प्यार का चश्मा या दिमाग का धोखा? क्यों रिश्ते की शुरुआत में नहीं दिखती पार्टनर में कोई कमी
रिश्ते की शुरुआत में पार्टनर की हर बात अच्छी लगती है और कमियां नजर ही नहीं आतीं. मनोविज्ञान के अनुसार, यह दिमाग का ‘पॉजिटिव फिल्टर’ होता है, जो हमें सामने वाले की खूबियां ज्यादा दिखाता है और कमियों को अनदेखा कर देता है.;
रिश्ते की शुरुआत अक्सर किसी फिल्मी सीन जैसी लगती है. हर बात अच्छी, हर आदत प्यारी, और हर कमी भी ‘क्यूट’ लगने लगती है. आपको लगता है कि आपने दुनिया का सबसे परफेक्ट इंसान खोज लिया है. लेकिन कुछ महीनों बाद वही आदतें खटकने लगती हैं, जिन पर पहले आप मुस्कुराते थे. आखिर ऐसा क्यों होता है?
क्या सामने वाला बदल जाता है, या हमारी नजर? आखिर यह प्यार का चश्मा या दिमाग का धोखा? रिश्ते की शुरुआत में भावनाएं और हार्मोन मिलकर एक ऐसा पॉजिटिव इफेक्ट बनाते हैं, जिसमें हम सामने वाले की खूबियों पर ज्यादा ध्यान देते हैं और कमियों को अनदेखा कर देते हैं.
लव हार्मोन का कमाल
रिश्ते की शुरुआत में हमारे शरीर में डोपामिन, ऑक्सीटोसिन और सेरोटोनिन जैसे ‘फील-गुड’ हार्मोन बढ़ जाते हैं. ये हार्मोन हमें खुश, एक्साइटेड और जुड़ा हुआ महसूस कराते हैं. इसी दौरान दिमाग एक तरह का ‘पॉजिटिव फिल्टर’ लगा लेता है, जिससे हमें सामने वाले की खूबियां ज्यादा दिखती हैं और कमियां नजरअंदाज हो जाती हैं. यानी उस समय आप व्यक्ति को नहीं, अपने इमोशन के चश्मे से उसे देख रहे होते हैं.
हेलो इफेक्ट
साइकोलॉजी में एक शब्द है ‘हेलो इफेक्ट’. इसका मतलब है कि यदि किसी व्यक्ति की एक बात आपको बहुत अच्छी लग जाए, तो आप मान लेते हैं कि उसकी बाकी बातें भी अच्छी ही होंगी. जैसे अगर कोई बहुत अच्छा बोलता है, तो आपको लगता है कि वह समझदार, जिम्मेदार और संवेदनशील भी होगा. भले ही आपने यह परखा न हो. यही कारण है कि शुरुआती दिनों में दिमाग खुद ही सामने वाले की इमेज को ‘परफेक्ट’ बना देता है.
कल्पना बनाम रियलिटी
रिश्ते की शुरुआत में हम सामने वाले को जैसे है, वैसे नहीं देखते; बल्कि जैसे हम उसे देखना चाहते हैं, वैसे देखने लगते हैं. हम अपनी उम्मीदों, इच्छाओं और कल्पनाओं को उस व्यक्ति पर थोप देते हैं. दिमाग एक खूबसूरत कहानी बना लेता है, जिसमें कमियों की जगह ही नहीं होती.
समय के साथ क्यों बदलती है नजर?
जैसे-जैसे समय बीतता है, हार्मोन का असर सामान्य होने लगता है और दिमाग का ‘पॉजिटिव फिल्टर’ हटने लगता है. तब आप चीजों को ज्यादा असली नजर से देखने लगते हैं. वही आदतें, जो पहले अनदेखी थीं, अब साफ नजर आने लगती हैं. असल में, सामने वाला नहीं बदलता बल्कि आपकी देखने की क्षमता नॉर्मल हो जाती है.
तो क्या यह बुरा है?
यह प्रोसेस पूरी तरह नैचुर है. रिश्ते की असली मजबूती तब बनती है, जब आप सामने वाले की कमियों को जानकर भी उसे अपनाते हैं. शुरुआत का अट्रैक्शन धीरे-धीरे समझ और अपनाने में बदलता है और यही रिश्ते को टिकाऊ बनाता है.