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Shabana Azmi की फिल्म Fire में ऐसा क्या? जिसे रोकने के लिए अंडरवियर में हुआ था विरोध, बंद करने पड़े थे सारे शो

1998 में रिलीज हुई दीपा मेहता की 'फायर' ने भारतीय सिनेमा में ऐसा विवाद खड़ा किया कि थिएटरों में तोड़फोड़ हुई, कोर्ट तक मामला पहुंचा और फिल्म को दोबारा सेंसर जांच से गुजरना पड़ा.

Shabana Azmi की फिल्म Fire में ऐसा क्या? जिसे रोकने के लिए अंडरवियर में हुआ था विरोध, बंद करने पड़े थे सारे शो
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( Image Source:  IMDB )
रूपाली राय
By: रूपाली राय7 Mins Read

Updated on: 7 Jun 2026 7:00 AM IST

भारतीय सिनेमा में सेंसर बोर्ड की कैंची चलना कोई नई बात नहीं है. कई बार फिल्मों के कुछ सीन रिलीज से पहले ही हटा दिए जाते हैं, लेकिन कुछ मामलों में दर्शकों के विरोध, सोशल मीडिया पर उठे विवाद या सार्वजनिक नाराजगी के बाद थिएटर में चल रही फिल्मों में भी बदलाव करने पड़े हैं. भारतीय सिनेमा के इतिहास में साल 1996 में एक ऐसी फिल्म बनी, जिसने देश के सामाजिक और राजनीतिक गलियारों में एक ऐसा तूफान खड़ा कर दिया जिसकी गूंज आज भी सुनाई देती है. इस फिल्म का नाम था 'फायर' (Fire). मशहूर निर्देशिका दीपा मेहता द्वारा लिखित और निर्देशित इस फिल्म ने न सिर्फ बोल्डनेस की नई परिभाषा गढ़ी, बल्कि भारत में समलैंगिकता (Homosexuality) जैसे वर्जित विषय पर पहली बार मेनस्ट्रीम के सिनेमा में खुलकर बात की.

क्या है 'फायर' की कहानी?

यह फिल्म भारत-कनाडा के को-प्रोडक्शन में बनी थी, जो दीपा मेहता की प्रसिद्ध 'एलिमेंट्स ट्रिलॉजी' का पहला हिस्सा थी. इसके बाद 1998 में 'अर्थ' और 2005 में 'वाटर' आई. यह फिल्म मशहूर राइटर इस्मत चुगताई की 1942 की प्रसिद्ध कहानी 'लिहाफ' से इंस्पायर्ड है. फिल्म की कहानी दिल्ली के एक पारंपरिक संयुक्त परिवार की है. इस परिवार में दो भाई हैं अशोक और जतिन, जो खाने-पीने और वीडियो कैसेट किराए पर देने की दुकान चलाते हैं. सीता (नंदिता दास) परिवार की छोटी बहू है, जिसकी नई-नई शादी जतिन से हुई है. लेकिन जतिन को सीता में कोई दिलचस्पी नहीं है. उसने यह शादी सिर्फ अपने भाई के दबाव में की थी, जबकि वह अपनी एक चीनी प्रेमिका के प्यार में पागल रहता है और रात-रात भर घर से बाहर रहता है. राधा (शबाना आजमी) परिवार की बड़ी बहू है, जो पिछले 13 सालों से एक नीरस और बिना शारीरिक संबंधों वाली शादी झेल रही है. उसका पति अशोक एक स्थानीय धार्मिक गुरु (स्वामीजी) के प्रभाव में आकर ब्रह्मचर्य का पालन कर रहा है. चूंकि राधा मां नहीं बन सकती, इसलिए अशोक उसे अपनी वासना पर काबू पाने की एक परीक्षा का जरिया बना लेता है, जहां दोनों को रात में बिना हिले-डुले एक-दूसरे के बगल में लेटना पड़ता है.

अकेलेपन से उपजा 'वर्जित' प्यार

घर की दोनों बहुएं दिनभर गर्म रसोई में खटती हैं और लकवाग्रस्त सास (बीजी) की सेवा करती हैं. पतियों द्वारा पूरी तरह ठुकराए जाने और अकेलेपन की घुटन से जूझते हुए, राधा और सीता धीरे-धीरे एक-दूसरे के करीब आने लगती हैं. जहां बड़ी बहू राधा परंपराओं के बोझ तले दबी है, वहीं छोटी बहू सीता अपने इस कड़वे भाग्य को स्वीकार करने से मना कर देती है. सीता की यही बेबाकी राधा को भी हिम्मत देती है. जल्द ही, उनका यह भावनात्मक सहारा एक गहरे, अंतरंग और समलैंगिक (लेस्बियन) रिश्ते में बदल जाता है. वे छुप-छुपकर इस रिश्ते को जीती हैं और अपनी जिंदगी में पहली बार सच्ची खुशी महसूस करती हैं. लेकिन दोनों के रिश्तों की सच्चाई सामने आ जाती है. दोनों का घर में विरोध होता है. लेकिन दोनों एक दूसरे को चुनती है और घर छोड़कर चली जाती है.

