EXCLUSIVE: वो केमिकल लोचा जो सुसाइड के लिए करता है मजबूर - दिमाग में मचती है सनसनी और काम तमाम

विशेषज्ञों के मुताबिक आत्महत्या का विचार अचानक नहीं आता, बल्कि दिमाग में मौजूद एक न्यूरोट्रांसमीटर और नकारात्मक माहौल इसे बढ़ावा देते हैं. गाजियाबाद केस ने मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर बहस छेड़ दी है.;

3-4 फरवरी 2026 को आधी रात के समय भारत की राजधानी दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद शहर (बाहरी इलाका टीला मोड़) में तीन मासूम बहनों के लोमहर्षक सामूहिक आत्महत्या-कांड ने इंसानी दुनिया को झकझोर डाला है. इस खौफनाक आत्महत्या कांड (Ghaziabad Three Sisters Suicide) ने न केवल एक परिवार तबाह किया है अपितु सभ्य सुशिक्षित-संपन्न समझे जाने वाले इस इंसानी समाज को भी कटघरे में ला खड़ा किया है.

इन सवालों के कटघरे में कि यह आधुनिक समाज और वैज्ञानिक व एआई की दुनिया वाला समाज जहां पड़ोसी को पड़ोसी के बारे में पता ही नहीं होता है कि किसके घर में क्या समस्या चल रही है, आखिर दौड़ किस अंधी दिशा में रहा है. यह तो सामाजिक व्यवस्था को सवालों के घेरे में खड़ा करता पहलू है इस तरह के सुसाइड या दिल दहलाते हादसों के लिए. वहीं दूसरी ओर मनोवैज्ञानिक इस तरह के (सिर्फ सुसाइड के मामलों में) कांडों के लिए एक उस घातक केमिकल को जिम्मेदार मानते हैं, जिस रसायन की इंसानी दिमाग में मची हड़बड़ाहट, अकुलाहट या कहिए कि बेचैनी ही किसी इंसान को सुसाइड करने के घिनौने मुकाम तक जबरदस्ती धकिया कर ले जाती है.

समाज का स्वार्थी रवैया भी जिम्मेदार

जहां बात ऐसे कांड में समाज की है तो, भागमभाग वाली जिंदगी में सब अपने-अपने में उस हद तक मशरूफ हैं जो पड़ोस वाले मकान या फ्लैट में रहने वाले 8 सदस्यीय परिवार की तीन बेटियां (12, 14, 16 साल महज) एक साथ आधी रात को 9वीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर लेती हैं, तब जाकर जमाने में कोहराम मचता है. अरे यह इतना बुरा क्यों कैसे हो गया? काश आज की भगदड़ वाली जिंदगी में समाज एक दूसरे के दुख-सुख में भी अगर साथी हो जाए तो शायद इस तरह के हादसे जो इंसान, इंसानियत और इंसानी समाज को कलंकित करते उसके चेहरे पर बदरंग अमिट धब्बे से लगते हैं, वे लगने से बच सके. उन परिवारों की तबाही-बर्बादी जो अपनी मुसीबतों-समस्याओं से अकेले बंद कमरों में खुद ही खुद से घुटते-घुटते, निपटने पाने की कोशिश में नाकाम रहने के चलते इस तरह के लोमहर्षक हादसों को अंजाम देकर या इनकी जद में आकर तबाह हो जाते हैं.

सुसाइड का ख्याल अचानक नहीं आता

आखिर सुसाइड के वक्त इंसान के दिमाग का मनोवैज्ञानिक आलम या मनोविज्ञान होता क्या-कैसा है? जिसके चलते इंसान सुसाइड जैसा घातक कदम उठाकर अपनी ही जान लेने से भी नहीं डरता है? इन्हीं तमाम सवालों के जवाब के लिए “स्टेट मिरर हिंदी” के एडिटर क्राइम इनवेस्टीगेशन ने एक्सक्लूसिव बात की देश के मशहूर मनोवैज्ञानिक (साइकोलॉजिस्ट) डॉ. कपिल कक्कड़ से. बकौल डॉ. कपिल कक्कड़, “किसी भी इंसान के दिमाग में अपनी जान लेकर यानी आत्महत्या करके अपनी जिंदगी खोने का ख्याल अचानक नहीं आता है. इसके पीछे इंसान के आसपास का लंबे समय से मौजूद माहौल-वातावरण- परिस्थितियां और इंसान के दिमाग में मौजूद विशेष किस्म के रसायन यानी केमिकल जिम्मेदार होते हैं.”

