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क्या अफीम की तरह है मनोरंजन, आचार्य प्रशांत ने बताया अब क्यों इतने बढ़ रहे हैं कॉमेडी शोज

प्रणीत मोरे के शो में 370 रुपये वाली बिरयानी के पैसे वसूलने वाले बयान ने सभी को हैरान कर दिया था. इसी बीच आचार्य प्रशांत ने मनोरंजन और कॉमेडी इंडस्ट्री को लेकर कहा कि एंटरटेनमेंट अक्सर जरूरी मुद्दों से जनता को भटकाने का एक तरीका है.

क्या अफीम की तरह है मनोरंजन, आचार्य प्रशांत ने बताया अब क्यों इतने बढ़ रहे हैं कॉमेडी शोज
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अब क्यों इतने बढ़ रहे हैं कॉमेडी शोज

( Image Source:  instagram-@acharya_prashant_ap )
हेमा पंत
Edited By: हेमा पंत3 Mins Read

Updated on: 16 Jun 2026 2:08 PM IST

हाल ही में कॉमेडियन प्रणीत मोरे के शो से जुड़ा एक मामला सोशल मीडिया पर खूब चर्चा में रहा. शो में पहुंचे शख्स ने लड़की को 370 रुपये की बिरयानी खिलाने के बदले उससे फिजिकल होने की बात कही. इस घटना को लेकर लोगों की अलग-अलग रिएक्शन्स सामने आए.

इसी बीच आचार्य प्रशांत ने मनोरंजन और कॉमेडी इंडस्ट्री को लेकर अपनी राय रखी, जिसने एक नई बहस को जन्म दे दिया. उनका कहना है कि लोग कॉमेडी को खुशी देने वाला जरिए समझते हैं, जबकि असल में यह कई बार समाज को वास्तविक मुद्दों से दूर रखने का काम भी करता है. उन्होंने इसे "अफीम" की तरह बताते हुए कहा कि लोगों को हल्के-फुल्के विषयों में इतना उलझा दिया जाता है कि वे जरूरी मुद्दों पर चर्चा ही नहीं कर पाते हैं.

एंटरटेनमेंट नशा कैसे है?

आचार्य प्रशांत के अनुसार, आज जिस तरह एंटरटेनमेंट का दायरा बढ़ा है, उसके पीछे केवल लोगों को हंसाना ही मकसद नहीं है. उनका मानना है कि मनोरंजन कई बार ऐसे नशे की तरह काम करता है, जो व्यक्ति को कुछ समय के लिए असल समस्याओं को भूलने पर मजबूर कर देता है. उन्होंने सवाल उठाया कि यदि समाज पहले भी मौजूद था तो आज की तुलना में इतने ज्यादा कॉमेडियन और मनोरंजन के सोर्स क्यों नहीं थे.

कैसे बन रहा असली मुद्दों से ध्यान भटकाने का तरीका?

आचार्य प्रशांत का तर्क है कि जब जनता का ध्यान बेरोजगारी, अपराध, शिक्षा व्यवस्था, आर्थिक चुनौतियों और अन्य गंभीर विषयों पर जाना चाहिए, तब अक्सर मनोरंजन से जुड़े मुद्दे सुर्खियों में छा जाते हैं. उनका कहना है कि लोगों के सामने लगातार हल्के-फुल्के और मजेदार विषय परोसे जाते हैं, जिससे जरूरी सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा सीमित हो जाती है.

समाज की असलियत से सामना क्यों जरूरी?

फिलॉसफर ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि लोग देश-दुनिया और अपनी जिंदगी की असल समस्याओं को पूरी गंभीरता से देखने लगें, तो कई बड़े सवाल खड़े हो सकते हैं. उनके अनुसार, लगातार सामने आ रही परीक्षाओं में गड़बड़ियां, रोजगार की चुनौतियां और सामाजिक समस्याएं ऐसे विषय हैं, जिन पर बड़े लेवल पर चर्चा की सख्त जरूरत है. उनका मानना है कि केवल मनोरंजन में उलझे रहने के बजाय समाज को अपने आसपास की वास्तविक परिस्थितियों को भी समझना चाहिए.

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