मायावती का मास्टरस्ट्रोक या नई सोशल इंजीनियरिंग? अंबेडकर के नाम पर 6 दिसंबर को लखनऊ से किसे देंगी चुनौती?
मायावती 6 दिसंबर को लखनऊ में अंबेडकर महापरिनिर्वाण दिवस पर शक्ति प्रदर्शन करेंगी. क्या BSP इस आयोजन से 2027 चुनाव के लिए नया सामाजिक समीकरण तैयार करेगी?
समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बीजेपी के बाद अब मायावती ने भी 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव की तैयारी तेज कर दी है. 6 दिसंबर को डॉ. भीमराव अंबेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस पर लखनऊ में होने वाला आयोजन बसपा के लिए राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का मौका बन सकता है. दलितों के साथ पिछड़ों, ब्राह्मणों और अल्पसंख्यकों तक पहुंच बनाने की कोशिश के बीच सवाल है कि क्या मायावती 2007 का 'सर्वजन' फॉर्मूला नए तरीके से वापस लाना चाहती हैं?
बसपा की पहचान कभी दलित राजनीति की सबसे मजबूत आवाज के रूप में रही है. कांशीराम ने बहुजन आंदोलन को राजनीतिक ताकत दी और मायावती ने उसे सत्ता तक पहुंचाया. 2007 में बसपा ने 403 में से 206 सीटें जीतकर अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी. उस जीत में दलित आधार के साथ ब्राह्मणों और दूसरे सामाजिक वर्गों को जोड़ने वाली सोशल इंजीनियरिंग की अहम भूमिका थी. पार्टी को तब 30.4 फीसदी वोट मिले थे.
लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा सिर्फ एक सीट पर सिमट गई और उसका वोट शेयर घटकर 12.88 फीसदी रह गया. 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी और उसका वोट प्रतिशत करीब 9.5 फीसदी रहा. ऐसे में 2027 से पहले मायावती के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपना खोया राजनीतिक आधार वापस हासिल करने की है.
6 दिसंबर को मायावती की तैयारी क्या?
मायावती ने 5 नवंबर को लखनऊ स्थित पार्टी मुख्यालय में प्रदेश इकाई की बैठक की. इसमें प्रदेश और मंडल स्तर के पदाधिकारियों के साथ सभी 75 जिलों के जिलाध्यक्ष शामिल हुए. बैठक में मायावती ने 6 दिसंबर को लखनऊ के डॉ. भीमराव अंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल पर होने वाले श्रद्धांजलि समारोह में मुख्य अतिथि बनने की सहमति दी.
पार्टी ने आयोजन को ऐतिहासिक बनाने का लक्ष्य रखा है. जिलाध्यक्षों को कार्यकर्ताओं की भागीदारी और तैयारियों की जिम्मेदारी दी गई. बैठक में बूथ स्तर पर संगठन की स्थिति, उम्मीदवारों के चयन और गरीब तथा कमजोर वर्गों को उनके वोट की ताकत के प्रति जागरूक करने पर भी चर्चा हुई.
मायावती ने पांचवीं बार उत्तर प्रदेश में बसपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाने का लक्ष्य दोहराया. उनका नारा 'वोट हमारा, राज भी हमारा' पार्टी की चुनावी रणनीति का संकेत देता है. खास बात यह है कि पार्टी करीब 100 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार घोषित कर चुकी है और नवंबर तक अधिकतर सीटों पर नाम तय करने की तैयारी में है.
क्या 2007 वाला दलित-ब्राह्मण फॉर्मूला फिर हिट होगा?
बसपा की 2007 की जीत सोशल इंजीनियरिंग का बड़ा उदाहरण मानी जाती है. उस चुनाव में मायावती ने दलितों के पारंपरिक समर्थन के साथ ब्राह्मणों और दूसरे सवर्ण वर्गों को भी जोड़ा था. पार्टी ने 86 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया था, जिनमें से 20 चुनाव जीते थे. 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय' का नारा इसी रणनीति का अहम हिस्सा था.