तीनों बहनें ऐसे पहुंची सुसाइड तक

देश के मशहूर मनोवैज्ञानिक डॉ. कपिल कक्कड़ अपने लंबे अनुभव से बताते हैं, “दिल्ली से सटे गाजियाबाद में तीन बहनों के सामूहिक आत्महत्या की घटना को ही उदाहरण के तौर पर देखा जाए तो, इस मामले में भी इन बच्चियों के आसपास घर-बाहर का वातावरण इन्हें इस कदम को उठाने तक ले जाने में अहम किरदार निभाने वाला रहा है. इन तीनों बच्चियों की डायरियों और सुसाइड नोट भी इसी ओर इशारा करते हैं जो बात मैं यहां मनोवैज्ञानिक की हैसियत से बता रहा हूं कि, तीनों लड़कियां घर में 8 सदस्य होने के बाद भी खुद को अकेला महसूस करने लगी थीं. जिसके चलते उनके चारों ओर एक ऐसे नकारात्मक वातावरण का मजबूत घेरा बनता चला गया कि जिसके बंधन से उन्हें समझदारी के साथ बाहर निकालने वाला तो घर में कोई मौजूद ही नहीं रहा.

शायद ऐसे बच जाती तीनों बहनें

अगर परिवार के किसी सदस्य ने भी इन लड़कियों की मनोदशा और उसने इनके मन में उपजे अकेलेपन को शुरूआती दौर में ही भांपते हुए आहिस्ता से भी दखल दे दिया होता तो शत-प्रतिशत संभव था कि यह तीनों मासूम बच्चियां इस कदर का घातक कदम नहीं उठाती हैं. क्योंकि किसी व्यवधान (परिवार के किसी सदस्य के टोकने समझाने से या बीच में आ जाने से) से इन लड़कियों की उस मानसिक दशा में तुरंत परिवर्तन आ जाना शुरू हो जाता जो इन्हें अकेलेपन के चलते सामूहिक आत्महत्या की ओर निरंतर तीव्र गति से धकेल रहा था.”

आत्‍महत्या को उकसाने वाला केमिकल

स्टेट मिरर हिंदी के एक सवाल के जवाब में डॉ. कपिल कक्कड़ कहते हैं, “आत्महत्या की स्टेज तक पहुंचने वाले अवसादग्रस्त लोगों के मस्तिष्क में बहुतायत में मौजूद न्यूरोट्रांसमीटरों में से एक GABA नाम के केमिकल के रिसेप्टर्स में उथल-पुथल जब मचती है, तो इंसान सुसाइड के विचारों के दलदल में बहुत तेजी से उलझता जाता है. गाबा नाम के एक रसायन का काम न्यूरॉन गतिविधि में बाधा पहुंचाना ही होता है. उदाहरण के लिए कोई चालक अगर गैस पेडल और कार ब्रेक के बारे में सोचे, तो ऐसे में यह गाबा उसमें ब्रेक की तरह अपना काम करता है. गाबा के हजारों तरह के रिसेप्टर्स में से एक तरह का रिसेप्टर गंभीर अवसाद से पीड़ित लोगों के फ्रंटोपलर कॉर्टेक्स में बेहद कम पाया जाता है जिन्होंने आत्महत्या की होती है. जबकि वहीं इसके एकदम विपरीत जिन लोगों की मौत अवसाद-रहित होती है उनमें इसी रिसेप्टर की बहुतायत होती है. दरअसल फ्रंटोपोलर कॉर्टेक्स उच्च स्तर के चिंतन जैसे कि फैसला करने में शामिल होता है.”

अमेरिका में सुसाइड दर ऊपर

वहीं दूसरी ओर जॉन हॉपकिंस ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट को पढ़ने पर पता चलता है कि भारत की तुलना में अमेरिका में आत्महत्या करने वालों की तादाद कहीं ज्यादा बढ़ी है. दुनिया में आत्महत्या पर हुए तीन अध्ययन कमोबेश एक ही निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि, “सुसाइड करने वाले इंसान के मस्तिष्क में हो रहे तंत्रिका संबंधी यानी Neurological चेंजेज अन्य सामान्य इंसानों के दिमाग से बहुत या एकदम अलग होते हैं. यह परिवर्तन इंसान के जीवित रहते ही विकसित होते हैं.” आत्महत्या की घटनाओं में आज भी दुनिया में अमेरिका ही बदनाम है. एक रिपोर्ट के अनुसार यहां साल 2021 में 123 लाख वयस्कों के मन में आत्महत्या का विचार आया था. इनमें से 17 लाख ने आत्महत्या की कोशिश भी कर डाली. जबकि यहां साल 2021 में 48 हजार लोगों ने तो आत्महत्या कर भी ली.

