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Expert View: भीड़ में रहकर भी अकेलापन, ऑनलाइन गेमिंग की लत; कोर्ट-सरकार या किसी और को कोसने से पहले साइकोलॉजी समझिए

गाजियाबाद की तीन बहनों की मौत के बाद मनोवैज्ञानिक का बड़ा बयान. उन्होंने कहा कि सिर्फ सरकार को दोष देने से कुछ नहीं होगा, पहले बच्चों की मानसिक स्थिति और परिवार के माहौल को समझना जरूरी है.

Expert View: भीड़ में रहकर भी अकेलापन, ऑनलाइन गेमिंग की लत; कोर्ट-सरकार या किसी और को कोसने से पहले साइकोलॉजी समझिए
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संजीव चौहान
By: संजीव चौहान

Published on: 4 Feb 2026 10:17 PM

भारत की राजधानी दिल्ली की नाक के नीचे मौजूद उत्तर प्रदेश के सिरमौर और ओद्यौगिक शहर गाजियाबाद शहर के लोग बुधवार (4 फरवरी 2026) को सुबह नींद से जागे तो उनकी रूह कांप उठी. खबर ही ऐसी थी जिसने दिल दहला दिया. पता चला कि शहर के बाहरी इलाके में स्थित टीला मोड़ में तीन सगी नाबालिग बहनों ने 9वीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली थी.

मौके से सुसाइड नोट भी मिला. पुलिसिया जांच में पता चला तीनों बहनें एक ऑनलाइन कोरियन मोबाइल गेम की जानलेवा लत के जाल में बुरी तरह से फंस चुकी थीं. इसकी पुष्टि मौके से बरामद सुसाइड नोट और डायरी से भी होती है. हालांकि पुलिस अभी जांच अधूरी होने के चलते न तो इन तथ्यों की पुष्टि कर रही है. न ही इन तथ्यों से इनकार कर रही है.

जिन बहनों ने अभी महज 12, 14 और 16 साल की उम्र में समाज को भी ठीक तरह से नहीं देखा-समझा था. जो दुनिया की ऊंच-नीच में फर्क करना भी नहीं जानती थीं. आखिर उन बहनों के चारों ओर ऑनलाइन गेमिंग ऐप और मोबाइल के नशे ने ऐसा क्या, कैसे और क्यों जाल बुन डाला कि वे एक साथ जान देकर, आज की उच्च शिक्षित वैज्ञानिक और मायावी एआई की इस इंसानी दुनिया के सामने तमाम अनसुलझे सवाल खड़े करके अकाल मौत की नींद में चली गईं.

किसी की सहमति-असहमति का सवाल नहीं

इन्हीं तमाम सवालों के जवाब के लिए स्टेट मिरर हिंदी के एडिटर क्राइम इनवेस्टीगेशन ने 4 फरवरी 2026 की रात घटी इस लोमहर्षक घटना के तत्काल बाद एक्सक्लूसिव बात की, भारत की मशहूर मनोविज्ञानी-काउंसलर डॉ. निशा खन्ना से. उन्होंने जो कुछ खुलकर बयान किया उसे देख-सुनकर आज की दुनिया के माता-पिता की आंखें खुली रह जाएंगीं. संभव है कि समाज का एक धड़ा डॉ. निशा खन्ना के मत से सहमत हो और दूसरा धड़ा 'असहमत'. यहां सवाल सहमति और असहमति या फिर किसी की खुशी-न-खुशी का कतई नहीं है. यहां सवाल है कि आखिर आज की जिस पीढ़ी ने अपने दमखम पर ईरान की सड़कों पर तबाही बचा डाली. जिस आज की युवा पीढ़ी ने नेपाल को रातों रात फूंक कर वहां की सत्ता की चूलें हिला डालीं.

युवा अकाल मौत मरने पर क्यों उतारू?

