होली पर बना रहे हैं मालपुआ, तो ऋग्वेद से मुगल दरबार तक जाने लें भारत की पहली मिठाई का इतिहास

क्या मालपुआ वास्तव में भारत की सबसे प्राचीन मिठाई है? वेदिक 'अपूपा' से लेकर बंगाल-ओडिशा रसगुल्ला विवाद तक, यह कहानी भारतीय संस्कृति की गहराई दिखाती है.

( Image Source:  AI Sora )
Edited By :  रूपाली राय
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कल्पना कीजिए, हजारों साल पहले का भारत का वो दौर जब वेदों की रचना हो रही थी, और आर्य लोग नदियों के किनारे बसे हुए थे. उस समय, जब चीनी का नामोनिशान नहीं था, तब भी लोग मिठास का स्वाद कैसे चखते थे. यह कहानी है भारत की ऐतिहासिक पहली मिठाई की मालपुआ की, जिसे प्राचीन काल में 'अपूपा' कहा जाता था.

यह मिठाई न सिर्फ स्वादिष्ट है, बल्कि इसके पीछे छुपा है एक गहरा इतिहास, जो धार्मिक अनुष्ठानों, सांस्कृतिक बदलावों और समय की धारा से जुड़ा है. आइए, इसकी शुरुआत से लेकर आज तक की यात्रा को एक कहानी की तरह समझें.

वेदिक काल की मिठास

करीब 1500 ईसा पूर्व, ऋग्वेद दुनिया की सबसे पुरानी धार्मिक किताब में पहली बार इस मिठाई का जिक्र मिलता है. अपूपा एक साधारण लेकिन पवित्र व्यंजन था, जो जौ के आटे से बनाया जाता था. आर्य लोग इसे फ्लैट केक के रूप में तैयार करते थे. आटे को गोल आकार देकर घी में तला जाता, या कभी-कभी पानी में उबाला जाता, और फिर शहद में डुबोकर परोसा जाता. यह न सिर्फ भोजन था, बल्कि देवताओं को प्रसाद भी. ऋग्वेद में कहा गया है कि भोजन से अज्ञानता और बंधनों का अंत होता है, और अपूपा जैसे व्यंजन इसी फिलॉसफी का हिस्सा थे. उस दौर में जौ मुख्य अनाज था और घी व शहद प्रकृति के उपहार. यह मिठाई इतनी पुरानी है कि यह चीनी के आविष्कार से भी पहले की है. शुरू में, यह एक धार्मिक प्रसाद था, लेकिन धीरे-धीरे घरेलू उत्सवों में शामिल हो गया.

समय के साथ बदलाव: साम्राज्यों की छाप

समय बीता, और अपूपा 'मालपुआ' बन गया. गुप्त काल (400 ईस्वी) तक, इसकी रेसिपी में बदलाव आए. अब जौ के अलावा चावल या गेहूं का आटा इस्तेमाल होने लगा. बौद्ध काल में, टूटे चावल से बनाया जाने वाला 'कनापुवम' इसका एक रूप था. इस्लामिक शासन के दौरान, मुगल और सुल्तान कोर्ट्स में मालपुआ ने नया रूप लिया. अंडे और खोया (मावा) मिलाए गए, जो आज भी कुछ वैरिएंट्स में देखने को मिलते हैं. चीनी का आगमन हुआ, और शहद की जगह चाशनी ने ली. विभिन्न क्षेत्रों में इसकी विविधताएं उभरीं राजस्थान में मोटा और खस्ता मालपुआ, बंगाल में पतला और रबड़ी के साथ, जबकि उत्तर प्रदेश में फलों के साथ. होली, दिवाली और ईद जैसे त्योहारों में यह हर घर में बनने लगा था.

आज की मालपुआ: विरासत का स्वाद

आज मालपुआ भारत, बांग्लादेश, नेपाल और पाकिस्तान में अलग-अलग नामों और स्वादों में मिलता है.

