किस्से नेताओं के : सूती साड़ी, चप्पल और सादगी स्टाइल स्टेटमेंट नहीं, ‘दीदी’ की CM बनने की है अनकही कहानी
सूती साड़ी, चप्पल और सादगी के पीछे छिपी ममता बनर्जी की संघर्षभरी कहानी. कैसे एक साधारण परिवार से निकलकर वे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनीं और भारतीय राजनीति में “दीदी” के नाम से अपनी अलग पहचान बनाई. यह कहानी हौसले और संघर्ष की मिसाल है.
कोलकाता की उस धरती पर, जिसे साहित्य और संस्कृति की भूमि कहा जाता है और जहां नोबेल पुरस्कार विजेता Rabindranath Tagore ने शिक्षा और विचारों की नई दिशा दी, वहीं से एक साधारण लेकिन संघर्षशील कहानी शुरू होती है. इस क्षेत्र को बंगाल की लोक भाषा में “लाल माटीर देश” यानी लाल मिट्टी की भूमि (बीरभूम) कहा जाता है, जो अपनी सादगी और जड़ों से जुड़ाव के लिए जाना जाता है. इसी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) की जीवन यात्रा आकार ली थी.
शुतापा पॉल की पुस्तक 'Didi: The Untold Mamata Banerjee' ममता की संघर्षभरी कहानी का डिटेल में जिक्र है. बुक में उनके गरीबी से निकलकर राजनीति तक का सफर, और उनका सिम्पल लाइफ स्टाइल से जमीनी नेता की छवि का विस्तार से जिक्र है.ममता बनर्जी का जन्म 5 जनवरी 1955 को बीरभूम के रामपूरहाट एक तहसील के कुसुम्बा गांव में हुई थी, फिर वो पिता प्रोमिश्वर बनर्जी के साथ लकाता शिफ्ट हो गईं. वह दक्षिण कोलकाता के कालीघाट इलाके में रहने लगीं.
पिता की मौत ने ममता के जीवन को कैसे बदल दिया?
बुक Didi: The Untold Mamata Banerjee के मुताबिक लगभग 17 साल की अवस्था में, 9 फरवरी 1972 को उनके पिता का निधन ने उनके जीवन को पूरी तरह बदल दिया. इस घटना के बाद घर की जिम्मेदारी अचानक उनके कंधों पर आ गई और यहीं से उनके संघर्ष की असली शुरुआत हुई. यह घटना सिर्फ एक पारिवारिक दुख नहीं था, बल्कि एक ऐसा झटका था, जिसने पूरे घर की दुनिया बदल दी. आर्थिक तंगी बढ़ गई और भावनात्मक सहारा भी टूट गया. किशोर उम्र में ही उनके कंधों पर पूरे घर की जिम्मेदारी आ गई.
आर्थिक तंगी और जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने पढ़ाई कैसे पूरी की?
पुस्तक के लेखक शुतापा पॉल के अनुसार बावजूद इसके ममता बनर्जी ने देशबंधु शिशु शिक्षालय से स्कूली शिक्षा पूरी की और आगे की पढ़ाई जोगमाया देवी कॉलेज से स्नातक के रूप में की. इसके बाद उन्होंने श्री शिक्षायतन कॉलेज से शिक्षा में स्नातक डिग्री प्राप्त की. इसके साथ ही जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज से कानून की पढ़ाई भी पूरी की.
कोलकाता विश्वविद्यालय से इस्लामिक हिस्ट्री में एमए किया. उनकी शैक्षणिक यात्रा यह दिखाती है कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने पढ़ाई और जिम्मेदारियों दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ना जारी रखा. इतना ही नहीं, वह कॉलेज में छात्र संगठनों और सियासी दलों से जुड़ गईं थी. कॉलेज में अध्ययन के दौरान पर ही वह हर मसले पर अलग राय रखती थी, सही राय न माने जाने पर पूरे यूनिवर्सिटी को हिलाकर रख देती थी.
काली मंदिर ने उनके व्यक्तित्व को कैसे प्रभावित किया?
