क्या मजबूरी का नाम है 'आसिम मुनीर', क्यों चाहता है America और Iran के बीच मिसाइल नहीं, फूल बरसे?
पाकिस्तान आर्मी चीफ आसिम मुनीर अमेरिका और ईरान के बीच शांति क्यों चाहते हैं? IMF, सऊदी अरब, चीन और कर्ज की राजनीति के बीच समझें पाकिस्तान की मजबूरी और रणनीति.
मिडिल ईस्ट वॉर के बीच पाकिस्तान के रुख को लेकर आर्मी के प्रमुख आसिम मुनीर पर लगातार सवाल उठ रहे हैं. लोग यह जानना चाहते हैं कि क्या उनकी नीति “मिसाइल नहीं, फूल बरसे” वाला रुख देश की मजबूरी है या और कुछ? दरअसल, इसका जवाब कई परतों में छिपा हुआ है. असल कहानी पाकिस्तान की आर्थिक हालत से शुरू होती है. देश भारी कर्ज, ऊंची महंगाई और घटते विदेशी मुद्रा भंडार से जूझ रहा है और ऐसे में सबसे बड़ा सहारा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष है. अगर अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध भड़कता है, तो तेल की कीमतें बढ़ेंगी और पाकिस्तान का आयात बिल और संकट में डाल देगा. इसलिए, आसिम मुनीर का शांति वाला रुख आदर्श नहीं, बल्कि सीधी आर्थिक मजबूरी है. एक तरह से मुनीर की “सर्वाइवल पॉलिसी” वाला स्टैंड है.
क्या असीम मुनीर अमेरिका से पैसा और सपोर्ट चाहते हैं?
इसका जवाब काफी हद तक 'हां' में जाता है. अमेरिका आज भी IMF, FATF और वैश्विक वित्तीय संस्थाओं पर प्रभाव रखता है. पाकिस्तान जानता है कि अगर उसे बार-बार बेलआउट, सैन्य मदद और कूटनीतिक सुरक्षा चाहिए, तो अमेरिका के साथ रिश्ते सुधारना जरूरी है. यही वजह है कि वह खुद को 'जिम्मेदार साझेदार' दिखाने की कोशिश कर रहा है. ताकि वॉशिंगटन उसे फिर से रणनीतिक रूप से उपयोगी समझे और आर्थिक रास्ते खुलें.
क्या सऊदी अरब से नजदीकी इसलिए कि इस्लामिक दुनिया में पूछ बनी रहे?
सऊदी अरब लंबे समय से पाकिस्तान का सबसे बड़ा अनौपचारिक फाइनेंसर रहा है. तेल उधार, कैश डिपॉजिट और आपातकालीन मदद के जरिए. यहां मोहम्मद बिन सलमान की भूमिका अहम है. पाकिस्तान की कोशिश रहती है कि वह इस्लामिक देशों में अपनी स्थिति बनाए रखे और सऊदी नेतृत्व से दूरी न बने. इसलिए, वह ईरान से खुलकर टकराव नहीं करता और सऊदी लाइन से भी बाहर नहीं जाता. यानी 'दोनों को संतुलित रखना' उसकी मजबूरी और रणनीति दोनों है.
क्या MBS लोन वापस न मांगे, यह भी एक कारण है?
पाकिस्तान बार-बार सऊदी कर्ज को रोलओवर कराता है. अगर रिश्ते बिगड़ते हैं, तो सऊदी अरब यूएई की तरह सख्ती कर सकता है. नई मदद रोक सकता है या पुराने कर्ज पर दबाव बढ़ा सकता है. ऐसे में मुनीर का संतुलन साधना जरूरी हो जाता है, ताकि फाइनेंशियल सपोर्ट की लाइफलाइन बनी रहे.
पाकिस्तान कहां-कहां से लोन लेता है?
