जापान में 73 महिला सांसद के बीच क्या है टॉयलेट का विवाद? PM भी परेशान, ताकाइची को भी वॉशरूम जाने के लिए लगानी होती है लाइन
जापान की संसद में 73 महिला सांसदों की मौजूदगी के बाद एक अनोखा विवाद सामने आया है. संसद भवन में महिलाओं के लिए पर्याप्त शौचालय न होने के कारण उन्हें प्लेनरी सत्र से पहले लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ता है. इस समस्या पर वरिष्ठ नेता और प्रधानमंत्री पद की दावेदार साने ताकाइची ने भी चिंता जताई है. मामला संसद की बुनियादी सुविधाओं और लैंगिक समानता पर सवाल खड़े कर रहा है.;
जापान की संसद में इन दिनों एक ऐसा मुद्दा गरमाया है, जिसने जेंडर इक्वैलिटी और बुनियादी सुविधाओं पर नई बहस छेड़ दी है. देश की नई प्रधानमंत्री साने ताकाइची समेत करीब 60 महिला सांसदों ने संसद भवन में महिलाओं के लिए ज्यादा टॉयलेट बनाने की मांग करते हुए एक औपचारिक याचिका दी है. याचिका में साफ कहा गया है कि संसद में महिलाओं की संख्या बढ़ी है, लेकिन सुविधाएं अब भी दशकों पुरानी सोच में अटकी हुई हैं.
स्टेट मिरर अब WhatsApp पर भी, सब्सक्राइब करने के लिए क्लिक करें
महिला सांसदों का कहना है कि संसद सत्र के दौरान उन्हें टॉयलेट के बाहर लंबी लाइनों में खड़ा होना पड़ता है, जिससे न सिर्फ असहज स्थिति बनती है, बल्कि उनके कामकाज पर भी असर पड़ता है. यह मांग ऐसे समय में सामने आई है, जब जापान पहले से ही ग्लोबल जेंडर गैप रैंकिंग में काफी पीछे चल रहा है.
सिर्फ 1 टॉयलेट, 73 महिला सांसद
याचिका के मुताबिक, जापान की संसद के निचले सदन में इस समय 73 महिला सांसद हैं, लेकिन मुख्य प्लेनरी सेशन हॉल के पास महिलाओं के लिए सिर्फ एक टॉयलेट है, जिसमें महज़ दो क्यूबिकल मौजूद हैं. इसके उलट, पुरुष सांसदों के लिए आसपास ही कई टॉयलेट उपलब्ध हैं. विपक्षी कांस्टीट्यूशनल डेमोक्रेटिक पार्टी की सांसद यासुको कोमियामा ने कहा कि 'प्लेनरी सत्र शुरू होने से पहले सचमुच इतनी सारी महिला सांसदों को टॉयलेट के बाहर लंबी कतार में खड़ा होना पड़ता है.' उन्होंने यह बयान निचले सदन की नियम और प्रशासन समिति के अध्यक्ष यासुकाज़ू हमादा को याचिका सौंपने के बाद दिया.
1936 में बनी संसद, तब महिलाओं को वोट का हक भी नहीं था
जापान की संसद (डाइट) की इमारत 1936 में बनी थी. उस समय न सिर्फ संसद में महिलाएं नहीं थीं, बल्कि देश में महिलाओं को वोट देने का अधिकार तक नहीं मिला था. दूसरे विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद दिसंबर 1945 में महिलाओं को मतदान का अधिकार मिला और 1946 में पहली बार महिलाएं संसद में चुनी गईं. यॉमियूरी शिंबुन अखबार के मुताबिक, निचले सदन की पूरी इमारत में पुरुषों के लिए 12 टॉयलेट (67 स्टॉल) महिलाओं के लिए सिर्फ 9 टॉयलेट (22 क्यूबिकल) हैं.
मुख्य प्लेनरी हॉल के पास महिलाओं के लिए सिर्फ एक ही टॉयलेट होने के कारण कई बार महिला सांसदों को बिल्डिंग के दूसरे हिस्से तक जाना पड़ता है. वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2024 में जापान 148 देशों में 118वें स्थान पर रहा. रिपोर्ट के मुताबिक, जापान में महिलाओं की भागीदारी न सिर्फ राजनीति, बल्कि कारोबार और मीडिया में भी बेहद कम है. चुनावों के दौरान महिला उम्मीदवारों का कहना है कि उन्हें अक्सर सेक्सिस्ट टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है, जैसे- उन्हें राजनीति छोड़कर घर पर बच्चों की देखभाल करने की सलाह दी जाती है.
संसद में महिलाएं बढ़ीं, लेकिन बराबरी अभी दूर
फिलहाल जापान के निचले सदन में 465 सांसदों में से 72 महिलाएं हैं, जो पिछली संसद में 45 थीं. वहीं ऊपरी सदन में 248 में से 74 सदस्य महिलाएं हैं. सरकार का आधिकारिक लक्ष्य है कि संसद की कम से कम 30% सीटों पर महिलाएं हों. 'यह प्रगति का संकेत भी है, और असमानता का सबूत भी', यासुको कोमियामा ने इस मुद्दे को दोहरे नजरिये से देखते हुए कहा कि 'एक तरह से यह इस बात का प्रतीक है कि महिला सांसदों की संख्या बढ़ी है.'
उन्होंने उम्मीद जताई कि यह मांग सिर्फ टॉयलेट तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी ज्यादा समानता का रास्ता खोलेगी. गौरतलब है कि प्रधानमंत्री साने ताकाइची हाल ही में रात 3 बजे मीटिंग बुलाने को लेकर भी चर्चा में रहीं. उनके 'वर्क लाइफ बैलेंस पर भरोसा नहीं' और 'घोड़े की तरह काम करने' वाले बयान ने जापान में वर्क कल्चर और महिलाओं की सेहत पर नई बहस छेड़ दी है.