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केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर क्यों विवाद, सुप्रीम कोर्ट से लेकर सरकारों तक का क्या है पक्ष

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक धार्मिक आस्था और परंपरा से जुड़ी है, न कि भेदभाव से. सरकार ने कोर्ट से आग्रह किया कि इस मामले को न्यायिक समीक्षा से बाहर रखा जाए और परंपरा को बरकरार रखा जाए.

सबरीमाला विवाद पर कोर्ट का फैसला
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सबरीमाला विवाद पर कोर्ट का फैसला
रूपाली राय
Edited By: रूपाली राय6 Mins Read

Updated on: 7 April 2026 2:20 PM IST

Instagram: sabarimala_ayyappan_official

7 अप्रैल 2026, मंगलवार को केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर को लेकर केंद्र सरकार ने आज सुप्रीम कोर्ट में अपनी राय रखी. सरकार ने स्पष्ट कहा कि मंदिर में कौन पूजा कर सकता है, यह लिंग भेदभाव का मुद्दा नहीं है. बल्कि यह पूरी तरह धार्मिक रीति-रिवाजों, आस्था और भगवान अय्यप्पा के विशेष स्वरूप पर आधारित है. सरकार ने लिखित हलफनामे में बताया कि सबरीमाला में 10 से 50 वर्ष की उम्र वाली महिलाओं पर लगा प्रवेश प्रतिबंध किसी अपवित्रता या महिलाओं को हीन समझने की भावना से नहीं लगाया गया है. यह प्रतिबंध सिर्फ इसलिए है क्योंकि भगवान अय्यप्पा नैष्ठिक ब्रह्मचारी (शाश्वत ब्रह्मचारी) के रूप में पूजे जाते हैं.

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का तर्ककेंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट से कहा, 'महिलाओं को प्रवेश की अनुमति देने से सबरीमाला की पूजा-पद्धति का मूल स्वरूप ही बदल जाएगा. इससे संविधान द्वारा संरक्षित धार्मिक बहुलवाद कमजोर हो जाएगा.' उन्होंने आगे कहा कि सदियों से पुरुष और महिला श्रद्धालु दोनों ही मंदिर की स्थापित परंपराओं के अनुसार भगवान अय्यप्पा की पूजा करते आ रहे हैं. अगर इस परंपरा को तोड़ा गया तो धार्मिक आस्था की रक्षा करने वाला संवैधानिक प्रावधान (अनुच्छेद 25) प्रभावित होगा.

सरकार का मुख्य आग्रह

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि सबरीमाला मंदिर में 10-50 वर्ष की महिलाओं पर लगा प्रवेश प्रतिबंध बरकरार रखा जाए. यह मुद्दा पूरी तरह धार्मिक आस्था और धार्मिक संप्रदाय की स्वायत्तता के दायरे में आता है. इसलिए इसे न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर रखा जाए. सरकार ने पीठ को चेतावनी दी कि अदालत को किसी भी धार्मिक प्रथा की समीक्षा करते समय 'तार्किकता', 'आधुनिकता' या 'वैज्ञानिक औचित्य' जैसे मापदंड नहीं अपनाने चाहिए.

सबरीमाला मंदिर क्या है?

सबरीमाला मंदिर केरल के पथानामथिट्टा जिले में पश्चिमी घाट की पहाड़ियों में समुद्र तल से करीब 914 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. यह भगवान अय्यप्पा (जिन्हें मणिकांत स्वामी भी कहते हैं) को समर्पित है. भगवान अय्यप्पा को ब्रह्मचारी देवता माना जाता है. वे सांसारिक सुखों से दूर रहने और शुद्धता के प्रतीक हैं. पौराणिक कथा के अनुसार वे भगवान शिव और मोहिनी (भगवान विष्णु का रूप) के पुत्र हैं. मंदिर का नाम सबरी नाम की एक आदिवासी महिला से पड़ा है, जो रामायण में भगवान राम की भक्त थीं. इसलिए इसे 'सबरी की पहाड़ी' कहा जाता है. यह मंदिर इसलिए खास है क्योंकि यहां सभी जाति और धर्म के लोग आ सकते हैं, लेकिन तीर्थयात्रा करने से पहले 41 दिनों का कठिन व्रत रखना जरूरी होता है. मंदिर की खास बात यह भी है कि यहां मुस्लिम समुदाय का भी सम्मान है. मंदिर के नीचे वावर नाम के एक मुस्लिम संत को समर्पित मस्जिद है. तीर्थयात्री पहले वावर की मस्जिद में और फिर अय्यप्पा मंदिर में पूजा करते हैं.

महिलाओं पर प्रतिबंध क्यों?

सबरीमाला में 10 से 50 साल की उम्र वाली महिलाओं (यानी प्रजनन आयु वाली महिलाओं) का प्रवेश लंबे समय से वर्जित रहा है. इस प्रतिबंध की जड़ भगवान अय्यप्पा की नैष्ठिक ब्रह्मचर्या (शाश्वत ब्रह्मचारी होने) में मानी जाती है. मान्यता है कि महिलाओं के आने से देवता की शुद्धता और ब्रह्मचर्य भंग हो सकती है. यह प्रथा कम से कम 200 साल पुरानी बताई जाती है. 1816-1820 के ब्रिटिश सर्वेक्षण में भी इसका जिक्र है कि 'यौवन प्राप्त' महिलाओं को मंदिर में जाने की इजाजत नहीं थी.

2006 का अशुभ संकेत

2006 में त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (जो मंदिर का प्रबंधन करता है) को लगा कि भगवान अय्यप्पा नाराज हैं. मंदिर में कुछ अनुष्ठान ठीक से नहीं हो रहे थे और कुछ अपशकुन भी हुए थे. बोर्ड ने पुरानी परंपरा के अनुसार अष्टमंगल देवप्रसनम नाम की ज्योतिषीय प्रक्रिया करवाई. ज्योतिषी ने बताया कि एक महिला ने मंदिर परिसर में प्रवेश कर लिया था, जिससे देवता अप्रसन्न हैं. बाद में पता चला कि कर्नाटक की एक्ट्रेस जयमाला ने 1987 में भीड़ में धक्का लगने से अनजाने में मंदिर की मूर्ति को छू लिया था. उन्होंने 18 साल बाद अपना कबूलनामा भेजा. इस घटना ने पूरे मामले को फिर से गरमा दिया.

कानूनी लड़ाई की शुरुआत

2006 में ही इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की. उन्होंने कहा कि महिलाओं पर यह प्रतिबंध समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) का उल्लंघन है और इसे हटाया जाना चाहिए. 28 सितंबर 2018 को पांच न्यायाधीशों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से फैसला सुनाया कि महिलाओं पर प्रतिबंध गलत है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़, नरीमन और खानविलकर ने कहा कि जैविक कारण (माहवारी) से किसी महिला के पूजा करने के अधिकार को नहीं रोका जा सकता. केवल न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ने असहमति जताई और कहा कि अदालत को धार्मिक आस्था में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए.

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