सुसाइड में गाबा का क्‍या होता है रोल?

आत्महत्या का प्रमुख कारण अवसाद और अकेलापन है, यह तथ्य तो जग-जाहिर है. दूसरी ओर अगर विज्ञान और कनाडा के मशहूर मनोविज्ञानियों में शुमार पश्चिमी ओंटारियो विवि के रोबर्ट्स रिसर्च अनुसंधान केंद्र के न्यूरोसाइंटिस्ट माइकल पॉल्टर की मानें तो, वह भी इंसान में आत्महत्या की प्रवृत्ति पनपाने या पैदा करने के लिए इंसान के दिमाग में बहुतायत में उपलब्ध न्यूरोट्रांसमीटरों में से एक गाबा (GABA) नाम के रसायन के रिसेप्टर्स का वितरण असामान्य होने की प्रक्रिया को ही, सुसाइड को उकसाने वाला मूल कारण मानते हैं.

आत्महत्या के मामलों पर अनुसंधान करने वाले मनोवैज्ञानिकों ने पाया है कि, ऐसी प्रवृत्ति (आत्महत्या करने पर आमादा लोग) से ग्रसित इंसानों के दिमाग में फ्रंटोपोलर कॉर्टेक्स में गाबा-ए रिसेप्टर के जीन से अधिकांशत: एक मिथाइल समूह नाम का अणु जुड़ा रहता है. जब जीन से मिथाइल समूह जुड़ता है तभी वह जीन को कोशिकाओं की प्रोटीन निर्माण प्रक्रिया को छिपाए रहता है. ऐसे ही मामलों में कोशिकाओं को “गाबा-ए” रिसेप्टर बनाने से रोकता है.

अवसाद को उकसाने वाला केमिकल

स्टेट मिरर हिंदी के साथ विशेष बातचीत में भारत के मशहूर मनोवैज्ञानिक डॉ. कपिल कक्‍कड़ बताते हैं, “इंसान को विज्ञान की नजर से देखें तो यह केमिकल आत्महत्या की ओर धकेलता है. मगर इंसान के दिमाग में पहले से मौजूद इस घातक केमिकल को उकसाने का काम इंसान के आसपास मौजूद नकारात्मक वातावरण आग में घी का काम करता है. जैसे ही कोई इंसान अवसाद की गिरफ्तर में पहुंचता है वैसे ही यह केमिकल तीव्र गति से एक्टिव होकर, अवसादग्रस्त इंसान को आत्महत्या के मुहाने पर ले जाकर खड़ा कर देता है. जहां से अवसादग्रस्त इंसान के पांव आत्महत्या जैसा घातक कदम पीछे लाना बेहद मुश्किल हो जाता है.”

डिप्रेशन को और उकसाता है ये केमिकल

मनोवैज्ञानिक डॉ. कपिल कक्कड़ गाजियाबाद में तीन बहनों द्वारा एक साथ आत्महत्या जैसा घातक कदम उठाए जाने पर बात करते हुए कहते हैं, “दरअसल मनोवैज्ञानिक, दिमाग में मौजूद जिस रसायन को आत्महत्या के लिए उकसाने-प्रेरित करने वाला मानते हैं, वह तब तक एक्टिव ही नहीं होता है जब तक कि उसे इंसान के आसपास मौजूद माहौल, अकेलापन यानी अवसाद वाली स्थितियां परिस्थितियां हासिल न हों. जैसे ही किसी पीड़ित इंसान को अवसाद घेरता है वैसे ही पहले से इंसान के दिमाग में मौजूद यह रसायन घातक रूप में खुद को एक्टिव कर डालता है, और इंसान आत्महत्या कर लेता है.”

सुसाइड की ओर बढ़ते इंसान की पहचान

भारत के मनोवैज्ञानिक डॉ. कपिल कक्कड़ के मुताबिक, आत्महत्या की ओर बढ़ते इंसान को उसकी गतिविधियों से पहचाना जा सकता है. इस प्रवृत्ति की ओर बढ़ते इंसान को एकांत पसंद आने लगता है. चिंतित रहने लगता है. नशीले पदार्थों की ओर बढ़ना. अचानक स्वभाव में परिवर्तन आना जैसे आक्रामक-आक्रोषित हो जाना. बैठे-बैठे ही भावुक होकर किसी इंसान का अचानक रोने लगना. परिवार के बीच भी निराशाजनक-नकारात्मकता से भरी बातें शुरू कर देना. बहुत ज्यादा सोते रहना या फिर अचानक लंबे समय तक सोना ही बंद कर देना.

Similar News