Bihar Assembly Election: कैंसिल हो जाएंगे बिहार चुनाव, 10 हजार की गड्डी वाला मसला क्या है?
बिहार चुनाव 2025 पर संकट? 10 हजार रुपये ट्रांसफर मामले में जन सुराज की सुप्रीम कोर्ट में याचिका, चुनाव रद्द करने की मांग से सियासी हलचल तेज.;
क्या बिहार विधानसभा चुनाव 2025 पर अब खतरे के बादल मंडरा रहे हैं? एनडीए को बंपर बहुमत दिलाने वाला चुनाव क्या रद्द हो सकता है? यह सवाल इसलिए उठ खड़ा हुआ है क्योंकि ‘10 हजार की गड्डी’ वाले मामले को लेकर प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है. मामला मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना से जुड़ा है, जिसके तहत चुनाव से ठीक पहले लाखों महिलाओं के बैंक खातों में ₹10-10 हजार रुपये ट्रांसफर किए गए थे.
जन सुराज पार्टी का आरोप है कि जब राज्य में आदर्श आचार संहिता लागू थी, उसी दौरान नई लाभार्थियों को जोड़कर यह रकम बांटी गई, जिससे मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश की गई. पार्टी ने इसे संविधान और चुनाव कानूनों का उल्लंघन बताते हुए चुनाव नतीजों को रद्द करने और बिहार में दोबारा मतदान कराने की मांग की है.
चुनाव नतीजों को ‘अवैध’ घोषित करने की मांग
जन सुराज पार्टी ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर अपनी याचिका में मांग की है कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों को “शून्य और अमान्य (null and void)” घोषित किया जाए. इसके साथ ही निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया जाए कि राज्य में दोबारा स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराए जाएं. इस मामले की सुनवाई शुक्रवार को चीफ जस्टिस सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची की पीठ करेगी.
महिला योजना को लेकर उठाया सवाल
याचिका में विशेष रूप से मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना को निशाने पर लिया गया है. इस योजना के तहत महिलाओं को स्वरोजगार शुरू करने के लिए शुरुआती तौर पर ₹10,000 की आर्थिक सहायता दी जाती है. जन सुराज पार्टी का आरोप है कि चुनाव आचार संहिता लागू होने के दौरान योजना के नए लाभार्थी जोड़े गए. इसके अलावा लाखों महिलाओं को चुनाव से ठीक पहले सीधे बैंक खाते में पैसे ट्रांसफर किए गए. यह कदम मतदाताओं को प्रभावित करने के उद्देश्य से उठाया गया. पार्टी का दावा है कि करीब 25 से 35 लाख महिला मतदाताओं को यह राशि दी गई, जो जनप्रतिनिधित्व कानून (Representation of People Act) के तहत “भ्रष्ट आचरण” की श्रेणी में आता है.
संविधान के कई अनुच्छेदों के उल्लंघन का आरोप
याचिका में कहा गया है कि यह पूरी प्रक्रिया अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार), अनुच्छेद 112 और 202 (वित्तीय प्रावधान) और अनुच्छेद 324 (चुनाव आयोग की शक्तियां) का उल्लंघन करती है. जन सुराज पार्टी ने मांग की है कि निर्वाचन आयोग इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 के तहत कार्रवाई करे.
पोलिंग बूथ पर महिलाओं की तैनाती पर भी आपत्ति
याचिका में एक और गंभीर आरोप लगाया गया है कि मतदान के दौरान जीविका समूहों से जुड़ी करीब 1.8 लाख महिला लाभार्थियों को मतदान केंद्रों पर तैनात किया गया, जो निष्पक्ष चुनाव की भावना के खिलाफ है. पार्टी का कहना है कि जिन महिलाओं को सरकारी योजना का लाभ मिला, उन्हें चुनाव प्रक्रिया में शामिल करना हितों के टकराव (conflict of interest) की स्थिति पैदा करता है.
‘फ्रीबी’ और डीबीटी योजनाओं पर गाइडलाइन की मांग
जन सुराज पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट से यह भी अनुरोध किया है कि चुनाव से पहले दी जाने वाली फ्रीबी और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) योजनाओं के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश तय किए जाएं. ऐसी योजनाओं को लागू करने के लिए कम से कम 6 महीने का अंतराल अनिवार्य किया जाए ताकि चुनाव स्वतंत्र, निष्पक्ष और बिना लालच के कराए जा सकें.
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन ने 243 में से 202 सीटें जीतकर सत्ता बरकरार रखी. INDIA गठबंधन को सिर्फ 35 सीटों पर संतोष करना पड़ा, जिनमें कांग्रेस की 6 सीटें शामिल हैं. जन सुराज पार्टी का खाता भी नहीं खुल सका और उसके अधिकांश उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई.
इस याचिका से बिहार की राजनीति में एक नया मोड़ आ गया है. यदि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में सुनवाई के बाद हस्तक्षेप करता है, तो यह चुनावी योजनाओं और सरकारी सहायता कार्यक्रमों पर दूरगामी असर डाल सकता है.