क्या गे, ट्रांसजेंडर कर सकते हैं ब्लड डोनेट? पढ़ लीजिए सरकार के क्या क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा कि ट्रांसजेंडर, एमएसएम और महिला सेक्स वर्कर्स द्वारा ब्लड डोनेट करने पर लगा प्रतिबंध अभी हटाया नहीं जा सकता. सरकार के मुताबिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला मरीजों की सुरक्षा और जनस्वास्थ्य को ध्यान में रखकर लिया गया है.

( Image Source:  AI Sora )
Edited By :  रूपाली राय
Updated On : 13 March 2026 10:02 AM IST

केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों, समलैंगिक पुरुषों (यानी पुरुषों के साथ यौन संबंध बनाने वाले पुरुषों) और महिला यौनकर्मियों द्वारा ब्लड डोनेट पर लगे प्रतिबंध को बरकरार रखने का फैसला किया है. यह फैसला तब लिया गया जब विशेषज्ञों ने कोर्ट के कहने पर पुराने नियमों की दोबारा समीक्षा की. सरकार की तरफ से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट को सूचना दी कि विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रतिबंध बड़े पैमाने पर लोगों के हित में बहुत जरूरी है. अगर इस प्रतिबंध को ढीला किया गया तो ब्लड चढाने करने वाले मरीजों को नुकसान हो सकता है.

सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है.  कोर्ट कई रिट याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है, जो केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय रक्त आधान परिषद (एनबीटीसी) और राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (एनएसीओ) द्वारा जारी 'ब्लड डोनर सिलेक्शन और ब्लड डोनररेफरल संबंधी दिशानिर्देश, 2017' को चुनौती दे रही हैं. इन दिशानिर्देशों के खंड 12 और 51 में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों, समलैंगिक पुरुषों और महिला यौनकर्मियों को एचआईवी/एड्स, हेपेटाइटिस बी या सी जैसे संक्रमणों के उच्च जोखिम वाले समूह में रखा गया है.इसलिए इन्हें ब्लड डोनेट करने से पूरी तरह रोक दिया गया है. 

क्या कहा कोर्ट ने?

यह रोक स्थायी है, यानी ये लोग कभी भी ब्लड नहीं दे सकते. पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था कि इस प्रतिबंध पर दोबारा विचार करें. कोर्ट ने पूछा था कि क्या पूरी कम्युनिटी को 'जोखिम भरा' मानकर कलंकित करना ठीक है, जबकि मेडिकल जांच की तकनीक बहुत आगे बढ़ चुकी है. लेकिन अब सरकार ने कोर्ट को बताया कि विशेषज्ञों ने समीक्षा की और फिर से यही राय दी कि प्रतिबंध को कमजोर नहीं किया जा सकता, क्योंकि इससे मरीजों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है.

लिंग के आधार भेदभाव 

याचिकाकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ वकील जयना कोठारी ने तर्क दिया कि विशेषज्ञ समिति के फैसले के पीछे के ठोस कारण और तर्क कोर्ट के सामने रिकॉर्ड पर नहीं लाए गए हैं. उन्होंने कहा कि यह फैसला सिर्फ किसी व्यक्ति की यौनिकता (सेक्शुअल ओरिएंटेशन) और लिंग पहचान (जेंडर आइडेंटिटी) के आधार पर भेदभाव करता है, जो संविधान के खिलाफ है. मुख्य न्यायाधीश ने केंद्र के फैसले में दखल देने से इनकार करते हुए कहा कि उन्हें कोई मजबूत वजह बताई जाए कि कोर्ट को निर्देश क्यों जारी करना चाहिए.

क्यों जोखिम में डाला जाए गरीबों को?

उन्होंने कहा, 'लाखों-करोड़ों गरीब लोग फ्री ब्लड डोनेट पर निर्भर हैं. वे प्राइवेट अस्पतालों में महंगा इलाज नहीं करवा सकते. अगर संक्रमण का सिर्फ एक प्रतिशत भी खतरा हो, तो इन गरीब लोगों को क्यों जोखिम में डाला जाए?. जयना कोठारी ने जवाब दिया कि संक्रमण का एक प्रतिशत खतरा भी किसी के लिए नहीं होना चाहिए. उन्होंने कहा कि असली बात यह है कि रक्तदान करने के बाद हर यूनिट की जांच होनी चाहिए. आजकल हर ब्लड की एचआईवी और अन्य जांच की जाती है, जिसमें एनएटी (न्यूक्लिक एसिड टेस्टिंग) जैसी एडवांस्ड जांच भी शामिल है. जांच के बाद ही ब्लड इस्तेमाल किया जाता है.

