PoK भारत का है अभिन्न हिस्सा, बिना सबूत Foreigners Act नहीं लगेगा! जम्मू-कश्मीर की अदालत ने ऐसा क्यों कहा?

जम्मू-कश्मीर की अदालत ने बड़ा फैसला देते हुए कहा कि PoK भारत का अभिन्न हिस्सा है और वहां से जुड़े मामलों में बिना ठोस सबूत Foreigners Act लागू नहीं किया जा सकता. अभियोजन पक्ष आरोपियों के अवैध प्रवेश या विदेशी नागरिकता को साबित करने में नाकाम रहा. गवाहों की कमजोरी और जांच अधिकारी की गैरमौजूदगी के चलते अदालत ने दोनों आरोपियों को बरी कर दिया.;

PoK भारत का अभिन्न हिस्सा, बिना सबूत Foreigners Act नहीं लगेगा: J&K कोर्ट

(Image Source:  Sora_ AI )
Edited By :  अच्‍युत कुमार द्विवेदी
Updated On : 29 Jan 2026 10:02 PM IST

जम्मू-कश्मीर की एक अदालत ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) को लेकर एक बेहद अहम और स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा है कि PoK भारत का अभिन्न हिस्सा है. वहां से आने-जाने के आरोपों के आधार पर Foreigners Act तब तक लागू नहीं किया जा सकता, जब तक किसी व्यक्ति के विदेशी नागरिक होने या अवैध प्रवेश के ठोस और विश्वसनीय सबूत पेश न किए जाएं.

चडूरा स्थित न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी स्येद तैयब बुखारी ने State/UT of J&K बनाम मोहम्मद मकबूल रदर व अन्य मामले में यह टिप्पणी करते हुए कहा कि PoK न तो पाकिस्तान का हिस्सा है और न ही वहां जाने मात्र से किसी व्यक्ति को विदेशी माना जा सकता है, क्योंकि वह क्षेत्र भारत का ही हिस्सा है, भले ही अवैध कब्जे में हो.

अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में रही नाकाम

अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा कि आरोपियों ने अवैध रूप से सीमा पार की, हथियारों की ट्रेनिंग ली या Foreigners Act का उल्लंघन किया. कोर्ट के मुताबिक, न तो कोई ट्रैवल रिकॉर्ड, न बॉर्डर क्रॉसिंग डिटेल, न इंटेलिजेंस इनपुट और न ही कोई रिकवरी मेमो पेश किया गया.

क्या है मामला?

यह मामला उन आरोपों से जुड़ा था, जिसमें कहा गया था कि मोहम्मद मकबूल रदर करीब दो दशक पहले PoK गया, वहां हथियारों की ट्रेनिंग ली, शादी की और बाद में पत्नी परवीन अख्तर व बच्चों के साथ बिना वैध दस्तावेजों के जम्मू-कश्मीर लौट आया. अगस्त 2012 में पुलिस को मिली कथित सूचना के आधार पर Enemy Agents Ordinance और Foreigners Act के तहत मामला दर्ज किया गया था.

2018 में दाखिल हुई चार्जशीट

हालांकि, जांच पूरी होने के बाद 2018 में चार्जशीट दाखिल हुई, लेकिन ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष की कमजोरी साफ सामने आ गई. कुल आठ गवाहों में से सिर्फ दो को अदालत में पेश किया गया, जबकि जांच अधिकारी को कभी गवाही के लिए बुलाया ही नहीं गया। जून 2025 में अभियोजन साक्ष्य बंद कर दिए गए.

बयान से पलटा एक गवाह

क्रॉस एग्ज़ामिनेशन के दौरान एक गवाह ने स्वीकार किया कि उसे आरोपी के पाकिस्तान जाने की कोई व्यक्तिगत जानकारी नहीं है, जबकि दूसरे गवाह ने अपने पुराने बयान से पलटते हुए आरोपों को झूठा और निराधार बताया. अदालत ने इन गवाहियों को हियर्से (सुनी-सुनाई बातें) और अविश्वसनीय करार दिया.

कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आपराधिक न्यायशास्त्र में संदेह, चाहे कितना भी गंभीर क्यों न हो, ठोस सबूत का विकल्प नहीं हो सकता. जांच अधिकारी का पेश न होना, दस्तावेजी साक्ष्यों का अभाव और अपराध के आवश्यक तत्वों को सिद्ध न कर पाना अभियोजन के लिए घातक साबित हुआ. इन तमाम कारणों के चलते अदालत ने दोनों आरोपियों को सभी आरोपों से बरी करते हुए उनकी जमानत समाप्त की और जब्त संपत्ति को रिलीज करने के आदेश दिए.

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