इस कदर का बहादुर आज का युवा ऑनलाइन ऐप और ऑनलाइन गेमिंग या सोशल मीडिया के मकड़जाल में फंसकर आखिर अपनी ही जान देकर अकाल मौत मरने पर उतर क्यों रहा है? इसी सवाल का जवाब दिया है देश की मशहूर मनोवैज्ञानिक डॉ. निशा खन्ना ने. उनके मुताबिक, “हम सरकार और अपने सुप्रीम कोर्ट को तो तुरंत कोसने लगते हैं कि, ये दोनों सर्वोच्च संवैधानिक संस्थाएं निठल्ली हैं. अगर यह दोनो चाहें तो देश के युवाओं को नई सकारात्मक दिशा मिल सकती है.”

इसमें सरकारी तंत्र क्या करेगा?

मसलन, अब गाजियाबाद में जो तीन सगी बहनों ने सामूहिक आत्महत्या जैसी लोमहर्षक घटना को अंजाम दे डाला है. इसमें सीधे-सीधे प्रत्यक्ष रूप से भला सोचो सरकार या सुप्रीम कोर्ट कैसे मौके पर जाकर कोई कदम उठा लेगी? बकौल डॉ. निशा खन्ना, “मैं स्वतंत्र रूप से और लंबे मनोवैज्ञानिक अनुभव से कह सकती हूं कि, गाजियाबाद के जिस घर में यह दुखद घटना घटी, वहां कहने देखने को समाज की नजरों में भले ही पारिवारिक वातावरण सामान्य रहा होगा. मगर अंदर की हकीकत जितनी खतरनाक रही होगी, तीन बहनों के सामूहिक सुसाइड से सामने परिणाम उससे भी खतरनाक मौजूद है.”

सब कुछ सच ही नहीं होता

दरअसल होता क्या है कि अक्सर जो इंसान को इस समाज में दिखाई और सुनाई देता है, वह झूठा भी साबित होता है. गाजियाबाद की घटना भी इसका मजबूत उदाहरण कही जा सकती है. जिसके मुताबिक, घटनास्थल के आसपास मौजूद लोगों को इस घर के अंदर तो सबकुछ सामान्य नजर आता रहा था. मगर घर के अंदर के हालात किस कदर के बेतरतीबी से तितर-बितर होकर इधर उधर छितराए-फैले हुए थे? इसकी सच्चाई तीन बहनों के सामूहिक सुसाइड से सामने निकल कर समाज के सामने आई है.

सरकार पर ठीकरा मत फोड़िये

''सिर्फ भारत के ही नजरिए से नहीं, मैं आज विश्व में भी सामाजिक नजरिए से जो देख रही हूं, उसके मुताबिक बेशक आज एआई की दुनिया की चकाचौंध ने समाज की आंखों को चुंधिया क्यों न दिया हो. मगर जब-जब गाजियाबाद जैसे दुखद मामले खौफनाक मंजर के रूप में सामने आकर समाज में खड़ी हो जाती हैं, तब तब हम अपने गिरेबान में झांकने की बजाए सरकार और देश के कानूनों को कोसना शुरू कर देते हैं. जोकि सरासर गलत है.

सरकार-सुप्रीम कोर्ट से पहले भी सोचो

सरकार और सुप्रीम कोर्ट किसी भी देश का एक “संवैधानिक-सिस्टम” हैं. उन्हें व्यापक स्तर पर सबकुछ देख कर अमल में लाना होता है. जिसमें सबकुछ समाज के हित के लिए तत्काल प्रैक्टिकली हो जाना असंभव प्रक्रिया है. इसे हमें-समाज को सहज स्वीकार करना होगा. उदाहरण के लिए अगर जिक्र जब गाजियाबाद में तीन सगी बहनों द्वारा ऑनलाइन गेमिंग की लत का शिकार होकर सुसाइड कर लेने की ही घटना को लीजिए. इस लोमहर्षक दिल-ओ-जेहन को हिला डालने वाली घटना में जरूर काफी हद तक घरेलू वातावरण का भी हाथ रहा है.

