2027 से पहले बीजेपी का बड़ा दांव! छह शहर, छह पदयात्राएं... योगी ने राहुल-अखिलेश को दी खुली चुनौती?
| यूपी में 2027 से पहले बीजेपी की छह पदयात्राएं, योगी का नेतृत्व, 403 सीटों का सियासी गणित और जातीय समीकरण. जानिए राहुल गांधी और अखिलेश यादव को क्या संदेश दिया.
भारतीय जनता पार्टी (BJP) का ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ सियासी अभियान और पदयात्रा देश भर में जारी है. इस क्रम में चुनावी राज्य उत्तर प्रदेश में भी 3 से 5 नवंबर के दौरान छह शहरों में पदयात्राएं निकाली गईं. यूपी में बीजेपी की छह पदयात्राएं सिर्फ विपक्ष के आरोपों का जवाब देने का कार्यक्रम नहीं थीं. लखनऊ से बरेली, प्रयागराज, गोरखपुर, कानपुर और गाजियाबाद तक पार्टी ने अपने छह संगठनात्मक क्षेत्रों में ताकत दिखाने की कोशिश की.
ऐसा इसलिए कि हर क्षेत्र की अपनी जातीय बनावट और राजनीतिक चुनौतियां हैं. कहीं गैर-यादव पिछड़े और दलित मतदाता अहम हैं, तो कहीं जाट-किसान राजनीति और शहरी वोटर निर्णायक भूमिका निभाते हैं. इन पदयात्राओं को 2027 से पहले संगठन मजबूत करने और राहुल गांधी-अखिलेश यादव के एसआईआर तथा वोट चोरी के आरोपों का जवाब देने की कोशिश के तौर लोगों ने लिया है.
3 से 5 नवंबर 2026 के बीच हुई इन पदयात्राओं में राष्ट्रीय और प्रदेश नेतृत्व के बड़े चेहरों को अलग-अलग क्षेत्रों की जिम्मेदारी दी गई. सवाल है कि बीजेपी ने किस क्षेत्र में किस नेता को आगे किया और इन छह क्षेत्रों में कितनी विधानसभा सीटें आती हैं?
पदयात्राओं के पीछे बीजेपी का सियासी संदेश क्या?
बीजेपी ने हर पदयात्रा में कम से कम 25 हजार लोगों को जुटाने का लक्ष्य रखा था. इसके अलावा, करीब 200 युवा सम्मेलन और किसान समुदाय के लोगों के साथ भोज आयोजित करने की योजना भी बनाई गई. पार्टी का मकसद विपक्ष के वोट चोरी और चुनाव आयोग से जुड़े आरोपों का जवाब देने के साथ अलग-अलग सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाना था. इन छह संगठनात्मक क्षेत्रों में कुल 403 विधानसभा सीटें आती हैं. अवध में 82, काशी में 71, पश्चिम में 71, ब्रज में 65, गोरखपुर में 62 और कानपुर-बुंदेलखंड में 52 सीटें हैं.
अवध में किन जातियों पर नजर?
3 नवंबर को अवध क्षेत्र की पदयात्रा लखनऊ में निकाली गई. इसकी अगुवाई केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने की. उन्होंने कांग्रेस और समाजवादी पार्टी पर निशाना साधते हुए राहुल गांधी और अखिलेश यादव की राजनीति पर सवाल उठाए. बीजेपी का संदेश था कि वह विपक्ष के वोट चोरी और चुनाव आयोग से जुड़े आरोपों का राजनीतिक जवाब देगी.
अवध क्षेत्र में 82 विधानसभा सीटें हैं. यहां ब्राह्मण, ठाकुर, कुर्मी, पासी और यादव समुदायों की भूमिका अहम है. खासतौर पर कुर्मी और पासी मतदाता कई सीटों पर चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं.
2024 के लोकसभा चुनाव में फैजाबाद सीट पर समाजवादी पार्टी के अवधेश प्रसाद की जीत के बाद दलित मतदाताओं के रुख को लेकर चर्चा तेज हुई थी. ऐसे में बीजेपी के लिए गैर-यादव पिछड़े और दलित मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ बनाए रखना बड़ी चुनौती है.
क्या ब्रज में जाट-किसान समीकरण पर रहा जोर?
4 नवंबर को ब्रज क्षेत्र की पदयात्रा बरेली में हुई. इसमें बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ केशव प्रसाद मौर्य और जयंत चौधरी भी शामिल हुए. नड्डा ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि चुनाव जीतने पर वह खुद को होशियार बताता है, लेकिन हारने पर चुनाव आयोग पर सवाल उठाता है.
ब्रज क्षेत्र में 65 विधानसभा सीटें हैं. यहां जाट, कुर्मी, लोधी, यादव, ब्राह्मण, ठाकुर और दलित समुदायों की राजनीतिक भूमिका महत्वपूर्ण है. जयंत चौधरी की मौजूदगी के जरिए बीजेपी ने जाट-किसान मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश की, जबकि केशव प्रसाद मौर्य की मौजूदगी से गैर-यादव पिछड़े वर्गों को संदेश देने का प्रयास दिखा.
बीजेपी की काशी किसे साधने की कोशिश?
