पंजाब बचाना, गोवा जीतना और यूपी-गुजरात पर पैनी नजर - दिल्ली हार के बाद केजरीवाल का बड़ा रीसेट

दिल्ली विधानसभा चुनाव में हार के बाद आम आदमी पार्टी (AAP) के संयोजक अरविंद केजरीवाल कुछ समय तक सार्वजनिक तौर पर नजर नहीं आए.;

( Image Source:  @ArvindKejriwal )
Edited By :  धीरेंद्र कुमार मिश्रा
Updated On : 7 Feb 2026 4:04 PM IST

8 फरवरी 2025 को जब चुनाव नतीजे आए, तब केजरीवाल अपने सरकारी आवास पर टीवी चैनलों पर रिजल्ट देख रहे थे. पार्टी नेताओं के मुताबिक, वे दुखी जरूर थे लेकिन गुस्से में नहीं थे. इस चुनाव में आम आदमी पार्टी को बड़ा झटका लगा. पार्टी सिर्फ 22 सीटें जीत पाई, जबकि पिछली बार 64 सीटें थीं. मनीष सिसोदिया और सौरभ भारद्वाज जैसे बड़े नेता भी चुनाव हार गए. करीब दोपहर 2 बजे अरविंद केजरीवाल ने एक वीडियो संदेश रिकॉर्ड कर जनता का फैसला स्वीकार किया. इसके बाद वे कई महीनों तक सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आए.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, पार्टी नेताओं ने बताया, केजरीवाल उस वक्त बहुत दुखी थे लेकिन गुस्से में नहीं थे. यह चुनाव उनके लिए बेहद अहम था क्योंकि जीतने पर वह शीला दीक्षित से भी ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेता बन जाते. साथ ही, इससे पार्टी पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को झटका लगता और केंद्र सरकार से टकराव के बाद बनी मुश्किल हालात से उबरने का मौका मिलता.

आखिर, कर क्या रहे थे केजरीवाल?

इस दौरान तरह-तरह की अटकलें लगने लगीं. कुछ लोगों ने कहा कि केजरीवाल पंजाब सरकार की कमान संभालने जा रहे हैं, तो कुछ ने यह भी कयास लगाया कि वह राज्यसभा जा सकते हैं. लेकिन पार्टी सूत्रों के मुताबिक, सच्चाई कुछ और थी. केजरीवाल ने इस समय का इस्तेमाल संगठन को मजबूत करने के लिए किया. उन्होंने दिल्ली की सभी 70 विधानसभा सीटों के प्रदर्शन की गहराई से समीक्षा की. हर उम्मीदवार से मुलाकात की और यह समझने की कोशिश की कि कहां पार्टी से गलती हुई. पार्टी के वरिष्ठ नेता और चुनाव रणनीतिकार लगातार उनसे मिलने आते-जाते रहे.

इसी दौरान केजरीवाल ने कुछ सख्त फैसले भी लिए. उन्होंने पार्टी के भरोसेमंद और अनुभवी नेताओं को अलग-अलग राज्यों की जिम्मेदारी सौंपी. दिल्ली में पार्टी नेतृत्व को भी नया रूप दिया गया. पार्टी नेताओं का कहना है कि केजरीवाल भले ही दिल्ली में सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आ रहे थे, लेकिन वह अंदर ही अंदर पार्टी को फिर से खड़ा करने में लगे थे.

बाकी राज्यों में क्‍या मिलेगी कामयाबी?

इसके बाद पार्टी ने तय किया कि अब सिर्फ दिल्ली पर नहीं, बल्कि पूरे देश में संगठन मजबूत किया जाएगा. मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन को पंजाब भेजा गया. खुद केजरीवाल भी पंजाब में ज्यादा समय बिताने लगे. गोपाल राय को गुजरात की जिम्मेदारी दी गई, अतिशी को गोवा भेजा गया और सौरभ भारद्वाज को दिल्ली की कमान सौंपी गई. नेताओं को साफ निर्देश दिए गए कि उन्हें जमीन स्तर पर पार्टी को मजबूत करना है और बिना अनुमति दिल्ली नहीं लौटना है. हालांकि, इस रणनीति से पंजाब में कुछ असहजता भी पैदा हुई. वहां विपक्ष ने आरोप लगाया कि भगवंत मान सरकार को दिल्ली से रिमोट कंट्रोल किया जा रहा है. इसके बावजूद केजरीवाल पंजाब सरकार के कामकाज में लगातार सक्रिय रहे. हाल ही में वह भगवंत मान के साथ राज्य की यूनिवर्सल हेल्थ केयर योजना के लॉन्च कार्यक्रम में भी नजर आए.

दिल्‍ली अब भी दिल में

दिल्ली में केजरीवाल की पहली बड़ी सार्वजनिक मौजूदगी जून में जंतर-मंतर पर देखने को मिली, जब उन्होंने झुग्गियों और अवैध कॉलोनियों पर कार्रवाई के खिलाफ प्रदर्शन किया. इसके बाद नए साल की पूर्व संध्या पर पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ वह जश्न में शामिल हुए. पार्टी का चुनावी गीत ‘फिर से केजरीवाल’ भी चलाया गया, जिस पर कार्यकर्ता नाचे. केजरीवाल दूर खड़े होकर मुस्कुराते और ताली बजाते दिखे. पिछले कुछ महीनों में आम आदमी पार्टी दिल्ली में विपक्ष की भूमिका में काफी आक्रामक रही है. प्रदूषण, महिलाओं को दिए जाने वाले 2500 रुपये के वादे, स्कूल फीस बढ़ोतरी जैसे मुद्दों पर पार्टी ने सरकार को घेरा. हाल ही में दिल्ली जल बोर्ड की खुदाई में एक युवक की मौत को लेकर भी केजरीवाल ने सरकार पर हमला बोला और इसे “हत्या” करार दिया.

पार्टी सूत्रों के मुताबिक, केजरीवाल की फिलहाल तीन बड़ी प्राथमिकताएं हैं - पंजाब को बचाए रखना, गोवा जीतना और गुजरात व उत्तर प्रदेश में पार्टी का विस्तार करना. अगले साल इन सभी राज्यों में चुनाव होने हैं और यह आम आदमी पार्टी के लिए बहुत बड़ा इम्तिहान होगा. पार्टी नेताओं का कहना है कि दिल्ली हारने के बाद पंजाब को बचाना सबसे जरूरी है, क्योंकि यह पार्टी की राष्ट्रीय पहचान को बनाए रखेगा.

पुराने मॉडल पर लौटना मजबूरी या जरूरत?

इसके साथ ही, केजरीवाल फिर से पार्टी के पुराने मॉडल पर लौटना चाहते हैं, जिसमें उम्मीदवारों को जीतने की संभावना या पारिवारिक रसूख के बजाय उनकी काबिलियत और ईमानदारी के आधार पर चुना जाता था. पार्टी नेताओं का मानना है कि दिल्ली की हार से उन्हें सबक मिला है कि राजनीति में वह तरीका सबसे अच्छा होता है जो पार्टी की मूल सोच से जुड़ा हो.

इस तरह, दिल्ली की हार के बाद अरविंद केजरीवाल ने खुद को पूरी तरह राजनीति से अलग नहीं किया, बल्कि चुपचाप संगठन को दोबारा मजबूत करने की रणनीति बनाई. सार्वजनिक मंच से दूर रहकर उन्होंने पार्टी को नए सिरे से खड़ा करने की कोशिश की, ताकि आने वाले चुनावों में आम आदमी पार्टी फिर से खुद को एक मजबूत राजनीतिक ताकत के रूप में साबित कर सके.

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