पाकिस्तान का यह नेटवर्क काफी बड़ा है. चीन CPEC के तहत इंफ्रास्ट्रक्चर और कमर्शियल लोन देता है. संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे खाड़ी देश कैश डिपॉजिट और तेल क्रेडिट देते हैं. वहीं विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक प्रोजेक्ट और पॉलिसी लोन देते हैं. इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय बाजार से बॉन्ड और प्राइवेट बैंकों से भी कर्ज लिया जाता है, हालांकि, वहां ब्याज ज्यादा देना पड़ता है क्योंकि भरोसा कम है.
मुस्लिम ब्रदरहुड से क्या असीम मुनीर का कोई कनेक्शन है?
मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ उनका कोई प्रत्यक्ष और सार्वजनिक संबंध सामने नहीं आता. पाकिस्तान ऐतिहासिक रूप से इस्लामिक नेटवर्क्स से जुड़ा जरूर रहा है, लेकिन आज की हकीकत यह है कि सऊदी अरब और UAE जैसे देश ब्रदरहुड के खिलाफ हैं. इसलिए पाकिस्तान खुलकर इस संगठन से दूरी बनाए रखता है. ताकि खाड़ी देशों के साथ उसके रिश्ते खराब न हों.
क्या पाकिस्तान की चीन से दूरी एक रणनीतिक चाल है?
चीन अभी भी पाकिस्तान का “ऑल-वेदर फ्रेंड” है, लेकिन अब इस रिश्ते में भी व्यावहारिकता आ गई है. चीन के लोन पर सख्त शर्तें हैं, CPEC प्रोजेक्ट्स पर सुरक्षा खतरे बढ़े हैं और निवेश की गति धीमी हुई है. ऐसे में पाकिस्तान सिर्फ चीन पर निर्भर रहने के बजाय अमेरिका और खाड़ी देशों के साथ भी संतुलन बना रहा है. इसे “Strategic Hedging” कहा जाता है. यानी एक साथ कई ताकतों के साथ रिश्ते बनाए रखना ताकि किसी एक पर पूरी निर्भरता न रहे.
क्या ईरान से टकराव टालना भी मजबूरी है?
ईरान के साथ पाकिस्तान की लंबी सीमा लगती है और बलूचिस्तान जैसे संवेदनशील इलाके दोनों देशों में फैले हैं. अगर तनाव बढ़ता है, तो सीमा पर अस्थिरता, आतंकी गतिविधियां और शिया-सुन्नी संघर्ष बढ़ सकता है, जो पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा को सीधे प्रभावित करेगा. इसलिए मुनीर की कोशिश रहती है कि ईरान के साथ हालात नियंत्रण में रहें.
“मजबूरी का नाम असीम मुनीर” कहना कितना सही?
तस्वीर यही दिखाती है. उनका “मिसाइल नहीं, फूल” वाला रुख किसी आदर्शवादी शांति संदेश से ज्यादा एक मजबूर लेकिन सोची-समझी रणनीति है, जिसमें अमेरिका से उम्मीद, सऊदी अरब पर निर्भरता, ईरान से टकराव का खतरा और चीन के साथ संतुलन शामिल हैं. साफ है कि पाकिस्तान इस समय “Survival Mode Diplomacy” पर चल रहा है, जहां हर कदम मजबूरी और रणनीति के बीच संतुलन बनाकर उठाया जा रहा है.
असीम मुनीर का यह रुख दरअसल पाकिस्तान की कमजोर आर्थिक हालत से सीधे जुड़ा है. देश भारी कर्ज, ऊंची महंगाई और घटते विदेशी मुद्रा भंडार के दबाव में है, जहां सबसे बड़ा सहारा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष बना हुआ है. ऐसे में अगर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ता है, तो तेल की कीमतें बढ़ेंगी और पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ेगा. यही वजह है कि मुनीर शांति की बात करते हैं. यह आदर्शवाद नहीं, बल्कि आर्थिक “सर्वाइवल स्ट्रेटजी” है. साथ ही पाकिस्तान यह भी समझता है कि अमेरिका को संतुष्ट रखना जरूरी है, क्योंकि वही IMF, FATF और वैश्विक फाइनेंशियल सिस्टम पर प्रभाव रखता है; इसलिए खुद को “जिम्मेदार पार्टनर” दिखाना उसकी मजबूरी भी है और कूटनीतिक चाल भी.
