एक्साइटमेंट या थ्रिल! आखिर पब्लिक प्लेस में इंटिमेट होने का क्यों बढ़ रहा ट्रेंड? एक्सपर्ट से जानें इसके पीछे छिपा माइंडसेट

आज के डिजिटल समय में इंटरनेट और सोशल मीडिया हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुके हैं. लेकिन इसी दुनिया में कुछ ऐसे वीडियो भी सामने आ रहे हैं, जिनमें लोग पब्लिक प्लेस पर फिजिकल होते नजर आ रहे हैं. यह मुद्दा सिर्फ अश्लीलता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे साइकोलॉजिकल, सामाजिक और डिजिटल दौर से जुड़ी कई परतें छुपी हुई हैं. चलिए जानते हैं आखिर पब्लिक प्लेस में इंटिमेट होने का ट्रेंड क्यों बढ़ रहा है.;

( Image Source:  AI SORA )
Edited By :  हेमा पंत
Updated On : 5 Jan 2026 5:00 PM IST

सोशल मीडिया और इंटरनेट के दौर में पब्लिक प्लेस पर इंटिमेट होने के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं. जो चीज़ कभी पूरी तरह प्राइवेट मानी जाती थी, वह अब खुलेआम कैमरे में कैद हो रही है और अश्लील वीडियो वायरल भी हो रहे हैं. यह ट्रेंड सिर्फ अश्लीलता या ध्यान खींचने तक सीमित नहीं है.

बल्कि इसके पीछे लोगों की सोच, मेंटल कंडीशन और डिजिटल आदतों से जुड़ी कई वजहें छिपी हैं. आखिर ऐसे लोग क्या सोचते हैं, उन्हें पब्लिक जगहों पर ऐसा करने के लिए क्या इंस्पायर करता है, इन्हीं सवालों के जवाबों के लिए हमने डॉ. चांदनी टुगनाइट से बात की है, जो एक जानी-मानी एमडी (ए.एम.), कोच और हीलर हैं. 

एक्साइटमेंट और थ्रिल की तलाश

एक्सपर्ट चांदनी ने बताया कि कुछ लोग एक्साइटमेंट और थ्रिल की तलाश में ऐसा करते हैं. एक्सपर्ट ने बताया कि ऐसे लोगों को भीड़भाड़ वाली जगहों पर पकड़े जाने का डर एक अजीब सा रोमांच देता है. यह खतरा उनके दिमाग में तेज़ उत्तेजना पैदा करता है, जो उन्हें नॉर्मल पर्सनल माहौल से ज़्यादा मज़ेदार लगने लगता है. धीरे-धीरे यही थ्रिल उनकी आदत बन जाती है. 

डिजिटल डिसेंसिटाइज़ेशन का असर

एक्सपर्ट के अनुसार, डिजिटल डिसेंसिटाइजेशन के असर के चलते भी लोग अक्सर पब्लिक में ऐसी हरकतें करने लगते हैं. लगातार अश्लील और प्रोएक्टिव कंटेंट देखने से दिमाग नॉर्मल चीजों से संतुष्ट नहीं रहता है. इसके चलते व्यक्ति को वही एक्सपीरियंस बोरिंग होने लगता है. इसके कारण वह इंसान को हर बार कुछ नया और ज़्यादा तीखा चाहिए होता है. इसी प्रोसेस में प्राइवेट और पब्लिक की लाइन धुंधली होने लगती है.

सीमाओं की समझ कमजोर हो

ऐसे लोग अक्सर यह नहीं सोचते कि पब्लिक प्लेस सबके लिए होते हैं. वहां बच्चे, महिलाएं, बुज़ुर्ग और परिवार मौजूद होते हैं. निजी पलों को खुलेआम दिखाना यह बताता है कि व्यक्ति को सामाजिक सीमाओं और दूसरों की भावनाओं की समझ कम हो गई है.

देखने वालों के दिमाग पर कैसा होता है असर?

इन वीडियो का असर सिर्फ करने वालों तक सीमित नहीं रहता है. बार-बार ऐसी चीजें देखने से लोगों को यह सब सामान्य लगने लगता है. खासकर यंगस्टर्स इसे ‘कूल’ या ‘ट्रेंड’ समझने लगते हैं, जिससे गलत सोच धीरे-धीरे जड़ पकड़ लेती है.

डर और इनसिक्योरिटी की भावना 

जब ऐसे वीडियो वायरल होते हैं, तो कई लोगों को सार्वजनिक जगहें असुरक्षित लगने लगती हैं. महिलाओं और परिवारों में डर बढ़ता है. समाज में भरोसे और सुरक्षा की भावना कमजोर होने लगती है, जो किसी भी स्वस्थ समाज के लिए खतरे की घंटी है. पब्लिक जगहों पर इस तरह की हरकतों को सिर्फ निजी आज़ादी कहकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है. डिजिटल दौर में आज़ादी के साथ ज़िम्मेदारी भी उतनी ही ज़रूरी है. जब निजी हरकतें सार्वजनिक होती हैं, तो उसका असर पूरे समाज को झेलना पड़ता है. इसलिए ज़रूरत है रुककर सोचने की, सीमाओं को समझने की और जिम्मेदार व्यवहार अपनाने की.

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