Sabarimala Case: सुनवाई के तीसरे दिन केंद्र सरकार ने 2018 के फैसले पर उठाए सवाल, 10 पॉइंट्स में समझें पूरी ABCD
सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर जारी विवाद ने एक बार फिर राष्ट्रीय बहस को तेज कर दिया है. गुरुवार को तीसरे दिन सुप्रीम कोर्ट में इस संवेदनशील मुद्दे पर अहम सुनवाई हुई.
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(Image Source: ANI )Sabarimala Temple Case: केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर जारी विवाद ने एक बार फिर राष्ट्रीय बहस को तेज कर दिया है. गुरुवार को तीसरे दिन सुप्रीम कोर्ट में इस संवेदनशील मुद्दे पर अहम सुनवाई हुई, जिसमें केंद्र सरकार ने 2018 के ऐतिहासिक फैसले पर गंभीर सवाल उठाए.
9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ इस मुद्दे पर गहराई से विचार कर रही है, जिससे आने वाला फैसला देशभर में धार्मिक प्रथाओं की दिशा तय कर सकता है. यह मामला अब केवल एक मंदिर या परंपरा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह धार्मिक स्वतंत्रता, लैंगिक समानता और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन का प्रतीक बन चुका है.
क्या-क्या है सरकार और कोर्ट का तर्क?
1. के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में स्पष्ट किया कि यह मुद्दा किसी एक लिंग के पक्ष या विरोध का नहीं है.
2. उन्होंने कहा कि 2018 का फैसला इस धारणा पर आधारित था कि पुरुष श्रेष्ठ हैं और महिलाओं को निचले स्तर पर रखा गया, जो कि इस मामले की सही व्याख्या नहीं है.
3. 9 जजों की पीठ यह पीठ केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह तय करेगी कि धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश, धार्मिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए.
4. केंद्र सरकार ने अपनी दलील में यह भी बताया कि भारत में कई ऐसे धार्मिक स्थल हैं, जहां पुरुषों या महिलाओं के प्रवेश को लेकर विशेष नियम हैं.
5. सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल K. M. Nataraj ने संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या करते हुए महत्वपूर्ण तर्क रखे. उन्होंने कहा कि इन अनुच्छेदों के तहत धार्मिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए तीन-स्तरीय तंत्र मौजूद है.
6. न्यायमूर्ति J. Nagarathna ने अनुच्छेद 25(2) के पहले भाग को लेकर सवाल उठाया कि “इस अनुच्छेद में कुछ भी मौजूदा कानूनों को प्रभावित नहीं करेगा” का क्या अर्थ है?
7. नटराज ने जवाब देते हुए कहा कि इसका संबंध पूर्व-संवैधानिक कानूनों से है. उन्होंने कहा “यदि ये कानून मौलिक अधिकारों के अनुरूप हैं, तो उन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए. हम अनुच्छेद 25 और 26 को भाग III से अलग करके नहीं पढ़ सकते.”
8. सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट पांच जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से फैसला सुनाया था. इस फैसले में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के साबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को असंवैधानिक करार दिया गया था.
9. 2019 में इस मामले को बड़ी संविधान पीठ को सौंप दिया गया, ताकि धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार जैसे व्यापक सवालों पर अंतिम निर्णय लिया जा सके.
10. अब पूरे देश की नजर इस ऐतिहासिक मामले पर टिकी हुई है. आने वाला फैसला न केवल सबरीमाला मंदिर, बल्कि देशभर के धार्मिक स्थलों की परंपराओं और नियमों को प्रभावित कर सकता है.