निर्विरोध, निर्विवाद और 'हाई कमांड कंसेंसस' - नितिन नबीन के बहाने समझिए बीजेपी अध्यक्ष चुनने की पूरी प्रक्रिया
नितिन नबीन के भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में निर्विरोध चुने जाने के साथ ही पार्टी ने जेपी नड्डा के विस्तारित कार्यकाल को औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार यह बदलाव बीजेपी के “वन पर्सन, वन पोस्ट” सिद्धांत की वापसी और संगठनात्मक अनुशासन को दर्शाता है. पार्टी में राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव औपचारिक प्रक्रिया के तहत होता है, लेकिन अब तक कभी वास्तविक मुकाबला नहीं हुआ.;
नितिन नबीन के मंगलवार को भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में कार्यभार संभालते ही पार्टी ने एक अहम राजनीतिक अध्याय को औपचारिक रूप से बंद कर दिया. जेपी नड्डा के विस्तारित कार्यकाल के बाद यह बदलाव सिर्फ एक नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि बीजेपी की उस संगठनात्मक परंपरा की पुष्टि भी है, जिसे वह वर्षों से अपनाती आई है- ‘वन पर्सन, वन पोस्ट’ का सिद्धांत.
2024 लोकसभा चुनावों के बाद जेपी नड्डा का नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल में शामिल होना इस बदलाव का स्पष्ट संकेत था. नितिन नबीन का अध्यक्ष बनना अब इस बात की पुष्टि करता है कि बीजेपी नेतृत्व पार्टी संगठन को ऐसे हाथों में सौंपना चाहती है, जो न सिर्फ केंद्रीय नेतृत्व के भरोसेमंद हों, बल्कि फैसलों में निरंतरता और स्पष्टता भी सुनिश्चित करें.
यह नियुक्ति एक बार फिर यह दिखाती है कि बीजेपी में शीर्ष नेतृत्व का चयन चुनावी मुकाबले से नहीं, बल्कि सहमति, संगठनात्मक संतुलन और केंद्रीय नेतृत्व की पसंद से होता है.
बीजेपी अध्यक्ष कैसे चुना जाता है, चुनाव क्यों नहीं होता?
बीजेपी में राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव दिखने में भले ही सरल लगे, लेकिन इसके पीछे एक लंबी और सुव्यवस्थित संगठनात्मक प्रक्रिया होती है. यह प्रक्रिया सदस्यता अभियान से शुरू होती है. सबसे पहले पार्टी देशभर में सदस्यता अभियान चलाती है. इसके बाद क्रमशः स्थानीय समिति, मंडल, जिला, क्षेत्रीय और राज्य इकाइयों के चुनाव होते हैं. हर स्तर पर चुना गया अध्यक्ष अपनी टीम के पदाधिकारियों को नामित करता है. जब कम से कम 50% राज्यों में संगठनात्मक चुनाव पूरे हो जाते हैं, तभी राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया शुरू होती है.
बीजेपी के राष्ट्रीय निर्वाचन अधिकारी के. लक्ष्मण ने स्पष्ट किया कि इस बार 36 में से 30 राज्यों में अध्यक्ष चुने जा चुके थे, जो निर्धारित न्यूनतम संख्या से कहीं अधिक है. इसके बाद ही नितिन नबीन के नाम पर मुहर लगी.
क्या कभी बीजेपी अध्यक्ष पद के लिए चुनाव हुआ है?
सीधा जवाब है - नहीं. 1980 में पार्टी की स्थापना के बाद से अब तक बीजेपी में कभी भी राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए वास्तविक मुकाबला नहीं हुआ. पार्टी के संविधान में भले ही चुनाव का प्रावधान हो, लेकिन हर बार केवल एक ही उम्मीदवार ने नामांकन दाखिल किया और निर्विरोध अध्यक्ष चुना गया. नितिन नबीन भी इसी परंपरा का हिस्सा बने. हालांकि 2013 में एक दिलचस्प स्थिति बनी थी, जब वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने नामांकन पत्र लिए थे. लेकिन अंततः उन्होंने चुनाव लड़ने का फैसला नहीं किया और मामला वहीं समाप्त हो गया. इसके उलट कांग्रेस जैसी पार्टियों में अध्यक्ष पद के लिए चुनाव हो चुके हैं. 2022 में मल्लिकार्जुन खड़गे और शशि थरूर के बीच मुकाबला इसका उदाहरण है.
RSS की भूमिका कब बढ़ती है, कब घटती है?