सऊदी, चीन और इस्लामिक दुनिया के बीच संतुलन ही असली खेल है?
पाकिस्तान की रणनीति का दूसरा बड़ा पहलू सऊदी अरब और चीन के बीच बैलेंस बनाना है. सऊदी अरब, खासकर मोहम्मद बिन सलमान पाकिस्तान को कर्ज, तेल और कैश सपोर्ट देता है, इसलिए इस्लामिक दुनिया में अपनी पकड़ बनाए रखने और फाइनेंशियल सपोर्ट जारी रखने के लिए पाकिस्तान सऊदी लाइन से बाहर नहीं जाता. वहीं ईरान से भी खुला टकराव नहीं करता. दूसरी ओर चीन CPEC और इंफ्रास्ट्रक्चर लोन के जरिए बड़ा कर्जदाता है, लेकिन सख्त शर्तों और सुरक्षा चुनौतियों के चलते पाकिस्तान अब केवल उसी पर निर्भर नहीं रहना चाहता.
'मुनीर US के टूल, मजबूरी के सिवाय उनके पास कुछ नहीं' - प्रो. सुबोध कुमार
दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर सुबोध कुमार का इस मसले पर कहना है, "साफ है कि पाकिस्तान यानी आसिम मुनीर जो कर रहे हैं वो उनकी मजबूरी है. उनके बस में कुछ नहीं है, लेकिन अपने आका यानी अमेरिका, चीन, सऊदी अरब व अन्य से संबंध बनाकर रखना है. इसलिए वह, मिडिल ईस्ट वार के बीच अमेरिका के ईशारे पर नाच रहा है."
आसिम मुनीर उसी के कहने पर मिडिएशन की कोशिश की. दूसरी तरफ ईरान ने अपने नुकसान को देखते हुए संकेत दिया होगा कि बात करके देख लो, पर वैसा हुआ नहीं. ऐसा इसलिए कि अमेरिका ने जो शर्तें रखी है, वो ईरान को मान्य नहीं हो सकता. इस मामले में पाकिस्तान कुछ नहीं कर सका. इसलिए वो फंसा नजर आता है. बावजूद इसके, आसिम मुनीर को करना वही है, जो ट्रंप चाहते हैं.
इस बीच अमेरिका और ईरान की पूरी कहानी दुनिया के सामने आ गई. फिर कोई भी मुस्लिम देश ईरान के साथ नहीं है. शुरू से ही ओमान इसको लेकर मिडिएशन कर रहा था, लेकिन ईरान ने उस पर हमला बोल दिया. हालांकि, ये भी बड़ी सच्चाई है दोनों में से कोई नहीं चाहता कि युद्ध लंबा चले. खासकर ट्रंप अमेरिका की दुनिया भर में हो रही छिछालेदर की वजह से बिना समय गवाए युद्ध को बंद करना चाह रहे हैं. स्ट्रेट आफ होर्मुज बंद होने के लिए अमेरिका को ही दुनिया देश जिम्मेदार मान रहे हैं.
आसिम मुनीर के लिए मजबूरी इसलिए भी है कि चीन ईरान के पक्ष में हैं. ऐसे में पाकिस्तान कुछ करना भी चाहे तो नहीं कर सकता. इतना ही नहीं, पाकिस्तान ने मुहम्मद बिन सलमान से सुरक्षा का वादा कर रखा है. ईरान के साथ बॉर्डर लगा होने के कारण वो उसे भी नाराज नहीं कर सकता. यानी हर जगह मुनीर फंसे हुए हैं.