आज हम यह तो कह और देख रहे हैं कि तीनों बहनों ने ऑनलाइन गेमिंग की लत का शिकार होकर अकाल मौत को गले लगा लिया. एक मनोवैज्ञानिक की हैसियत से मेरे जेहन में ऐसे में यह सवाल कौंध रहा है कि आखिर, तीनों बहनों को यह ऑनलाइन गेमिंग की लत लगी क्यों? इसके पीछे के कारण-वजहों पर क्यों कोई चर्चा नहीं करता है? यही वह सवाल है जिसका जवाब तलाशते ही समाज में इस तरह की घटनाओं पर अंकुश लगाया जा सकता है.

भरे-पूरे परिवार में 'अकेलापन' क्यों?

सुना जा रहा है कि जिस परिवार में यह दुखद घटना घटी उसमें एक ही घर के अंदर पांच बच्चे, दो महिलाएं और एक पुरुष रहते थे. यानी परिवार में 8 लोग थे. इसके बाद भी वह कौन से कारण रहे कि इतनी कम उम्र की तीन बहनों ने दो साल से स्कूल जाना छोड़ रखा था. पिता ने दो सगी बहनों से शादी की थी. यानी बच्चियों के पिता की दो पत्नियां हैं. ऐसे में एक यह आशंका भी जन्म लेती है कि पिता की दो शादियों के लेकर, घर में आर्थिक तंगी की वजह से आपसी मतभेदों के चलते वातावरण तनावपूर्ण न रहता हो. जिसका सीधा विपरीत असर बच्चों पर पड़ा. माता-पिता को अपने निजी झंझटों में पता ही नहीं चला हो कि, कब उनके बच्चे मानसिक रूप से उनसे अलग होकर अपने सुकून के लिए ऑनलाइन मोबाइल गेमिंग जैसी घातक कु-संस्कृति की ओर दबे पांव बढ़ते चले गए.

घर-परिवार के माहौल पर विचार

एक सवाल के जवाब में मनोविज्ञान विशेषज्ञ डॉ. निशा खन्ना कहती हैं, “मोबाइल पर ऑनलाइन गेमिंग की लत इस लोमहर्षक कांड की वजह हो सकती है. इससे पहले मगर यह भी सोचना होगा कि आखिर अगर घर-परिवार में माता-पिता और बच्चों के बीच सब कुछ सकारात्मक, दोस्ताना और सौहार्दपूर्ण था, तब फिर बच्चे (तीनों बदकिस्मत बहनें) इस कदर आंख मूंदकर आखिर ऑनलाइन मोबाइल गेम की ओर खुद को क्यों मोड़ते चले गए? क्या माता-पिता ने कभी इस बात पर ध्यान दिया कि मियां-बीवी की आपसी घरेलू समस्याओं के चलते उनके बच्चे कब अपना एकाकी जीवन मनोरंजन के लिए मोबाइल गेम की ओर बढ़ाते चले जा रहे हैं. शायद नहीं किया होगा ऐसा मां-बाप ने. वरना शायद तीनों बेटियां अगर माता-पिता और परिवार के साथ ही अकेलापन महसूस नहीं कर रही होती तो संभव था कि वे अपना अकेलापन दूर करने के लिए उस हद तक ऑनलाइन मोबाइल गेम की बुरी और जानलेवा लत की ओर अग्रसर ही न हुई होतीं. अगर उधर गई भी होतीं तो माता-पिता जो पहले से बेटियों के साथ दोस्ताना होते, तो वह उन्हें समझाकर ऑनलाइन मोबाइल गेम की ओर आंख मूंदकर बढ़ने से तो समझा-बुझाकर रोक ही सकते थे.”

UP NEWSस्टेट मिरर स्पेशल
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