ममता का स्कूली लाइफ से ही झुकाव धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं की ओर भी रहा. वे कालीघाट स्थित काली मंदिर की भक्त मानी जाती हैं और कहा जाता है कि स्कूल के दिनों में वे काली पूजा के आयोजन में भी सक्रिय रूप से भाग लेती थीं. एक बार वह काली पूजा के लिए मूर्ति ले आईं, घर में जगह न होने के कारण मां गायत्री देवी ने उन्हें मां काली की मूर्ति को 16 रुपये में बेचने पर बाउंड किया था. इसके बावजूद वह काली की भक्त बनीं रहीं. इसका असर उनके चुनाव प्रचार में भी दिखता है. एक बार उन्होंने सियासी मंच से ही दुर्गा और काली में मंत्र जाप कर बीजेपी के हिंदू राष्ट्रवाद का जवाब दिया था. साथ ही रौद्र रूप में आकर नसीहत दी थी कि बीजेपी हमें हिंदू धर्म की परंपराओं की सीख न दे.
क्या गुरु के प्रति सम्मान ने उनके व्यक्तित्व को और मजबूत बनाया?
इसी दौर से उनके जीवन से जुड़े कई ऐसे किस्से भी सामने आते हैं, जो उनके शिक्षक जीवन और अनुशासन को दर्शाते हैं. कहा जाता है कि नौवीं कक्षा में उन्होंने अपनी एक शिक्षिका सती देवी को समर्पित कविता लिखी थी. यह उनके भावनात्मक और संवेदनशील स्वभाव का शुरुआती उदाहरण माना जाता है. उनकी शिक्षिका सती देवी को लेकर यह भी उल्लेख मिलता है. सती देवी के जीवन से जुड़ा एक और प्रसंग भी अक्सर चर्चा में आता है, जिसमें उनके घर के एक किराएदार विवाद के दौरान कानूनी स्थिति बनी और बाद में वह मामला राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर तक भी पहुंचा. इसकी जानकारी ममता बनर्जी को भी मिली. उन्होंने तत्काल टीएमसी कार्यकर्ता से सती का घर रातोंरात खाली करा दिया. इसकी भनक घर खाली होने के बाद सती को लगी तो अपनी छात्रा की इस जिंदादिली पर वह खुशी झूम उठीं. यह घटना में उनके और उनकी पूर्व छात्रा के बीच सम्मान और रिश्तों की जटिलता भी दिखाई देती है.
क्या अनुशासित छात्रा और जिम्मेदार क्लास मॉनिटर थीं?
इसके अलावा, कई अन्य शिक्षकों ने भी ममता बनर्जी को उनके स्कूल जीवन में एक अनुशासित और जिम्मेदार छात्रा के रूप में याद किया है. कहा जाता है कि वे कक्षा में अनुशासन बनाए रखने वाली, शांत स्वभाव की और जिम्मेदारी समझने वाली छात्रा थीं. एक पूर्व शिक्षिका नमिता चक्रवर्ती ने उन्हें एक ऐसी क्लास मॉनिटर के रूप में याद किया जो यह सुनिश्चित करती थीं कि शिक्षक की अनुपस्थिति में भी कक्षा अनुशासित रहे.
जब थीं केंद्रीय मंत्री, बीच सड़क गुरु को देख क्यों पांव पर गिर पड़ीं?
एक और प्रसंग में, बताया गया है कि ममता जब त्रकेंद्र सरकार में मंत्री थीं, तो कोलकाता में एक रिटायर्ड शिक्षिका कृष्णा मुखर्जी को उन्होंने सउ़क पर जाते हुए देखा. वह अपनी गाड़ी से उतरीं और सड़क पर सबके सामने अपने गुरु के पैर छुए, जो उनके अपने शिक्षकों के प्रति गहरे सम्मान को दर्शाता है.
सादा जीवन - स्टाइल स्टेमेंट नहीं, मजबूरी कैसे?