बीजेपी अध्यक्ष के चयन में RSS की भूमिका पार्टी की राजनीतिक ताकत पर निर्भर करती है. जब बीजेपी कमजोर होती है, तब RSS का प्रभाव अधिक दिखाई देता है. जब पार्टी सत्ता में और मजबूत स्थिति में होती है, तब निर्णय प्रधानमंत्री और उनके करीबी नेताओं के इर्द-गिर्द सिमट जाता है. 2009 लोकसभा चुनावों में बीजेपी को केवल 116 सीटें मिली थीं. उस दौर में RSS की भूमिका बढ़ी और नितिन गडकरी को महाराष्ट्र से दिल्ली लाकर पार्टी अध्यक्ष बनाया गया. इसके उलट पिछले एक दशक से बीजेपी केंद्र की सत्ता में मजबूत स्थिति में है. ऐसे में अध्यक्ष चयन का फैसला प्रधानमंत्री और सीमित वरिष्ठ नेतृत्व द्वारा लिया जाता है. नितिन नबीन का चयन इसी पैटर्न में फिट बैठता है - केंद्रीय नेतृत्व द्वारा संचालित, सर्वसम्मत फैसला.
अगर दो उम्मीदवार हों, तो क्या होगा?
बीजेपी के संविधान में यह व्यवस्था मौजूद है कि अगर अध्यक्ष पद के लिए एक से अधिक उम्मीदवार मैदान में हों और नाम वापस न लें, तो औपचारिक चुनाव कराया जाएगा. इस स्थिति में सभी राज्य राजधानियों में मतदान होगा, सीलबंद बैलेट बॉक्स दिल्ली लाए जाएंगे और केंद्रीय स्तर पर मतगणना होगी. लेकिन पार्टी के 45 साल के इतिहास में कभी भी यह स्थिति आई ही नहीं.
पार्लियामेंट्री बोर्ड की असली ताकत
नितिन नबीन के नाम पर अंतिम मुहर पार्टी के पार्लियामेंट्री बोर्ड ने लगाई. यह बोर्ड पार्टी के सबसे ताकतवर निर्णय लेने वाले निकायों में से एक है. यह बोर्ड औपचारिक बैठक कर सकता है, अनौपचारिक परामर्श कर सकता है और फोन पर भी सहमति बना सकता है. आपात स्थिति में यह बोर्ड सीधे पूर्णकालिक अध्यक्ष भी नियुक्त कर सकता है, जिसे छह महीने के भीतर राष्ट्रीय परिषद से अनुमोदन लेना होता है.
अध्यक्ष का कार्यकाल कितना होता है?
बीजेपी संविधान के अनुसार राष्ट्रीय अध्यक्ष 3 साल का कार्यकाल पूरा करता है और अधिकतम दो लगातार कार्यकाल (कुल 6 साल) तक रह सकता है. 2012 में RSS के समर्थन से नितिन गडकरी को दूसरा कार्यकाल देने की बात चली थी, लेकिन पार्टी ने अंततः राजनाथ सिंह को अध्यक्ष बनाया. राजनाथ सिंह ने 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को ऐतिहासिक जीत दिलाई और बाद में अमित शाह को जिम्मेदारी सौंपी.
बीजेपी का संगठनात्मक ढांचा कितना मजबूत है?
बीजेपी की ताकत उसकी कैडर-बेस्ड संरचना में है. 18 साल से ऊपर का कोई भी भारतीय नागरिक सदस्य बन सकता है. छह साल की सदस्यता फीस निर्धारित है. एक्टिव मेंबर बनने के लिए कम से कम 3 साल की प्राथमिक सदस्यता, 100 रुपये की नॉन-रिफंडेबल फीस, पार्टी कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी और पार्टी के प्रकाशनों की सदस्यता जरूरी है. स्थानीय समिति में कम से कम 25 सदस्य होते हैं, जो अधिकतम 5,000 की आबादी को कवर करती है. 5 लाख से ज्यादा आबादी वाला शहर जिला माना जाता है और 20 लाख से ऊपर की आबादी वाले शहरों को कई जिलों में बांटा जा सकता है.
बीजेपी सदस्य से क्या अपेक्षा करती है?
बीजेपी का हर सदस्य पार्टी की वैचारिक रीढ़ - दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ - के प्रति निष्ठा की शपथ लेता है. सदस्य को राष्ट्रवाद, लोकतंत्र, गांधीवादी सामाजिक-आर्थिक सोच, सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता और मूल्य आधारित राजनीति के प्रति प्रतिबद्ध रहना होता है. सदस्यता फॉर्म में यह भी स्पष्ट किया जाता है कि पार्टी धर्म आधारित राष्ट्र की अवधारणा को नहीं मानती और जाति, लिंग या आस्था के आधार पर भेदभाव के खिलाफ है.
नितिन नबीन का चयन क्या संकेत देता है?
नितिन नबीन का निर्विरोध अध्यक्ष बनना इस बात का संकेत है कि बीजेपी आने वाले राजनीतिक दौर में संगठन पर पकड़ और मजबूत करना चाहती है. केंद्रीय नेतृत्व के फैसलों में एकरूपता बनाए रखना चाहती है और चुनावी मशीनरी को बिना किसी आंतरिक विवाद के आगे बढ़ाना चाहती है. बीजेपी के लिए अध्यक्ष पद एक चुनावी ट्रॉफी नहीं, बल्कि कमांड एंड कंट्रोल सेंटर है और नितिन नबीन को उसी रणनीतिक भूमिका के लिए चुना गया है.