तेल महंगा, ऊर्जा सुरक्षा और खाड़ी में भारतीयों की नौकरी पर भी मंडराया खतरा; Iran Israel US War का India पर क्या-क्या असर हुआ?

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ने लगा है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव से तेल सप्लाई बाधित हो रही है और कीमतें बढ़ रही हैं. साथ ही खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीयों से आने वाले लगभग 50 अरब डॉलर के रेमिटेंस पर भी खतरा मंडरा रहा है.

ईरान इजरायल युद्ध से भारत की गैस सप्लाई और खाड़ी में नौकरियों पर असर

(Image Source:  Sora_ AI )
Edited By :  अच्‍युत कुमार द्विवेदी
Updated On : 13 March 2026 10:37 PM IST

Iran vs Israel US War: अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद ईरान के साथ चल रहा युद्ध अब वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर डालने लगा है. करीब दो हफ्तों से जारी इस संघर्ष के कारण ऊर्जा आपूर्ति, तेल की कीमतों और खाड़ी क्षेत्र में काम करने वाले लाखों लोगों की सुरक्षा पर बड़ा खतरा पैदा हो गया है. इसका सीधा असर भारत पर भी पड़ सकता है, क्योंकि भारत की ऊर्जा जरूरतें और बड़ी संख्या में भारतीय कामगार खाड़ी देशों पर निर्भर हैं.

मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ने के बाद दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्गों में से एक Strait of Hormuz लगभग ठप हो गया है. इसी रास्ते से दुनिया के करीब 20-30 प्रतिशत कच्चे तेल और एलएनजी की सप्लाई होती है. रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान ने अमेरिका-इज़राइल के हमलों के जवाब में इस समुद्री रास्ते से गुजरने वाले जहाजों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है, जिससे तेल और गैस की सप्लाई बाधित हो रही है. इसका असर सीधे ऊर्जा बाजार पर दिख रहा है. 

युद्ध का भारत पर क्या असर हुआ?

  • युद्ध से पहले कच्चे तेल की कीमत करीब 60 डॉलर प्रति बैरल थी, जो बढ़कर लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई. ईरान की सैन्य इकाई Islamic Revolutionary Guard Corps ने चेतावनी दी है कि अगर संघर्ष जारी रहा तो तेल की कीमत 200 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती है. स्थिति संभालने के लिए International Energy Agency ने रिकॉर्ड 400 मिलियन बैरल तेल बाजार में जारी करने का फैसला भी किया, लेकिन इससे भी कीमतों में स्थिरता नहीं आ पाई.
  • भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता ऊर्जा सुरक्षा है. भारत अपनी गैस का 80 प्रतिशत और तेल का लगभग 60 प्रतिशत इसी मार्ग से आयात करता है. ऐसे में अगर यह समुद्री रास्ता लंबे समय तक बाधित रहा तो देश में गैस और तेल की कमी का खतरा बढ़ सकता है. कुछ शहरों में लोग एलपीजी सिलेंडर जमा करने के लिए लाइन में लगते भी देखे गए. हालांकि सरकार ने कहा है कि देश के पास लगभग एक महीने का स्टॉक मौजूद है.
  • ऊर्जा संकट के अलावा भारत के सामने दूसरा बड़ा जोखिम खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीयों से आने वाली रकम यानी रेमिटेंस का है. संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर, ओमान, कुवैत और बहरीन जैसे देशों के समूह Gulf Cooperation Council में करीब 91 लाख भारतीय काम करते हैं. ये लोग हर साल भारत में लगभग 50 अरब डॉलर भेजते हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.
  • विशेषज्ञों का कहना है कि अगर युद्ध लंबा चला तो खाड़ी में कई तेल और गैस कंपनियों को काम रोकना पड़ सकता है, जिससे भारतीय कामगारों की नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं. कई भारतीय मजदूरों और पेशेवरों ने भी आशंका जताई है कि संघर्ष बढ़ने पर उन्हें नौकरी खोनी पड़ सकती है.
  • इसके अलावा भारत के सामने एक बड़ी चुनौती अपने नागरिकों की सुरक्षा भी है. खाड़ी देशों में करीब 9.1 मिलियन भारतीय रहते हैं. अगर युद्ध और फैलता है तो इतने बड़े पैमाने पर लोगों को सुरक्षित निकालना किसी भी देश के लिए बेहद कठिन काम होगा.
  • भारत ने अतीत में भी बड़े पैमाने पर अपने नागरिकों को संकट से निकाला है. 1990-91 के खाड़ी युद्ध के दौरान भारत ने कुवैत से करीब दो लाख लोगों को सुरक्षित वापस लाया था. फिलहाल विदेश मंत्रालय ने स्थिति पर नजर रखने के लिए कंट्रोल रूम और हेल्पलाइन शुरू की हैं.
  • विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मध्य-पूर्व में तनाव और बढ़ता है तो भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए नए स्रोत तलाशने पड़ सकते हैं. रूस और अमेरिका से ऊर्जा खरीद बढ़ाना भी एक विकल्प माना जा रहा है.

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