Tech के कारण Gen Z का दिमाग हुआ फुस्स, मिलेनियल्स हैं ज्यादा समझदार, नई रिपोर्ट में कई खुलासे
हाल ही में एक न्यूरोसाइंटिस्ट के दावे के मुताबिक, जेन Z का IQ मिलेनियल्स से कम है. ध्यान, याददाश्त, पढ़ने-समझने और समस्या सुलझाने जैसे स्किल्स में गिरावट की बात सामने आई है.;
सुबह की शुरुआत मोबाइल से, पढ़ाई टैबलेट पर, सवालों के जवाब वीडियो से, और नोट्स AI से. यह आज की पीढ़ी का लाइफस्टाइल है. लेकिन क्या यही आदतें उनकी सोचने-समझने की क्षमता को धीरे-धीरे कम कर रही हैं? एक न्यूरोसाइंटिस्ट का दावा है कि Gen Z में मिलेनियल्स से कम दिमाग है.
रिसर्च में कहा गया है कि कि पढ़ाई के तरीके बदल गए हैं, लेकिन दिमाग की ज़रूरतें नहीं बदलीं और यहीं से समस्या शुरू हुई.
Gen Z में मिलेनियल्स से कम दिमाग
पहले किताबें होती थीं, ब्लैकबोर्ड होता था, और टीचर के साथ सीधी बात होती थी. अब वही जगह स्मार्ट स्क्रीन, शॉर्ट वीडियो और डिजिटल नोट्स ने ले ली है. जानकारी पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ी से मौजूद है, लेकिन गहराई से समझने का समय और धैर्य कम होता जा रहा है. एक्सपर्ट्स के अनुसार, सीखना केवल सूचना लेना नहीं, बल्कि उसे सोचकर, जोड़कर और याद रखकर समझना होता है जो तेज़ स्क्रॉलिंग में मुमकिन नहीं हो पाता.
2010 के बाद क्या बदला?
न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. जेरेड कूनी होर्वथ का कहना है कि लगभग 2010 के बाद छात्रों की सोचने-समझने की क्षमता में गिरावट दिखने लगी. पढ़ने की समझ, गणित में पकड़, ध्यान लगाने की ताकत और समस्याओं को हल करने जैसे कौशल पहले की तुलना में कमजोर पाए गए. उसी दौर में स्कूलों में बड़े पैमाने पर डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल बढ़ा. उनका दावा है कि जैसे-जैसे पढ़ाई में तकनीक बढ़ी, वैसे-वैसे सीखने की क्वालिटी पर नेगेटिव असर दिखने लगा.
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छोटे वीडियो बनाम बड़ी किताबें
डॉ. जेरेड कूनी होर्वथ ने बताया कि इंसान का दिमाग किसी भी बात को अच्छे से समझने के लिए समय और गहराई चाहता है. बड़ी किताबें पढ़ना, लंबे लेख समझना और विस्तार से चर्चा करना दिमाग को सोचने के लिए मजबूर करता है. इसके उलट, छोटे वीडियो या केवल पॉइंट्स में दी गई जानकारी से बस ऊपरी समझ बनती है. इससे टॉपिक की गहराई नहीं बन पाती और याद रखने की क्षमता भी धीरे-धीरे कमजोर हो सकती है.
ह्यूमन कॉन्टैक्ट की कमी
विशेषज्ञों का कहना है कि इंसान ने हमेशा बातचीत और साथ मिलकर सीखना सीखा है. टीचर से बात करना, दोस्तों के साथ चर्चा करना और समूह में पढ़ाई करना दिमाग को ज्यादा एक्टिव बनाता है.लेकिन अब स्क्रीन पर ज्यादा निर्भरता के कारण आमने-सामने बातचीत कम हो गई है. इससे सीखने का नैचुरल प्रोसेस पर असर पड़ रहा है.
क्या सॉल्यूशन है?
न्यूरोसाइंटिस्ट का कहना है कि तकनीक को बेहतर बनाकर समस्या हल नहीं होगी, क्योंकि समस्या की जड़ ही तकनीक पर ज्यादा डिपेंडेंसी है. पढ़ाई के लिए फिर से किताबों, गहरी पढ़ाई और आमने-सामने बातचीत को तवज्जो देना जरूरी है. स्क्रीन पूरी तरह हटाना मुमकिन नहीं, लेकिन उसका बैलेंस यूज ही दिमाग को हेल्दी रख सकता है.
क्या हम सुविधा के बदले दिमाग खो रहे हैं?
आज के समय में जवाब जल्दी मिल जाते हैं, लेकिन सोचने की आदत कम होती जा रही है. सुविधा बढ़ी है, पर क्या समझ घट रही है? यह सवाल केवल एक पीढ़ी का नहीं, पूरी शिक्षा व्यवस्था का है. यदि सीखने के तरीकों पर फिर से सोचा नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियों की सोचने की क्षमता पर इसका गहरा असर पड़ सकता है.