4 नवंबर को काशी क्षेत्र की पदयात्रा प्रयागराज में निकाली गई. इसकी अगुवाई उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने की. उन्होंने कांग्रेस और समाजवादी पार्टी पर लोकतंत्र को कमजोर करने का आरोप लगाया.
काशी क्षेत्र में 71 विधानसभा सीटें हैं. यहां कुर्मी-पटेल, मौर्य, निषाद, राजभर और यादव समुदायों के साथ ब्राह्मण, ठाकुर, दलित और मुस्लिम मतदाता भी अहम भूमिका निभाते हैं. बीजेपी की कोशिश इन समुदायों के बीच अपनी पकड़ मजबूत रखने की है. केशव मौर्य को जिम्मेदारी देना भी इसी सामाजिक समीकरण से जोड़कर देखा जा सकता है.
क्या गोरनाथ के क्षेत्र से दिया एकजुटता का संदेश?
गोरखपुर क्षेत्र की पदयात्रा 4 नवंबर को निकाली गई. इसमें बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी मौजूद रहे. इसके जरिए पार्टी ने राष्ट्रीय और प्रदेश नेतृत्व के बीच एकजुटता का संदेश दिया.
गोरखपुर क्षेत्र में 62 विधानसभा सीटें हैं. यहां कुर्मी-सैंथवार, मौर्य-कुशवाहा, यादव, राजभर और निषाद समुदायों के साथ दलित मतदाताओं की भी अहम भूमिका है. इस क्षेत्र में ओबीसी मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 52 प्रतिशत और अनुसूचित जाति के मतदाताओं की करीब 20 प्रतिशत हैं.
योगी आदित्यनाथ का गोरखपुर से पुराना राजनीतिक जुड़ाव भी इस क्षेत्र को खास बनाता है. राष्ट्रीय और प्रदेश नेतृत्व की मौजूदगी से बीजेपी ने कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ाने की कोशिश की.
कानपुर-बुंदेलखंड में शहरी-ग्रामीण वोटर्स बड़ी चुनौती?
कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र की पदयात्रा 4 नवंबर को हुई. इसकी अगुवाई उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने की. उन्होंने कांग्रेस और समाजवादी पार्टी पर संविधान और लोकतंत्र के खिलाफ राजनीति करने का आरोप लगाया.
इस क्षेत्र में 52 विधानसभा सीटें हैं. कानपुर में व्यापार, उद्योग और रोजगार से जुड़े मुद्दे अहम हैं, जबकि बुंदेलखंड में पानी, खेती, रोजगार और पलायन बड़ी चुनौतियां हैं. यहां ब्राह्मण, ठाकुर, लोधी, कुर्मी, यादव और दलित समुदायों की भूमिका अलग-अलग सीटों पर महत्वपूर्ण है. बीजेपी के सामने शहरी और ग्रामीण, दोनों इलाकों में अपनी पकड़ बनाए रखने की चुनौती है.
गाजियाबाद से जाट मतदाताओं पर पैनी नजर!
बीजेपी की आखिरी पदयात्रा 5 नवंबर को गाजियाबाद में हुई. इसकी अगुवाई मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने की. उन्होंने कांग्रेस और विपक्षी दलों पर संवैधानिक संस्थाओं को लेकर भ्रम फैलाने का आरोप लगाया.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 71 विधानसभा सीटें हैं. 2022 के चुनाव में बीजेपी ने यहां 47 सीटें जीती थीं, जबकि 2017 में उसे 60 सीटें मिली थीं. 2022 में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के गठबंधन को 24 सीटें मिली थीं.
इस क्षेत्र में जाट मतदाता करीब 30 से 35 सीटों पर चुनावी समीकरण प्रभावित कर सकते हैं. इसके अलावा मुस्लिम, दलित, गुर्जर, त्यागी और अन्य पिछड़े समुदायों की भी अहम भूमिका है. किसान आंदोलन के बाद जाट-किसान राजनीति इस क्षेत्र में बीजेपी के लिए खास चुनौती रही है. योगी की अगुवाई में पदयात्रा निकालना इसी क्षेत्र में पार्टी की पकड़ मजबूत करने की कोशिश माना जा सकता है.
क्या बीजेपी 2027 की चुनौती का जवाब दे पाएगी?
बीजेपी की इन पदयात्राओं के दो बड़े मकसद दिखाई देते हैं. पहला, एसआईआर, वोट चोरी और चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर विपक्ष के आरोपों का जवाब देना. दूसरा, 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में हुए नुकसान के बाद संगठन को फिर सक्रिय करना.
दूसरी तरफ कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष आराधना मिश्रा ने इन पदयात्राओं को राजनीतिक दिखावा बताते हुए आरोप लगाया कि बीजेपी मुख्य मुद्दों से ध्यान हटाना चाहती है. जबकि भाजपा ने इन छह पदयात्राओं के जरिए पार्टी ने राहुल गांधी और अखिलेश यादव को राजनीतिक चुनौती देने की कोशिश जरूर की है, लेकिन इसका चुनावी असर कितना होगा, यह विधानसभा चुनाव में ही साफ होगा.