इस बार भी मायावती की रणनीति दलितों तक सीमित रहने के संकेत नहीं देती. पार्टी की बैठक में सर्वसमाज के गरीब और कमजोर वर्गों को जोड़ने और नए उम्मीदवारों की पहचान पर जोर दिया गया. हालांकि, 2007 और 2027 की परिस्थितियों में बड़ा अंतर है. तब बसपा के पास मजबूत संगठन और सत्ता का विकल्प था, जबकि अब उसे पहले अपना कमजोर संगठन दोबारा खड़ा करना है.
दलित वोटों पर किसकी नजर?
बसपा की चुनौती सिर्फ बीजेपी या समाजवादी पार्टी तक सीमित नहीं है. दलित राजनीति में अब कई दावेदार सक्रिय हैं. समाजवादी पार्टी ने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक राजनीति के जरिए अपना आधार बढ़ाने की कोशिश की है. कांग्रेस संविधान, आरक्षण और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर दलित मतदाताओं तक पहुंच बना रही है. वहीं चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी भी दलित युवाओं के बीच अपनी पहचान मजबूत करने में जुटी है.
ऐसे में मायावती के लिए अपने पारंपरिक जाटव समर्थकों को साथ बनाए रखना और गैर-जाटव दलित समुदायों तक पहुंच बढ़ाना जरूरी है. अंबेडकर के विचारों और सामाजिक न्याय को केंद्र में रखकर बसपा अपने पुराने वैचारिक आधार को फिर सक्रिय करना चाहती है.
आकाश आनंद की भी होगी परीक्षा
बसपा की चुनावी तैयारियों में आकाश आनंद की भूमिका भी अहम है. उन्हें पार्टी के राष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेदारी देने के साथ उत्तर प्रदेश में जनसभाओं का कार्यक्रम भी सौंपा गया है. अक्टूबर-नवंबर में बुलंदशहर, सहारनपुर, अयोध्या, आगरा और कानपुर में उनकी सभाएं प्रस्तावित की गई हैं. ऐसे में 6 दिसंबर का आयोजन मायावती के साथ पार्टी के नए नेतृत्व की सक्रियता के लिहाज से भी अहम होगा.
पार्टी को युवा मतदाताओं तक पहुंचने के लिए रोजगार, पेपर लीक, महंगाई, भ्रष्टाचार और शिक्षा जैसे मुद्दों को भी प्रभावी तरीके से उठाना होगा.
2022 और 2024 के नतीजे कितनी बड़ी चुनौती?
बसपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसका चुनावी प्रदर्शन है. 2007 में 206 सीटें जीतने वाली पार्टी 2022 में 403 में से सिर्फ एक सीट जीत पाई. उसका वोट शेयर 30.4 फीसदी से घटकर 12.88 फीसदी रह गया. 2024 के लोकसभा चुनाव में भी पार्टी का वोट प्रतिशत करीब 9.5 फीसदी रहा और उसे एक भी सीट नहीं मिली.
यही वजह है कि मायावती ने उम्मीदवारों की पहचान और बूथ स्तर की तैयारियों पर जोर दिया है. करीब 100 सीटों पर उम्मीदवार घोषित करने की खबर बताती है कि बसपा चुनावी तैयारी को आखिरी समय तक टालने के बजाय पहले से आगे बढ़ाना चाहती है.
क्या 6 दिसंबर से शुरू होगा BSP का नया चुनावी चैप्टर?
मायावती के लिए अंबेडकर सिर्फ श्रद्धांजलि का विषय नहीं, बल्कि बसपा की विचारधारा और सामाजिक आधार का प्रतीक हैं. लेकिन 6 दिसंबर के आयोजन की सफलता सिर्फ भीड़ से तय नहीं होगी. असली परीक्षा यह होगी कि क्या बसपा अपने दलित आधार को फिर एकजुट कर पाती है, ब्राह्मणों और पिछड़ों के बीच स्वीकार्यता बढ़ाती है और युवा मतदाताओं को जोड़ पाती है. 2027 से पहले मायावती के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है.




