"रात भर गूंजते रहे धमाके", ईरान-इजराइल जंग के बीच फंसे भारतीयों की दिल दहला देने वाली आपबीती

ईरान-इजराइल और अमेरिका के बीच छिड़े टकराव ने मिडिल ईस्ट को जंग के मुहाने पर ला खड़ा किया है. मिसाइलों, सायरन और धमाकों के बीच सैकड़ों भारतीय छात्र और कामगार खाड़ी देशों में फंसे हुए हैं, जो हर पल अनिश्चितता और डर के साए में जी रहे हैं.

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Edited By :  समी सिद्दीकी
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Israel-Iran War News: 'यहां हालात बहुत संजीदा है, सच कहूं तो कुछ भी हो सकता है, ये कहना है रऊस नाम के एक छात्र का, जो अमेरिका और इजराइल के हमले के बाद से ईरान में फंसा हुआ है. 28 फरवरी को हुए इस ज्वाइंट ऑपरेशन में ईरान की लीडरशिप को निशाना बनाया गया था, जिसके बाद ईरान ने अमेरिका के अलग-अलग देशों में बने मिलिट्री बेस और एंबेसी पर हमले शुरू कर दिए थे. इसकी वजह से फ्लाइंट्स कैंसिल हुईं और लोग खाड़ी के देशों में फंस गए.

इनमें से कई लोग ऐसे थे जो वहां पढ़ते थे, कुछ बिज़नेस के सिलसिले से गए हुए थे और कुछ वहां नौकरी पेशा थे जो किराए की घरों और कमरों में रहते थे. अमेरिका और इजराइल के इन हमलों ने ईरान के सुप्रीम लीडर भी मारे गए.

"रात भर मैं सुनता रहा धमाकों की आवाज़"

"मैं मूंसा रऊस हूं. श्रीनगर से हूं और उर्मिया यूनिवर्सिटी में मेडिसिन की पढ़ाई कर रहा हूं. सच कहूं तो यहां हालात काफी तनावपूर्ण हैं. सब कुछ अनिश्चित है. कल सुबह और रात, दोनों समय धमाकों की आवाजें आईं. हम अक्सर लड़ाकू विमानों की आवाज सुनते हैं, फिर उसके बाद जोरदार धमाके होते हैं. रात करीब 2 बजे बहुत तेज आवाज आई. ऐसा लगा कि धमाके हमसे महज तीन-चार किलोमीटर दूर हो रहे हैं."

मूसा ने डरी हुई आवाज़ में अपनी आपबीती सुनाई. उनकी आवाज़ में खौफ साफ तौर पर दिख रहा था. उनका कहना था कि इजराइल की तरफ से आते मिसाइलों की आवाज़ें सैकड़ों भारतीयों छत्रों को अंदर से हिला कर रख देती है. उन्होंने बताया कि यूनिवर्सिटी प्रशासन ने हमें डॉर्मिटरी के अंदर ही रहने का निर्देश दिया है. कहा गया है कि एक जगह पर रहें, ताकि अगर अचानक निकासी (एवैक्युएशन) हो तो सभी को एक साथ सुरक्षित निकाला जा सके.

"मैंने अपनी आंखों से देखीं मिसाइलें"

"मेरा नाम मुशर्रफ है और मैं उर्मिया में पढ़ाई करता हूं. यहां का माहौल बहुत तनावपूर्ण है, सुबह करीब 9 बजे मैंने कम से कम छह मिसाइलें देखीं. अब यूनिवर्सिटी सहयोग कर रही है. हम भारतीय दूतावास के संपर्क में हैं. उन्होंने कहा है कि आगे क्या करना है, इसकी जानकारी जल्द दी जाएगी.

उन्होंने निकलने के बारे में जानकारी दी और कहा कि तेहरान में हालात ज्यादा तनावपूर्ण बताए जा रहे हैं. वह कहते हैं कि अगर एवाक्वेशन होता है तो हमें प्राथमिकता दी जाए. यूनिवर्सिटी बसों की व्यवस्था करेगी और हमें आर्मेनिया या अजरबैजान की सीमा तक पहुंचाने में मदद करेगी. इसके बाद दूतावास अगला कदम बताएगा."

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जब ईरान पर हमला हुआ तो ईरान ने अमेरिकी एयरबेसेस को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया. दुबई, कतर, अबू धाबी, बहरीन, जॉर्डन समेत कई जगहों पर अमेरिका मिलिट्री बेस और दूतावास को निशाना बनाया गया. खतरे को देखते हुए अबू धाबी जाने और आने वाली फ्लाइट्स भी कैंसिल हो गईं. यहां फंसे लोगों ने भी अपनी आपबीती बताएं.