जिसे जरूरत है वो ले सकता है ब्लड

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ब्लड डोनेट स्वैच्छिक है. अगर कोई व्यक्ति ब्लड देना चाहता है और किसी को उसकी जरूरत है, तो वे ले सकते हैं. कोठारी ने कहा कि आजकल अगर कोई विवाहित हेटरोसेक्शुअल (विषमलैंगिक) व्यक्ति ब्लड डोनेट करता है, तो उससे यह नहीं पूछा जाता कि उसने आखिरी बार असुरक्षित सेक्स कब किया. असुरक्षित सेक्स करना ही जोखिम भरा व्यवहार है, न कि किसी की पहचान. हो सकता है कि कोई विषमलैंगिक व्यक्ति ने भी जोखिम भरा व्यवहार किया हो, तो क्या उसका ब्लड सेफ नहीं माना जाएगा?. एक अन्य वकील ने कहा कि अगर एनएटी टेस्ट को सभी रक्त यूनिट्स के लिए अनिवार्य कर दिया जाए, तो जोखिम बहुत कम हो सकता है.

क्या है ट्रांसजेंडर और गे के लिए रिस्क? 

मुख्य न्यायाधीश ने इसे 'लक्जरी ट्रायल' कहते हुए भी मामले को आगे सुनवाई के लिए लिस्टेड करने पर सहमति दी. कोर्ट के सामने तीन मुख्य याचिकाएं पेंडिंग हैं, जो एलजीबीटीक्यू+ समुदाय के सदस्यों ने दायर की हैं. इनमें राइटर और पूर्व पत्रकार शरीफ डी रंगनेकर, कार्यकर्ता थांगजाम सांता सिंह (मणिपुर से ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट) और कार्यकर्ता हरीश अय्यर शामिल हैं. सरकार ने 2023 में एक हलफनामा दाखिल किया था, जिसमें कहा गया कि ट्रांसजेंडर, एमएसएम (पुरुषों के साथ सेक्स करने वाले पुरुष) और महिला यौनकर्मी एचआईवी, हेपेटाइटिस आदि के उच्च जोखिम में हैं. यह फैसला वैज्ञानिक सबूतों पर आधारित है और एनबीटीसी जैसे विशेषज्ञों ने लिया है.

क्या है बैन होने की मुख्य वजह?

सरकार का कहना है कि यह जन स्वास्थ्य का मामला है, न कि सिर्फ व्यक्तिगत अधिकारों का. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि 2017 के ये दिशानिर्देश एलजीबीटीक्यू+ लोगों और महिला यौनकर्मियों के समानता, गरिमा और जीवन के मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 14, 15 और 21) का उल्लंघन करते हैं. यह प्रतिबंध सिर्फ पहचान के आधार पर है, जो अवैज्ञानिक और पक्षपातपूर्ण है. वे कहते हैं कि अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा जैसे कई देशों ने अब समलैंगिक पुरुषों को रक्तदान की अनुमति दे दी है, कुछ शर्तों के साथ.

1980 के दशक के विचारों पर आधारित 

यह पुराना प्रतिबंध 1980 के दशक के विचारों पर आधारित है, जबकि अब ब्लड जांच की तकनीक बहुत बेहतर हो गई है. एक याचिका में मांग की गई है कि समलैंगिक पुरुषों को कुछ उचित प्रतिबंधों (जैसे जोखिम भरे व्यवहार के बाद कुछ महीने का डेफरल) के साथ रक्तदान की इजाजत दी जाए. साथ ही, समाज को जोखिम भरे व्यवहारों के बारे में जागरूक करने के लिए अभियान चलाए जाएं और मेडिकल छात्रों के स्लेबस में बदलाव किया जाए ताकि उन्हें सही जानकारी मिले. यह मामला अभी चल रहा है और सोशल मीडिया व समाज में बहस का विषय बना हुआ है, जहां एक तरफ जन स्वास्थ्य की सुरक्षा और दूसरी तरफ भेदभाव के खिलाफ लड़ाई है. 

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