इस होली पर बनाने के लिए जान ले इसकी आसान रेसिपी

सामग्री बैटर के लिए:

  • 1 कप मैदा 
  • ½ कप सूजी– इससे क्रिस्पी और स्पंजी बनता है
  • ¼ कप चीनी- (पिसी हुई)
  • ½ टीस्पून सौंफ पाउडर- खास स्वाद के लिए
  • ¼ टीस्पून इलायची पाउडर 
  • 1-1½ कप दूध (या रबड़ी, ज्यादा रिच टेस्ट के लिए)- बैटर पतला रखें
  • चुटकी भर नमक (ऑप्शनल)
  • ½ टीस्पून बेकिंग सोडा या एनो (फ्लफी बनाने के लिए, ऑप्शनल)

1. बनाने की विधि- बैटर तैयार करें:

  • एक बड़े बाउल में मैदा, सूजी, चीनी, सौंफ पाउडर, इलायची पाउडर और नमक डालकर अच्छे से मिलाएं
  • धीरे-धीरे दूध डालते हुए फेंटें. बैटर पैनकेक बैटर जैसा पतला होना चाहिए ज्यादा गाढ़ा नहीं, नहीं तो मालपुआ मोटा बनेगा
  • अगर बेकिंग सोडा इस्तेमाल कर रहे हैं, तो आखिर में मिलाएं। बैटर को 20-30 मिनट ढककर रखें (फर्मेंटेशन से स्पंजी बनेगा)

2. चाशनी बनाएं:

  • एक कढ़ाई में चीनी और पानी डालकर मध्यम आंच पर पकाएं
  • चीनी घुलने के बाद 1-तार वाली चाशनी बनाएं (उंगली से चेक करें: चाशनी चिपचिपी होनी चाहिए)
  • केसर और इलायची पाउडर डालें। चाशनी गरम रखें

3. मालपुआ तलें:

  • कढ़ाई में घी या तेल गर्म करें (मध्यम आंच – ज्यादा गर्म नहीं, वरना बाहर से जल जाएगा)।
  • बैटर को करछी से गोल आकार में डालें
  • दोनों तरफ से सुनहरा होने तक तलें (2-3 मिनट प्रति साइड). मालपुआ में छोटे-छोटे छेद बनने चाहिए यही स्पंजी बनाता है
  • तले हुए मालपुए को सीधे गरम चाशनी में 1-2 मिनट डुबोएं, फिर निकालकर प्लेट में रखें

4. सर्व करें:

  • गर्मागर्म मालपुए को कटे नट्स और केसर से सजाएं
  • रबड़ी के साथ परोसें – स्वाद लाजवाब हो जाएगा

दो राज्यों के बीच रसगुल्ले पर विवाद

हालांकि कुछ लोग यह भी कहते है कि रसगुल्ला भारत की पहली मिठाई है. लेकिन इतिहास की किताबें खोलें, तो जवाब है नहीं. यह एक स्वादिष्ट लेकिन अपेक्षाकृत नई रचना है, जबकि भारत की असली प्राचीन मिठास हजारों साल पुरानी है. रसगुल्ला की शुरुआत पूर्वी भारत में हुई, लेकिन इसका ठीक-ठीक जन्मस्थान आज भी बहस का विषय है. बंगाल वाले कहते हैं कि 1868 में नोबिन चंद्र दास ने कोलकाता के बागबाजार में इसे ईजाद किया. उन्होंने छेना की गेंदों को चाशनी में उबालकर एक नरम, स्पंजी वैरिएंट बनाया, जो पहले से मौजूद 'खीरा मोहन' या पहला 'रसगुल्ला' से अलग था. नोबिन के बेटे कृष्णा चंद्र दास (के.सी. दास) ने इसे टिन में पैक करके दुनिया भर में फैलाया. यह मिठाई जल्दी ही बंगाली संस्कृति का हिस्सा बन गई, दुर्गा पूजा और अन्य त्योहारों में मुख्य आकर्षण. लेकिन ओडिशा वाले इससे सहमत नहीं. वे दावा करते हैं कि रसगुल्ला या रसगोला सदियों पुराना है. जो पुरी के जगन्नाथ मंदिर में भगवान को चढ़ाया जाता है. दांडी रामायण के अनुसार, यह 1500 ईस्वी से मौजूद है. ओडिशा में यह 'खीरा मोहन' के रूप में शुरू हुआ, जो मंदिर की परंपरा से जुड़ा है. यह विवाद इतना गर्माया कि 2017 में ओडिशा को जीआई टैग मिला, जबकि बंगाल को स्पंजी रसगुल्ला का. लेकिन एक बात साफ है रसगुल्ला का इतिहास 19वीं सदी या उससे थोड़ा पहले का है, न कि प्राचीन काल का.

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