Begin typing your search...

साहिर लुधियानवी: मोहब्बत, बग़ावत और दर्द का शायर, अमृता प्रीतम से अधूरी मोहब्बत और लता से अदावत की कहानी

साहिर लुधियानवी की बर्थ एनिवर्सरी पर जानिए उनकी ज़िंदगी की दर्दभरी कहानी—अमृता प्रीतम से अधूरी मोहब्बत, लता मंगेशकर से विवाद और बेमिसाल शायरी का सफर.

sahir ludhianvi birth anniversary love story amrita pritam lata mangeshkar controversy
X
( Image Source:  Instagram: filmhistorypics )
रूपाली राय
Edited By: रूपाली राय6 Mins Read

Published on: 8 March 2026 8:45 AM

साहिर लुधियानवी (Sahir Ludhianvi) की ज़िंदगी एक ऐसी दास्तान है, जो दर्द, मोहब्बत, बग़ावत और शब्दों के जादू से बुनी गई है. जितना लिखा जाए, उतना कम; जितना पढ़ा जाए, वो भी कम. आज उनकी बर्थ एनिवर्सरी है है हालांकि 25 अक्टूबर 1980 को मुंबई में दिल का दौरा पड़ने से वो हमसे हमेशा के लिए बिछड़ गए थे. लेकिन उनकी नज़्में, ग़ज़लें, फिल्मी गीत आज भी ज़िंदा हैं, दिलों में सांस लेते हैं.

8 मार्च 1921 को लुधियाना के करीमपुरा में एक अमीर ज़मींदार परिवार में अब्दुल हई के रूप में जन्मे साहिर. पिता चौधरी फ़ज़ल मुहम्मद—एक ऐसे शख्स, जिन्होंने कई निकाह किए, और घर में तानाशाही चलाई. मां सरदार बेगम कश्मीरी मूल की, जो पति के ज़ुल्म सहते-सहते टूट गईं. साहिर महज़ छह महीने के थे, जब मां ने सब कुछ छोड़कर घर छोड़ दिया. पिता ने वारिस होने के डर से मुकदमा ठोका, लेकिन हार गए. फिर धमकियां दीं बेटे को ज़िंदा नहीं छोड़ेंगे. मां ने दोस्तों की मदद से साहिर की रक्षा की, गहने बेचे, तंगी झेली.

पिता से नफरत

साहिर की पूरी ज़िंदगी में सिर्फ़ एक बार सच्चा प्यार हुआ और एक बार गहरी नफ़रत मां से प्यार, पिता से नफ़रत. अमेरिकी लेखक सुरिंदर देयोल की किताब 'Sahir: A Literary Portrait' में ये बात दर्ज है, और पाकिस्तानी शायर अहमद राही भी इससे सहमत थे. यही दर्द उनकी शायरी में औरत की व्यथा, मां-बेटे के रिश्ते और समाज के अन्याय के रूप में बार-बार उभरा.

पढ़ाई और बग़ावत की शुरुआत

लुधियाना के खालसा हाई स्कूल और फिर गवर्नमेंट कॉलेज में पढ़ाई. कॉलेज में उनकी ग़ज़लें, नज़्में और जोशीली स्पीचेस की धूम मचती थी. आज भी वहां का ऑडिटोरियम उनके नाम पर है. साहिर प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन और ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन से जुड़े, कम्युनिस्ट विचारों से प्रभावित हुए. इसके बाद साहिर 1943 में लाहौर शिफ्ट हुए, 1945 में पहली किताब 'तल्खियां' छपी. लेकिन कम्युनिज्म के समर्थन में बयान देने पर पाकिस्तान सरकार ने गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया. 1949 में वो भारत लौट आए दिल्ली, फिर मुंबई। 70 के दशक में 'परछाइयां' नाम का बंगला बनाया, जहां उन्होंने आखिरी सांस ली.

