्र शर्मा, काका हाथरसी और अशोक चक्रधर जैसे दिग्गजों ने मंच से जोक्स सुनाने की कला को बहुत पहले ही स्टैब्लिश कर दिया था. उनका अंदाज स्टैंडअप कॉमेडी से बहुत अलग नहीं था, बस जरिया कविता का था. इसके बाद आया टीवी का दौर 90 के दशक के आखिर में और 2000 की शुरुआत में टीवी ने कॉमेडी जॉनर को एक नया मंच दिया. 'द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज' ने देश को राजू श्रीवास्तव, सुनील पाल, एहसान कुरैशी और भगवंत मान जो अब पंजाब के मुख्यमंत्री हैं, जैसे नायाब सितारे दिए. यह कॉमेडी का 'गोल्डन एरा' था, जहां जोक्स रोजमर्रा की जिंदगी, शादियों, पड़ोसियों और ट्रेन के सफरों पर आधारित होते थे. इन्हें 'ऑब्जर्वेशनल कॉमेडी' कहा जाता था, जिसे दादा-दादी से लेकर पोता-पोती तक, सब साथ बैठकर देख सकते थे.
स्टैंडअप कॉमेडी 2.0
साल 2010 के आसपास भारत के बड़े महानगरों मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु में एक खामोश क्रांति आकार ले रही थी. अंग्रेजी बोलने वाले और विदेशों से पढ़कर लौटे कुछ युवाओं ने भारत के पब और कैफे में 'ओपन माइक' कल्चर की शुरुआत की. 'द कैनवास लाफ्टर क्लब' जैसे वेन्यू ने इस कल्चर को इंस्टीटूशनल फॉर्म दिया. वीर दास, पापा रंजीत, तन्मय भट्ट, गुरसिमरन खंबा और रोहन जोशी जैसे नाम इस शुरुआती दौर के अगुआ बने. इस कल्चर को असली पंख मिले साल 2013-14 के आसपास, जब देश में यूट्यूब और सस्ते इंटरनेट जियो क्रान्ति का विस्फोट हुआ. 'ऑल इंडिया बकचोद' (AIB) और 'इस्ट इंडिया कॉमेडी' (EIC) जैसे ग्रुप्स ने यूट्यूब पर ऐसे वीडियो डालने शुरू किए, जो सीधे तौर पर युवाओं की भाषा में थे.
नो बीप विद नॉन-स्टॉप कॉमेडी
अब कॉमेडी टीवी के सेंसरशिप वाले दायरे से बाहर आ चुकी थी. यूट्यूब पर न कोई बीप था, न कोई रोक-टोक. युवाओं को एक ऐसा मंच मिल गया था जहां वे राजनीति, डेटिंग, सेक्स और धर्म जैसे उन मुद्दों पर खुलकर बात कर सकते थे, जिन पर घरों में बात करना भी पाप समझा जाता था. जाकिर खान के 'सख्त लौंडा' अवतार, कनीज सुरका के इम्प्रोव और अभिषेक उपमन्यु के देसी-मॉडर्न मिक्स्ड अंदाज ने स्टैंडअप कॉमेडी को भारत के कोने-कोने तक पहुंचा दिया. देखते ही देखते, यह एक फुल-टाइम और बेहद कमाऊ प्रोफेशन बन गया.
'लाइट' से 'डार्क' की ओर कैसे बदले जोक्स के मायने?
अब आते हैं उस मोड़ पर, जिसने कॉमेडी की पूरी परिभाषा को ही पलट कर रख दिया. शुरुआत में जो स्टैंडअप कॉमेडी रिलेशनशिप, इंजीनियरिंग लाइफ, और मम्मी-पापा के तानों के इर्द-गिर्द घूमती थी, वह धीरे-धीरे 'डार्क' होने लगी.
आखिर क्या है डार्क कॉमेडी?
'डार्क कॉमेडी या ब्लैक कॉमेडी' कॉमिक का वो जॉनर है. जिसमें उन विषयों पर मजाक बनाया जाता है जो आमतौर पर समाज में 'वर्जित' (Taboo), डरावने या बेहद गंभीर माने जाते हैं. जैसे- मौत, मानसिक बीमारी, रेप, वॉर, नस्लवाद या कोई बड़ी त्रासदी. इसका मकसद किसी का दिल दुखाना नहीं, बल्कि एक कड़वी सच्चाई को हंसी के लिफाफे में लपेटकर पेश करना होता है.
क्यों बदला जोक्स का मिजाज?
आज की जनरेशन (Gen Z और Millennials) ज्यादातर फ्रस्ट्रेशन माहौल में जी रही है. करियर का प्रेशर, अकेलापन और सोशल मीडिया की नकली दुनिया ने युवाओं में एक अजीब तरह की निराशा पैदा की है. डार्क कॉमेडी इसी निराशा को बाहर निकालने का एक जरिया बन गई. नेटफ्लिक्स और एमेज़न प्राइम जैसी ओटीटी साइट्स के आने से भारतीय दर्शकों को लुई सी.के. (Louis C.K.), रिकी जर्विस (Ricky Gervais), जॉर्ज कार्लिन (George Carlin) और डैनियल स्लोस (Daniel Sloss) जैसे ग्लोबल डार्क कॉमेडियन्स का चस्का लगा. भारतीय कलाकारों ने भी महसूस किया कि दर्शक अब 'सर्फ एक्सेल के विज्ञापन' वाले जोक्स से आगे बढ़ चुके हैं. हालांकि स्टैंडअप कॉमेडियन को अपने खुले जोक्स के लिए विरोध और जेल की हवा भी खानी पड़ी. मुनव्वर फारूकी को 'रामायण' पर जोके भारी पड़ा उन्हें जेल जाना पड़ा, कई शहरों में शोज़ कैंसिल हुए. एक्टर-कॉमेडियन वीर दास को 'दो भारत' कविता के लिए देशद्रोह के आरोप लगे, सोशल मीडिया पर हफ्तों तक बॉयकॉट ट्रेंड हुआ. इन विवादों ने यह साबित कर दिया कि भारत में डार्क कॉमेडी करना 'नंगे पैर तलवार की धार पर चलने' जैसा है. यहां कब कौन सी पंचलाइन किसी की आस्था, राजनीति या भावनाओं को ठेस पहुंचा दे, कोई नहीं जानता.
ये नहीं रुकने वाली
आज भारत में स्टैंडअप कॉमेडी इंडस्ट्री करोड़ों रुपये का टर्नओवर कर रही है. अब यह सिर्फ यूट्यूब वीडियो तक सीमित नहीं है. अब कॉमेडियंस के पास सोल्ड-आउट देश-विदेश के टूर हैं, ओटीटी पर खुद के स्पेशल शो हैं और वे बकायदा ब्रांड एंडोर्समेंट कर रहे हैं. जहां तक 'डार्क कॉमेडी' का सवाल है, यह कल्चर भारत में थमने वाला नहीं है. हालांकि, भारतीय कॉमेडियंस अब थोड़े ज्यादा अलर्ट और मैच्योर हो रहे हैं.




