एक ड्रोन अटैक निकाल देगा US की हेकड़ी! चीनी प्रोफेसर का खास प्लान, जिससे बिना गोली चलाए Iran जीत जाएगा जंग
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अब युद्ध केवल मिसाइलों और बमों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि रणनीतिक कमजोरियों को निशाना बनाने की चर्चा भी तेज हो गई है. एक चीनी प्रोफेसर ने दावा किया है कि ईरान चाहे तो बिना एक भी गोली चलाए खाड़ी देशों और अमेरिका पर भारी दबाव बना सकता है.
Iran-US-Israel War: मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच जंग के तरीके भी तेजी से बदलते दिखाई दे रहे हैं. अब केवल मिसाइल और बम ही नहीं, बल्कि रणनीति और कमजोरियों को निशाना बनाने की सोच भी चर्चा में है. इसी संदर्भ में एक चीनी प्रोफेसर का एनालीसिस सामने आया है, जिसमें उन्होंने कहा है कि ईरान यदि चाहे तो बिना एक भी गोली चलाए अमेरिका और खाड़ी के देशों की बोलती बंद कर सकता है.
ज्ञात हो कि इस जंग की शुरुआत 28 फरवरी को इजराइल और ईरान के ज्वाइंट ऑपरेशन के बाद हुई थी. इस दौरान दोनों देशों ने मिलकर ईरान की टॉप लीडरशिप को निशाना बनाया था. जिसमें, सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई थी.
प्रोफेसर ने ईरान को क्या प्लान सुझाया?
प्रोफेसर के मुताबिक खाड़ी क्षेत्र की सबसे बड़ी कमजोरी वहां के पानी के स्रोत हैं. उनका कहना है कि सऊदी अरब, कतर, बहरीन और अन्य खाड़ी देशों में प्राकृतिक मीठे पानी के स्रोत बहुत कम हैं. इन देशों में पीने लायक करीब 60 फीसद पानी समुद्र के खारे पानी को मीठा बनाने की प्रक्रिया, यानी डिसेलिनेशन, के जरिए तैयार किया जाता है. इसके लिए बड़े-बड़े प्लांट और मशीनों पर निर्भर रहना पड़ता है.
प्रोफेसर का कहना है कि अगर इन प्लांट्स को किसी हमले में नुकसान पहुंचता है और वे काम करना बंद कर दें, तो कुछ ही घंटों में वहां पानी का गंभीर संकट पैदा हो सकता है. ऐसी स्थिति में लाखों लोग पानी के लिए परेशान हो सकते हैं और हालात तेजी से बिगड़ सकते हैं. इससे खाड़ी के देशों पर तेजी से प्रभाव पड़ेगा और इसका इंडायरेक्ट असर अमेरिका पर भी होगा.
किस देश को है ज्यादा खतरा?
सऊदी अरब के तट पर मौजूद जुबैल डीसैलिनेशन प्लांट को रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जाता है. यह प्लांट करीब 500 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन से जुड़ा है, जिसके जरिए राजधानी रियाद तक पानी पहुंचाया जाता है. बताया जाता है कि रियाद की लगभग 90 प्रतिशत पानी की आपूर्ति इसी सिस्टम पर निर्भर करती है.
2008 में विकीलीक्स के जरिए सामने आए एक खुलासे में सऊदी अरब में अमेरिकी दूतावास के एक मेमो का जिक्र किया गया था. इस मेमो में कहा गया था कि अगर इस पाइपलाइन या इससे जुड़ी सुविधाओं को किसी हमले में गंभीर नुकसान पहुंचता है, तो रियाद में पानी का संकट पैदा हो सकता है और एक हफ्ते के भीतर शहर को खाली कराने की नौबत आ सकती है.
इसी खतरे को देखते हुए बाद के सालों में सऊदी अरब और खाड़ी के कई देशों ने अपने जल ढांचे को मजबूत बनाने पर काम किया है, ताकि पानी की आपूर्ति पूरी तरह एक ही सिस्टम पर निर्भर न रहे.
खाने की व्यवस्था भी होगी प्रभावित
उन्होंने यह भी कहा कि खाड़ी देशों में करीब 80 प्रतिशत खाद्य सामग्री बाहर से आती है और उसका वितरण भी पानी तथा सप्लाई चेन पर निर्भर करता है. यदि पानी की उपलब्धता अचानक रुक जाए तो भोजन की व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है.
पानी के प्लांट्स पर हमला, कैसे पड़ेगा अमेरिकी सैनिकों पर असर?
प्रोफेसर के अनुसार, मिडिल ईस्ट में तैनात अमेरिकी सैनिक भी स्थानीय जल स्रोतों पर निर्भर रहते हैं. ऐसे में यदि बड़े पैमाने पर पानी का संकट पैदा होता है, तो वहां तैनात सैन्य बलों के लिए हालात संभालना चुनौतीपूर्ण हो सकता है.
डिसेलिनेशन प्लांट्स को लेकर विशेषज्ञों का कहना है कि ये आमतौर पर समुद्र के किनारे स्थित होते हैं, इसलिए इनकी सुरक्षा करना आसान नहीं होता. यदि किसी हमले में इन प्लांट्स की मशीनों को नुकसान पहुंचता है तो उन्हें ठीक करने में लंबा समय लग सकता है. विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के महत्वपूर्ण ढांचे किसी भी देश के लिए रणनीतिक महत्व रखते हैं. यही वजह है कि आधुनिक युद्ध में केवल सैन्य ठिकानों ही नहीं, बल्कि बुनियादी ढांचे को भी संभावित लक्ष्य के रूप में देखा जाने लगा है.