दर्द, खौफ और परंपरा- क्या होती है महिला खतना और कब लगेगा इसपर पूर्ण विराम? SC पर टिकी नजरें
भारत के बोहरा समाज के कुछ तबकों में आज भी महिला खतना की जाती है. जिस पर आज सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है. आखिर ये प्रथा क्या होती है? आइये जानते हैं पूरी डिटेल
Women Circumcision: मुस्लिम दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं के खतना का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है. साल 2017 में इस प्रथा के खिलाफ एडवोकेट सुनीता तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. अब कोर्ट को यह तय करना है कि क्या यह प्रथा महिलाओं और बच्चियों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है.
सबसे बड़ा सवाल है कि न कुरान और न ही शरिया में इस प्रथा का जिक्र आता है, फिर ये प्रथा अभी तक कैसे चल रही है. इसके खिलाफ लंबे वक्त से आवाज़ उठती आई है और इसे महिलओं के शोषण के तौर पर भी देखा जाता है.
क्या होती है महिलाओं की खतना?
इस प्रोसेस में महिलाओं के गुप्तांग के एक हिस्से जिसे क्लीटोरिस कहा जाता है, उसे काट दिया जाता है, इस प्रक्रिया में महिलाओं को काफी दर्द होता है. खतना को ‘खफ्ज’ या फीमेल जेनाइटल म्यूटिलेशन (एफजीएम) कहा जाता है, यह मुद्दा केवल कानूनी बहस तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े कई व्यक्तिगत अनुभव भी सामने आए हैं. संयुक्त राष्ट्र इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन मानता है.
कब और कैसे की जाती है ये प्रक्रिया?
यह प्रक्रिया आमतौर पर छह से सात साल की उम्र में, यानी किशोरावस्था से पहले ही कर दी जाती है. इसके कई तरीके होते हैं, जैसे क्लिटरिस के बाहरी हिस्से में कट लगाना या उसकी त्वचा को हटाना. इस दौरान एनेस्थीसिया का इस्तेमाल नहीं किया जाता, जिससे बच्चियां पूरी तरह होश में रहते हुए दर्द सहती हैं.
पारंपरिक रूप से इस प्रक्रिया में ब्लेड या चाकू का इस्तेमाल किया जाता है. इसके बाद दर्द कम करने के लिए हल्दी, गर्म पानी या सामान्य मरहम का उपयोग किया जाता है.
महिलाओं ने शेयर किया अपना एक्सपीरियंस
बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, पुणे में रहने वाली निशरीन सैफ ने अपने बचपन के अनुभव को साझा करते हुए बताया कि जब वह करीब सात साल की थीं, तब उनका खतना किया गया. उन्हें उस घटना की धुंधली याद है, लेकिन उसका दर्द आज भी उनके मन में है.
निशरीन के मुताबिक, उनकी मां उन्हें एक छोटे से कमरे में ले गईं, जहां एक महिला पहले से मौजूद थी. वहां उन्हें लिटाकर उनकी पैंटी उतारी गई और प्रक्रिया की गई. उन्होंने बताया कि उस समय हल्का दर्द महसूस हुआ, जैसे सुई चुभ रही हो, लेकिन असली दर्द बाद में शुरू हुआ. कई दिनों तक उन्हें पेशाब करने में गंभीर तकलीफ होती रही और वह दर्द से रो पड़ती थीं.
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किन समुदायों में है इस प्रथा का चलन?
आमतौर पर खतना पुरुषों के साथ जोड़ा जाता है, लेकिन दुनिया के कई देशों में महिलाओं को भी इस प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. भारत भी उनमें शामिल है, जहां यह प्रथा मुख्य रूप से बोहरा मुस्लिम समुदाय, खासकर दाऊदी बोहरा और सुलेमानी बोहरा में प्रचलित है.
भारत में कितनी है बोहरा समुदाय की आबादी?
भारत में बोहरा समुदाय की आबादी गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में फैली हुई है. करीब 10 लाख से अधिक आबादी वाला यह समुदाय आर्थिक रूप से मजबूत और शिक्षित माना जाता है. निशरीन सैफ भी इसी समुदाय से आती हैं, और यही कारण था कि बचपन में उनका खतना कराया गया.
यूएन ने इस मुद्दे पर क्या कहा था?
दिसंबर 2012 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक प्रस्ताव पारित कर दुनिया भर में इस प्रथा को खत्म करने का संकल्प लिया था. इसी दिशा में जागरूकता बढ़ाने के लिए हर साल 6 फरवरी को इंटरनेशनल डे ऑफ जीरो टॉलरेंस फॉर एफजीएम मनाया जाता है.
बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक बोहरा समुदाय से जुड़ी इंसिया दरीवाला के अनुसार, क्लिटरिस को समुदाय में ‘हराम की बोटी’ कहा जाता है. ऐसा माना जाता है कि इसे हटाने से लड़की की यौन इच्छा कम हो जाती है और वह शादी से पहले यौन संबंध नहीं बनाती.
हालांकि, इस दावे को कई कार्यकर्ता गलत बताते हैं. भारत में एफजीएम के खिलाफ अभियान चलाने वाली मासूमा रानालवी के अनुसार, इन मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है और यह प्रथा महिलाओं के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से नुकसानदायक है. उनका कहना है कि इससे न केवल शारीरिक दर्द होता है, बल्कि मानसिक आघात भी होता है और महिलाओं की यौन जिंदगी पर भी नकारात्मक असर पड़ता है.