कम बजट की फिल्म

इस फिल्म का कुल बजट केवल 800,000 डॉलर था। बजट कम होने के कारण फिल्म के क्रू मेंबर्स ने अपनी लगभग 450,000 डॉलर की सैलरी को बाद में लेने का फैसला किया था. शबाना आज़मी ने साल 2025 में एक इंटरव्यू में खुलासा किया था कि यह फिल्म मूल रूप से हिंदी में ही बनाई जा रही थी. लेकिन शूटिंग शुरू होने से ठीक कुछ दिन पहले इसके डायलॉग्स को अंग्रेजी में बदल दिया गया, क्योंकि मेकर्स को लगा कि उस दौर में हिंदी में ऐसे डायलॉग्स उतने स्वाभाविक नहीं लग रहे थे. फिल्म का क्लाइमेक्स पहले कुछ और था, लेकिन बॉलीवुड एक्टर और निर्देशक फरहान अख्तर की सलाह पर दीपा मेहता ने इसका अंत बदला, जिसे दर्शकों ने पर्दे पर देखा. शबाना आज़मी शुरुआत में इस रोल को करने से डर रही थी. उन्हें लग रहा था कि समलैंगिक किरदार निभाने से उनके सामाजिक और चैरिटी के कामों पर गलत असर पड़ेगा. लेकिन जोया अख्तर और अपने परिवार के समझाने पर वह इस ऐतिहासिक रोल के लिए तैयार हुईं.

रिलीज होते ही क्यों मच गया था बवाल?

मई 1998 में भारत के सेंसर बोर्ड (CBFC) ने इस फिल्म को बिना किसी कट के 'A' (Adults Only) सर्टिफिकेट के साथ पास कर दिया था. बोर्ड की इकलौती शर्त यह थी कि 'सीता' किरदार का नाम बदलकर 'नीता' कर दिया जाए क्योंकि सीता हिंदू धर्म में एक पूजनीय नाम है लेकिन बाद में बोर्ड ने मूल नाम को ही हरी झंडी दे दी. 13 नवंबर 1998 को फिल्म रिलीज हुई और शुरुआती तीन हफ्ते यह देश के बड़े शहरों में हाउसफुल रही. लेकिन इसके बाद विरोध की एक ऐसी आंधी आई जिसने सबको हिलाकर रख दिया.

1. थियेटर्स में तोड़फोड़ और आगजनी

2 दिसंबर 1998 को मुंबई के गोरेगांव में 200 से अधिक शिवसैनिकों ने एक थियेटर पर हमला कर दिया. उन्होंने शीशे तोड़ दिए, पोस्टर्स जलाए और दर्शकों के पैसे वापस करने पर मजबूर किया. अगले ही दिन, दिल्ली के ऐतिहासिक 'रीगल थियेटर' में भी लाठियों से लैस प्रदर्शनकारियों ने जमकर तोड़फोड़ की. सूरत और पुणे में भी सिनेमाघरों में आगजनी की घटनाएं हुईं, जिसके बाद फिल्म के शो बंद करने पड़े.

2. 'संस्कृति खत्म हो जाएगी' का तर्क

विरोध करने वालों का मानना था कि यह फिल्म भारतीय संस्कृति और विवाह संस्था पर हमला है. दिल्ली में प्रदर्शन कर रही एक महिला कार्यकर्ता ने उस वक्त कहा था, 'अगर समलैंगिकता के जरिए महिलाओं की शारीरिक जरूरतें पूरी होने लगीं, तो शादी की व्यवस्था ढह जाएगी और मानव प्रजनन ही रुक जाएगा.' वहीं महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी ने भी तोड़फोड़ करने वालों को बधाई देते हुए कहा था कि फिल्म का विषय हमारी संस्कृति के खिलाफ है.

3. अंडरवियर में विरोध

विवाद इतना बढ़ गया कि सरकार ने फिल्म को दोबारा जांच के लिए सेंसर बोर्ड के पास भेज दिया. इसके विरोध में दीपा मेहता, दिलीप कुमार और महेश भट्ट जैसे दिग्गज सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए और अभिव्यक्ति की आजादी और सुरक्षा की मांग की. इस बात से नाराज होकर करीब 60 शिवसेना कार्यकर्ताओं ने एक्टर दिलीप कुमार के घर के बाहर सिर्फ अपने अंडरवियर में बैठकर एक बेहद अजीब और विवादित विरोध प्रदर्शन किया था. इस भयंकर बवाल, कोर्ट-कचहरी और राजनीतिक दबाव के बावजूद भारतीय सिनेमा और अभिव्यक्ति की आजादी की जीत हुई. सेंसर बोर्ड ने फिल्म को दोबारा देखा और 12 फरवरी 1999 को बिना किसी एक भी कट या बदलाव के इसे दोबारा रिलीज करने की अनुमति दे दी.

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