Iran Vs Israel-US : क्या मिडिल ईस्ट में शुरू हो गया ‘बेस वॉर’? समझिए कौन होगा बर्बाद

ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते सैन्य टकराव के बाद मिडिल ईस्ट में ‘बेस वॉर’ की आशंका जताई जा रही है. विशेषज्ञों के अनुसार अगर सैन्य ठिकानों पर हमले बढ़ते हैं तो इसका असर पूरे क्षेत्र और वैश्विक राजनीति पर पड़ सकता है.

( Image Source:  Sora AI )
By :  धीरेंद्र कुमार मिश्रा
Updated On : 9 March 2026 2:00 PM IST

मिडिल ईस्ट में लंबे समय से तनाव बना हुआ है, लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने हालात को और गंभीर बना दिया है. ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते सैन्य टकराव, ड्रोन हमलों और प्रॉक्सी समूहों की सक्रियता के बीच यह सवाल उठने लगा है कि क्या क्षेत्र में अब ‘बेस वॉर’ यानी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर होने वाले युद्ध की शुरुआत हो चुकी है. विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यह टकराव इसी तरह बढ़ता रहा तो इसका असर पूरे मिडिल ईस्ट की सुरक्षा और वैश्विक राजनीति पर भी पड़ सकता है. जानें, क्या कहते हैं वार एक्सपर्ट और विदेश मामलों के जानकार.

बेस वॉर से तय होंगे हार और जीत - अमरदीप त्यागी

भारतीय सेना के रिटायर लेफ्टिनेंट कर्नल अमरदीप त्यागी ने यह पूछे जाने पर क्या मिडिल ईस्ट में शुरू हो गया ‘बेस वॉर’ है, के जवाब में कहा कि ईरान को अमेरिका और इजरायल के बीच कोई जमीनी सीमा नहीं है. यह वार इसलिए हो रहा है कि इजरायल को ईरान की मंशा पर शक है. उसे वह अपना दुश्मन मानता है. इरान न्यूक्लियर और मिसाइल प्रोग्राम पर जोर दे रहा है. दोनों के बीच शुरू होने की वजह भी यही है.

उन्होंने आगे कहा कि जहां तकइसे बेस वॉर कहने की बात है तो, जब दोनों के बीच जमीनी सीमा नहीं है तो तय है कि वो एक दूसरे के सैन्य, एनर्जी, एयरपोर्ट, अन्य सामरिक ठिकानों को ही तबाह करेंगे. ऐसा इसलिए किया जाता है कि दुश्मन देश के मनोबल को तोड़कर उसे अपनी शर्तों को मानने के लिए बाध्य किया जाए. इस बार अमेरिका और इजरायल को ईरान अप्रत्याशित ​तरीके के टक्कर दे रहा है, जो चौंकाने वाला है. इस तरह के वार में दुश्मन देशों के ठिकाने ही निशाने पर होते हैं.

8 दशक बाद पहली बार किसी ने अमेरिकी बेस पर बोला हमला - अलूने

विदेश मामलों के जानकार ब्रह्मदीप अलूने का कहना है कि अभी तक दोनों पक्ष एक-दूसरे के ठिकानों को ही निशाना बना रहे हैं. इसलिए बेस वॉर कहना ही उचित रहेगा. हालांकि, अमेरिका और इजरालय ईरान के परामाणु और मिसाइल ठिकानों के साथ आवासीय इलाकों में भी बम और मिसाइल से हमले किए हैं.

इसके जवाब में ईरान भी इजरालय और अमेरिका को सैन्य ठिकानों व उनके अहम बेसेज पर लगातार हमला बोल रहा हे. चौंकाने वाली बात यह है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली बाद ऐसा हुआ कि ईरान जैसे देश ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमला बोला है. वो भी एक दो नहीं, बल्कि कई देशों में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया है. जबकि रूस तक ने कभी अमेरिकी बेस पर हमला नहीं बोला. न ही अमेरिका ने रूस के बेस पर सीधे हमला बोला है.

चीन को नहीं रोक पाना, अमेरिका के लिए खतरनाक

इस स्थिति से बचने के लिए पूर्व अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इंडो पैसिफिक ओशन पर जोर दिया था. ताकि चीन को एशिया तक ​सीमित रखना संभव हो सके. अगर ऐसा नहीं हुआ तो अमेरिका के लिए इसके परिणाम बहुत घातक होंगे. साथ ही ट्रंप की नीतियों को गहरा झटका लगेगा.

ये बात अलग है कि ईरान विध्वंश की ओर आगे बढ़ रहा है. ऐसा इसलिए कि ईरान ने देश की अर्थव्यवस्था का इस्तेमाल हथियारों के संग्रह व अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने में लगया. यही वजह है कि इजरालय और ईरान के बीच युद्ध इस बार बेस वॉर माना जा रहा है.