फिल्मों में एंट्री और वो जादूई दौर

1949 में 'आजादी की राह पर' से शुरुआत, लेकिन असली पहचान 1951 की 'नौजवान' से एस.डी. बर्मन के साथ मिली. 'बाजी', 'प्यासा' (1957) जैसी फिल्मों ने उन्हें अमर कर दिया. गुरु दत्त की टीम का हिस्सा माने जाते थे. 'प्यासा' के बाद एस.डी. बर्मन से आर्टिस्टिक मतभेद हो गया. फिर यश चोपड़ा की कई फिल्मों में चमके 'कभी कभी', 'कभी कभी मेरे दिल में'. हिट गाने 'साथी हाथ बढ़ाना', 'औरत ने जनम दिया मर्दों को', 'मैं पल दो पल का शायर हूं', 'ईश्वर अल्लाह तेरे नाम...' आदि.

लता मंगेशकर से वो अदावत का किस्सा

साहिर और लता ने कई सदाबहार गाने दिए, लेकिन 2 साल तक साथ काम नहीं किया. वजह? एक फिल्ममेकर ने लता के सामने ही कहा 'साहिर के गाने लता की आवाज़ के बिना बेजान हैं.' ये बात साहिर को चुभ गई. उन्होंने ठान लिया साबित करेंगे कि उनकी शायरी लता की मोहताज नहीं. फिर सुधा मल्होत्रा ने उनके कई गाने गाए. साहिर ने सुधा को प्रमोट किया, और यहीं से उनका नाम जुड़ गया. बाद में दोनों ने फिर काम किया, लेकिन वो ताव और अहंकार की कहानी आज भी चर्चित है.

सुधा मल्होत्रा- एक अफवाह, एक गाना, एक अधूरा सिलसिला

सुधा मल्होत्रा मशहूर प्लेबैक सिंगर, पद्म श्री से सम्मानित थी. 1950 के अंत में अफवाहें उड़ीं कि साहिर और सुधा के बीच कुछ है. 1960 में सुधा की शादी गिरिधर मोटवानी से हुई. शादी के बाद ब्लिट्ज मैगज़ीन में दोनों की फोटो छपी, अफवाहें और तेज़. सुधा ने बार-बार इनकार किया, मैगज़ीन ने माफी मांगी. लेकिन मिथक बना रहा कि जब सुधा की शादी तय हुई, तो साहिर ने लिखा, 'चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों.' इसके बाद 'न तुम मेरी तरफ देखो ग़लत-अंदाज़ नज़रों से...' ये नज़्म 1963 की फिल्म 'गुमराह' में महेंद्र कपूर ने गाई, और आज भी सबसे यादगार गीतों में शुमार है. सच क्या है? शायद ये सिर्फ़ अफवाह थी, या शायद साहिर का दर्द था जो शब्दों में ढल गया.

अमृता प्रीतम से अधूरी मोहब्बत

साहिर ने कभी शादी नहीं कि लेकिन कोई थी जो उन्हें बहुत प्यार करती थी. अमृता प्रीतम जो पहले से शादीशुदा थी और लाहौर के पास एक मुशायरे में साहिर को अपना दिल दे बैठी उन्हें वह अपनी शायरी में 'मेरा शायर' और 'मेरा देवता' कहा है. हालांकि उनके जीवन में पेंटर इमरोज़ आएं लेकिन उनकी मोहब्बत सिर्फ और सिर्फ साहिर के लिए ही रही. अमृता की बायोग्राफी 'रसीदी टिकट' में जिक्र है कि जब भी साहिर प्रीतम के घर सिगरेट पीने आते थे वह अक्सर अधजली सिगरेट छोड़ जाया करते थे. जिसे बाद में अमृता उठाकर उसे अपने लबों से लगा लेती थी. कम लोग जानते हैं कि साहिर का पहला गहरा इश्क़ एक हिंदू लड़की प्रेम चौधरी से था. वो टीबी से गुज़र गईं. इस दर्द में साहिर ने 'मरघट' नाम की नज़्म लिखी, जो उनके शुरुआती दर्दनाक इश्क़ की गवाही है. बाद में भी कई मोहब्बतें आईं, लेकिन वो कभी पूरी नहीं हुईं।

bollywood
अगला लेख