"चेक एन एरिया पहुंचा तो बजने लगे अलार्म"

अबू धाबी में फंसा एक सख्स कहता है,"मैं सौरभ शेट्टी हूं, मंगलुरु से हूं और अबू धाबी में एक ऑयल कंपनी में काम करता हूं. 28 फरवरी को जब मैं फ्लाइट पकड़ने एयरपोर्ट पहुंचा, सब कुछ सामान्य लग रहा था. अचानक चेक-इन एरिया के पास अलार्म बजा और हमें नीचे बैठने को कहा गया. चेतावनी दी गई कि खिड़कियों के पास न बैठें, क्योंकि मिसाइल का खतरा है.

किसी ने कहा, "मिसाइल आने वाली है.” हम हैरान रह गए, हमें लगा था कि अबू धाबी सबसे सुरक्षित शहरों में से एक है. बाद में बाहर देखा तो एक मिसाइल दिखाई दी. शुक्र है कि हम एयरपोर्ट के अंदर सुरक्षित थे, लेकिन वह पल बेहद डरावना था."

एक महिला नें भी अपनी आपबीती बताई और इसे अपनी ज़िंदगी का सबसे डरावना मंज़र करार दिया. वह कहती हैं,"मैं राम्या हूं, बेंगलुरु से. मैं दुबई और अबू धाबी गई थी. हमारी वापसी की फ्लाइट पहले रद्द कर दी गई. 2 मार्च को एतिहाद ने हमारे लिए दूसरी फ्लाइट की व्यवस्था की, ये बेहद डरावना मंजर था, समझ नहीं आ रहा था कि हम क्या करें."

इन सभी आवाजों में एक बात समान है, डर के बीच उम्मीद. जंग की आग भले ही सीमाओं पर भड़क रही हो, लेकिन सबसे बड़ी चिंता उन लोगों की है जो उससे दूर रहकर भी उसके साए में जी रहे हैं. जो लोग खाड़ी के देशों में फंसे हुए हैं उनके परिवार भी उनके लिए चिंतित हैं.

मन में एक ही सवाल, कब खत्म होगी जंग?

ईरान-यूएस और इजराइल की यह जंग कब खत्म होगी इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है. ट्रंप ने साफ किया है कि वह इस जंग को आगे भी खींच सकते हैं. लेकिन यह जंग उन लोगों के लिए बड़ी मुसीबत बनी है जो पराय देशों में फंसे हुए हैं.

जंग का डर और घर लौटने की आस में एक शख्स कहता है,"मैं निरुबन हूं, कोयंबटूर से. यहां हमने तेज आवाजें सुनीं और जमीन में कंपन महसूस किया. इंटरसेप्शन हो रहे थे और बताया गया कि कुछ मलबा एयरपोर्ट के पास गिरा है. दुबई की स्थिति को इससे भी ज्यादा खराब बताई गई है. बैचेनी भरी आवाज में उन्होंने कहा, "हालांकि, स्थानीय प्रशासन ने हमें मुफ्त में ठहरने की व्यवस्था दी है."

निरुबन अब घर लौट आए हैं और उन्होंने वहां फंसे लोगों से अपील की है कि वह सरकार की गाइडलाइंस का पालन करें.

"घर कैसे लौटें, नहीं है कोई रास्ता"

एक महिला जो ईरान में फंसी हैं और हर घंटे विस्फोट की आवाज़ें उनके कानों में गूंज रही हैं, डरी हुई आवाज़ में कहती हैं कि मेरा नाम आयशा है, मैं श्रीनगर से हूं. पहले एक एडवाइजरी जारी हुई थी, लेकिन उस समय हमारी यूनिवर्सिटी ने सहयोग नहीं किया. हमारे पास घर लौटने का कोई रास्ता नहीं है. हम भारतीय दूतावास से अनुरोध करते हैं कि हमें जल्द से जल्द वापस भेजा जाए. हमने तेहरान में एक छात्र से बात की है, उसे अंडरग्राउंड शिफ्ट किया जा रहा है. उर्मिया में हालात कुछ हद तक नियंत्रण में हैं, लेकिन डर बना हुआ है.

मिडिल ईस्ट में बिगड़ते हुए हालातों में भारतीय सरकार के लिए यह बड़ा चैलेंज है कि वह वहां फंसे लोगों को सुरक्षित बाहर निकाले. अगर ये जंग आगे बढ़ती है तो पलायन करने वालों की भी तादात बढ़ेगी ऐसे में भारत का उन्हें निकलनें के लिए क्या प्लान होगा इस पर भी विचार करना जरूरी है.

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