‘बेस वॉर’ क्या होता है?

‘बेस वॉर’ (Base War) उस स्थिति को कहा जाता है, जब दो या अधिक देश सीधे बड़े पैमाने पर युद्ध करने के बजाय एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों, एयरबेस, नौसैनिक अड्डों या रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाते हैं. इस तरह के युद्ध में अक्सर मिसाइल, ड्रोन और लंबी दूरी के हथियारों का इस्तेमाल किया जाता है. इसका मकसद दुश्मन की सैन्य क्षमता को कमजोर करना और उसकी रणनीतिक बढ़त को खत्म करना होता है. मिडिल ईस्ट में कई देशों के सैन्य अड्डे और विदेशी बेस मौजूद हैं, इसलिए अगर टकराव बढ़ता है तो यह युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे क्षेत्र में फैल सकता है.

ईरान और इजरायल के बीच तनाव क्यों बढ़ रहा है?

ईरान इजरायल के बीच दुश्मनी कई दशकों पुरानी अदावत है. इजरायल लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपने लिए खतरा मानता आया है. जबकि ईरान इजरायल की नीतियों का विरोध करता रहा है. हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच साइबर हमले, ड्रोन हमले और गुप्त सैन्य ऑपरेशन बढ़ गए हैं. कई बार इजरायल ने ईरान से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाया है, वहीं ईरान समर्थित समूह भी इजरायल के खिलाफ हमले करते रहे हैं. इस बढ़ते टकराव ने पूरे क्षेत्र में सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ा दिया है.

प्रॉक्सी ग्रुप्स टकराव में क्या है भूमिका?

मिडिल ईस्ट की राजनीति में प्रॉक्सी ग्रुप्स की भूमिका बेहद अहम रही है. ईरान पर अक्सर आरोप लगाया जाता है कि वह कई सशस्त्र संगठनों को समर्थन देता है, जो इजरायल के खिलाफ सक्रिय रहते हैं.

इनमें लेबनान का हिज्बुल्लाह, गाजा पट्टी में सक्रिय हमास और यमन के हूती मूवमेंट जैसे संगठन शामिल हैं. इन समूहों के जरिए होने वाले हमले कई बार सीधे युद्ध के बजाय अप्रत्यक्ष संघर्ष का रूप ले लेते हैं, जिससे तनाव लगातार बना रहता है.

क्या मिडिल ईस्ट में सैन्य ठिकाने बन रहे निशाना?

इंटरनेशनल मामलों के एक्सपर्ट का कहना है कि हाल के हमलों में कई बार सैन्य अड्डों और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया गया है. इससे यह संकेत मिलता है कि संघर्ष धीरे-धीरे सैन्य क्षमता को कमजोर करने की दिशा में बढ़ रहा है. अगर यह ट्रेंड जारी रहता है, तो मिडिल ईस्ट में अलग-अलग देशों के एयरबेस, नौसैनिक ठिकाने और मिसाइल सिस्टम भविष्य में बड़े हमलों का केंद्र बन सकते हैं.

मिडिल ईस्ट की जटिल राजनीति के कारण किसी भी बड़े संघर्ष में कई देशों के शामिल होने की संभावना रहती है. इजरायल को जहां अमेरिका का समर्थन मिलता है, वहीं ईरान के भी क्षेत्र में कई सहयोगी माने जाते हैं. अगर सैन्य ठिकानों पर हमले बढ़ते हैं, तो यह टकराव क्षेत्रीय युद्ध का रूप भी ले सकता है. इससे अंतरराष्ट्रीय राजनीति और वैश्विक सुरक्षा पर भी बड़ा असर पड़ सकता है.

क्या पूरा मिडिल ईस्ट बड़े युद्ध की ओर बढ़ रहा है?

फिलहाल, यह कहना मुश्किल है कि यह टकराव पूरी तरह बड़े युद्ध में बदल जाएगा या नहीं. लेकिन जिस तरह से सैन्य गतिविधियां और हमले बढ़ रहे हैं, उससे यह साफ है कि क्षेत्र में तनाव पहले से कहीं ज्यादा गंभीर हो गया है. अगर कूटनीतिक प्रयास सफल नहीं होते और सैन्य हमले जारी रहते हैं, तो मिडिल ईस्ट में संघर्ष का दायरा और बढ़ सकता है. यही वजह है कि कई विश्लेषक इस स्थिति को संभावित ‘बेस वॉर’ की शुरुआती झलक के रूप में देख रहे हैं.

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