ममता बनर्जी को झटका, SC बोला- एजेंसी के काम में दखलंदाज़ी मंजूर नहीं, अफसरों पर दर्ज FIR पर रोक
I-PAC छापेमारी विवाद में पश्चिम बंगाल सरकार को बड़ा झटका लगा है. सुप्रीम कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) के एक अधिकारी के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर रोक लगा दी है. कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए साफ कहा कि जब तक मामले की सुनवाई पूरी नहीं हो जाती, तब तक एफआईआर के आधार पर कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी.;
I-PAC रेड मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अहम टिप्पणी करते हुए साफ संकेत दिए कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच में राज्य सरकार की भूमिका सवालों के घेरे में है. कोर्ट ने माना कि पश्चिम बंगाल सरकार और उसके कुछ अधिकारियों की ओर से जांच प्रक्रिया में हस्तक्षेप हुआ है. इसी आधार पर शीर्ष अदालत ने ममता बनर्जी सरकार और राज्य पुलिस अधिकारियों को नोटिस जारी किया है. कोर्ट ने सभी पक्षों को दो सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है.
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम सिद्धांत दोहराया. कोर्ट ने कहा कि ED को किसी राजनीतिक दल की चुनावी या पार्टी गतिविधियों में दखल देने का अधिकार नहीं है. लेकिन साथ ही यह भी साफ किया कि राज्य सरकार या उसकी एजेंसियां केंद्रीय जांच में बाधा नहीं डाल सकतीं. कोर्ट के मुताबिक यह मामला सिर्फ एक रेड तक सीमित नहीं है, बल्कि देश में कानून के शासन और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता से जुड़ा गंभीर सवाल खड़ा करता है.
कानून बनाम राजनीति की रेखा खींची गई
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि लोकतंत्र में संस्थाओं की सीमाएं तय हैं. अगर केंद्रीय एजेंसियां अपनी सीमा लांघती हैं तो वह भी गलत है, और अगर राज्य सरकारें जांच को प्रभावित करने की कोशिश करती हैं तो वह भी उतना ही गंभीर अपराध है. कोर्ट ने संकेत दिया कि इस संतुलन के टूटने से संवैधानिक ढांचा कमजोर होता है. यही वजह है कि अदालत इस मामले को सामान्य विवाद के तौर पर नहीं देख रही.
भीड़ जुटाने के आरोपों को भी माना गया गंभीर
बेंच ने ED की उस दलील को भी रिकॉर्ड में लिया, जिसमें कहा गया कि 9 जनवरी को TMC के लीगल सेल की ओर से व्हाट्सऐप मैसेज भेजकर हाईकोर्ट परिसर में भीड़ जुटाई गई. ED का दावा है कि इससे कोर्ट परिसर में अव्यवस्था जैसी स्थिति पैदा हुई. सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अगर यह आरोप सही हैं, तो यह न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास माना जाएगा.
राज्य पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर सवाल
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि इस कथित भीड़ जुटाने में राज्य के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की भूमिका भी संदिग्ध रही. उन्होंने इसे बेहद गंभीर मसला बताते हुए कहा कि इसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है. सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को हल्के में नहीं लिया और संकेत दिया कि राज्य पुलिस की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है.
आगे की सुनवाई पर टिकी निगाहें
सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश में पश्चिम बंगाल सरकार को निर्देश दिया है कि I-PAC और आसपास के इलाकों में लगे सभी CCTV कैमरों की फुटेज सुरक्षित रखी जाए. इसके साथ ही अदालत ने ED अधिकारियों के खिलाफ दर्ज पश्चिम बंगाल पुलिस की FIR पर भी रोक लगा दी है. अब इस मामले में सभी की नजरें पश्चिम बंगाल सरकार और पुलिस अधिकारियों के जवाब पर टिकी हैं. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वह इस प्रकरण को सिर्फ राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता से जुड़ा मामला मानकर देख रहा है. आने वाली सुनवाई यह तय करेगी कि ED और राज्य सरकार—दोनों की सीमाएं कहां तक हैं और किसने उन सीमाओं का उल्लंघन किया.