उद्धव जी, 28 साल तक शिवसेना ने किया राज, फिर क्यों बीजेपी को सौंप दिया BMC? काश! आपने न किए होते ये 'गुनाह'
बृहन्न मुंबई नगर निगम महानगरपालिका (BMC) पर 30 साल से शिवसेना का एकक्षत्र राज था, लेकिन पिछले कुछ सालों के दौरान एक के बाद एक गलत फैसलों की वजह से बीएमसी चुनाव 2026 शिवसेना यूबीटी हाई गई. या यूं कहें कि अपनी नासमझी से बीजेपी नेतृत्व वाली महायुति को दोनों हाथों से बीएमसी का किला सौंप दिया. यह जानते हुए कि महाराष्ट्र उसी की चलती है, जिसका बीएमसी पर कब्जा होता है.;
बृहन्न मुंबई नगर निगम सिर्फ एक नगर निगम नहीं, शिवसेना की राजनीतिक रीढ़ रही है. बाला साहब ठाकरे के दौर से लेकर उद्धव ठाकरे तक, BMC सत्ता, पैसा, संगठन और मनोबल की धुरी थी. इसी के बल पर महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना का बोलबाला रहा है. लेकिन आज वही BMC शिवसेना के हाथ से निकल चुकी है. उद्धव ठाकरे ने अपनी भूल से सीख नहीं ली. उनका गुनाह इतना बढ़ गया कि इस बार उन्होंने कैसे दोनों हाथों से बीएमसी की सत्ता बीजेपी के हाथों में सौंप दी, का पता भी नहीं चला. यही वजह है कि महायुति यानी बीजेपी, शिवसेना और एनसीपी अजीत के नेता और कार्यकर्ता आज मुंबई में जश्न मना रहे हैं. इसके उलट शिवसेना यूबीटी के नेता अपने समर्थकों के साथ 'मातोश्री' में दुबके हुए हैं.
बीएमसी का परिणाम आने के बाद सवाल सीधा है, क्या यह सत्ता छीन ली गई या खुद उद्धव ठाकरे ने अपनी गलतियों की वजह से बीजेपी को सौंप दी?
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर उद्धव ठाकरे कुछ बुनियादी गलतियां न करते, तो आज तस्वीर बिल्कुल अलग होती. उद्धव ठाकरे से कहां-कहां हुई रणनीतिक चूक, किन फैसलों ने बाला साहब ठाकरे के राजनीतिक किले को उन्होंने कमजोर किया और आखिर किसे जिम्मेदार माना जाए, पढ़ें पूरी कहानी.
कब से कब तक BMC पर शिवसेना का कब्जा रहा?
1997: पहली बार शिवसेना-बीजेपी गठबंधन ने BMC जीती. उसके बाद 2002, 2007, 2012 लगातार शिवसेना बीएमसी की सत्ता में रही. साल 2017 बीजेपी से अलग होकर शिवसेना सबसे बड़ी पार्टी बनी. 2022 में कार्यकाल खत्म, कोविड की वजह से प्रशासक राज लागू हो गया. उसके बाद भी बीएमसी पर उसी का कब्जा रहा. यानी लगातार 28 साल से शिवसेना बीएमसी पर काबिज थी.
उद्धव ठाकरे की महाराष्ट्र राजनीति को समझने की 10 बड़ी गलतियां :
1. बीजेपी से अलग होना वैचारिक था, लेकिन ग्राउंड पर संगठन को तैयार नहीं किया गया.
2. BMC चुनाव टालने को शिवसेना की रणनीति मान लेना. प्रशासक राज ने शिवसेना की जमीनी पकड़ कमजोर कर दी.
3. बाला साहब के न रहने के बाद से शिवसेना में नगरसेवक, शाखा प्रमुख और स्थानीय नेता हाशिए पर चले गए.
4. उद्धव ठाकरे ने पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस-NCP पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता बढ़ा ली थी. मुंबई में यह गठबंधन कभी भावनात्मक समर्थन नहीं जुटा पाया.
5. बाला साहब के हिंदुत्व से उद्धव ठाकरे भटक गए. बाला साहब हिंदुत्व को पार्टी की रणनीति नहीं, बल्कि पहचान मानते थे. जबकि उद्धव ने उसे रणनीति मान लिया. परिणाम यह हुआ कि न सॉफ्ट हिंदुत्व साफ दिखा, न आक्रामक तेवर. नतीजा यह निकला कि शिवसेना का वोटर कन्फ्यूज हो गया.
6. उद्धव ठाकरे ने राज ठाकरे से पूरी तरह से दूरी बनाए रखा. मराठी वोट बैंक बंटा, फायदा सीधे बीजेपी-शिंदे खेमे को मिला.
7. शिवसेना नेतृत्व का केंद्रीकरण कर दिया. फैसले चुनिंदा लोगों तक सीमित रहे, संगठन ठहर गया.
8. उद्धव ठाकरे ने शिंदे की बगावत को हल्के में लिया. समय रहते संवाद होता, तो इतनी बड़ी टूट नहीं होती.
9. BMC फंड और प्रोजेक्ट्स पर शिवसेना की नैरेटिव हार गई. बीजेपी ने बीएमसी में भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया और उसे भुना लिया. शिवसेना यूबीटी पलटवार भी नहीं कर पाई.
10. शिवसेना यूबीटी ने बाला साहब की आक्रामक राजनीति से दूरी बना ली. ठाकरे ब्रांड की धार धीरे-धीरे कुंद होती चली गई.
कुल मिलाकर, इस बार BMC सिर्फ चुनाव नहीं था, शिवसेना की पहचान दांव पर थी. ताज्जुब की बात यह है कि इस बार दोनों भाई एक नाव में सवाल थे, और वो डूब गई. अगर उद्धव ठाकरे ने समय रहते संगठन, हिंदुत्व और मराठी अस्मिता, तीनों को संतुलित किया होता, तो आज महायुति जश्न नहीं मना रही होती.
शिवसेना क्यों हुई मुंबई में अलोकप्रिय?
- 2005 से 2010 के दौरान सड़कों की खराब हालत, मानसून में जलभराव और ठेकेदार लॉबी पर सवाल उठे थे.
- 2011 से 2014 के दौरान आदर्श सोसाइटी घोटाले की छाया और झुग्गी पुनर्विकास पर लोगों में असंतोष.
- 2015 से 2017 तक मुंबई की जीवनरेखा लोकल ट्रेन हादसे और सफाई व्यवस्था पर जनता का गुस्सा.
- 2018 से 2020 के दौरान मुंबई में गड्ढों पर राजनीति और स्मार्ट सिटी नैरेटिव में शिवसेना का पिछड़ना.
- 2020 से 2022 तक कोविड प्रबंधन को लेकर लोगों की मिली-जुली राय. प्रशासक राज की तैयारी न होना.
बालासाहब ठाकरे का किला क्यों ढहा?
बाला साहब का बीएमसी किला शिवसेना ने संगठन का कमजोर पड़ने और लोगों से भावनात्मक जुड़ाव न होने की वजह से खत्म हो गया. शिवसेना ने आक्रामकता की जगह रक्षात्मक राजनीति ने भी अहम भूमिका निभाई. मुंबई का मराठी अस्मिता मॉडल का मतदाताओं के एक बड़े समूह ने बदला लिया.