ममता की टीचर नमिता का कहना है कि दीदी का सूती साड़ी पहनना, साधारण चप्पल में हमेशा घूमना और बेहद कम खर्च में जीवन जीने की शैली कोई फैशन स्टेटमेंट नहीं बल्कि उनके जीवन की परिस्थितियों से उपजी मजबूरी और सादगी का प्रतीक है, जो उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा है. यह सादगी उस संघर्ष की याद दिलाती है, जिसमें एक साधारण पृष्ठभूमि से निकली लड़की ने जिम्मेदारियों, कठिनाइयों और सामाजिक संघर्षों के बीच खुद को मजबूत बनाकर आगे बढ़ाया और एक प्रभावशाली नेतृत्व के रूप में स्थापित हुई. यही सादगी आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक और व्यक्तिगत पहचान बन गई.
संघर्ष ने सपनों को तोड़ा या बनाया?
कठिन हालातों के बावजूद मतता बनर्जी पढ़ाई नहीं छोड़ी. हर दिन उनके लिए एक नई चुनौती जैसा था. कभी पैसों की कमी, तो कभी सामाजिक दबाव. लेकिन इन परिस्थितियों ने उनके अंदर एक मजबूत जिद पैदा की कि हालात चाहे जैसे भी हों, आगे बढ़ना ही है. यही जिद उनके जीवन की दिशा बदलती गई. यह सफर दिखाता है कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने शिक्षा और आत्मनिर्भरता दोनों को साथ-साथ आगे बढ़ाया.
ममता बनर्जी को “जायंट किलर” क्यों कहा जाने लगा?
युवावस्था में उन्हें एहसास हुआ कि केवल व्यक्तिगत संघर्ष पर्याप्त नहीं है. समाज की समस्याओं को बदलने के लिए बड़े मंच की जरूरत होती है. यहीं से उन्होंने राजनीति में कदम रखा और कांग्रेस से जुड़कर अपनी नई यात्रा शुरू की. धीरे-धीरे सड़क की लड़ाई, आंदोलन और जनसंघर्ष उनकी पहचान बनने लगे.
राजनीति में आने के बाद उन्होंने कई दिग्गज नेताओं को चुनौती दी. कई बार वे मजबूत राजनीतिक ताकतों के सामने “अंडरडॉग” थीं, फिर भी उन्होंने जीत हासिल की. इन जीतों ने उन्हें सिर्फ एक नेता नहीं बनाया, बल्कि जनता के भरोसे की आवाज बना दिया. इसी कारण उन्हें “जायंट किलर” कहा जाने लगा.
उनके राजनीतिक जीवन में उतार-चढ़ाव भी आए. एक समय ऐसा भी आया जब उन पर हमला हुआ और वे गंभीर रूप से घायल हो गईं. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. चोट और दर्द के बाद भी वे फिर से खड़ी हुईं और पहले से ज्यादा मजबूत होकर राजनीति में लौटीं.
क्या ‘दीदी’ नेता बनने की नहीं, संघर्षशील जीवन की मिसाल है?
साल 2011 में उन्होंने पश्चिम बंगाल की राजनीति का इतिहास बदल दिया. दशकों से चली आ रही सत्ता को चुनौती देकर उन्होंने जनता का भरोसा जीता. इसके बाद उन्हें “बंगाल टाइगर” और “माटी-मानुष की नेता” जैसी पहचान मिली. फिर क्या तो वो पश्चिम बंगाल की सीएम बन गईं. कुसुम्बा गांव से शुरू होकर कालीघाट की गलियों, कॉलेज की पढ़ाई और फिर राजनीति के बड़े मंच तक की यह यात्रा सिर्फ एक नेता की कहानी नहीं है, बल्कि संघर्ष, जिम्मेदारी और आत्मनिर्भरता की एक लंबी गाथा है.
इतना ही नहीं, पिता के जाने के बाद जो खालीपन आया, उसी ने उन्हें मजबूत बनाया और एक साधारण लड़की को असाधारण नेतृत्व में बदल दिया. यहां पर इस बात का भी जिक्र कर दें कि उनके पिता स्वतंत्रता सेनानी थे और कांग्रेस से जुड़े थे. उन्होंने अपनी कार और दफ्तर व एक अन्य वाहन कांग्रेस की गतिविधियों के लिए गिफ्ट कर दिए थे. यही वजह है कि राजनीति में सबसे पहले ममता कांग्रेस से जुड़ीं.