Assembly Elections 2026: RSS की ‘मैजिकल पॉवर’, चुनावी राज्यों में वोटर ऐसे बन जाते हैं वोट बैंक?
विधानसभा चुनाव 2026 में आरएसएस का ग्राउंड नेटवर्क और कैडर सिस्टम कैसे चुनाव राज्यों में मतदाता व्यवहार को प्रभावित करता है. असम, केरल और पुडुचेरी जैसे राज्यों में इसका अलग प्रभाव देखा जाता है.
असम, केरल और केद्रशासित प्रदेश पुद्दूचेरी में आज शाम विधानसभा का चुनाव प्रचार समाप्त हो जाएगा. 9 अप्रैल को मतदान होगा. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की भूमिका चुनाव वाले राज्यों में अलग-अलग स्वरूप में दिखाई देती है. यह संगठन सीधे चुनाव नहीं लड़ता, लेकिन जमीनी नेटवर्क, कैडर निर्माण और राजनीतिक नैरेटिव सेट करने में इसकी गहरी भूमिका निभाती है. इसी वजह से इसे कई बार “invisible election engine” भी कहा जाता है. जानें, आरएसए, चुनाव में बीजेपी के पक्ष में अंडरग्राउंड तरीके से काम कैसे करता है.
1. RSS चुनाव में क्या करता है?
आरएसएस (RSS) का मूल काम संगठन निर्माण और सामाजिक जुड़ाव है, लेकिन चुनावों के समय यह पर्दे के पीछे से सियासी भागीदारी में भी सक्रिय नजर आता है. बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं का नेटवर्क, पन्ना प्रमुख जैसी माइक्रो व्यवस्था और घर-घर संपर्क अभियान, इसके प्रमुख हथियार हैं. आरएसएस के लोग चुनाव में वोट मांगने से ज्यादा “वोटर को जोड़ने” का काम करते हैं, जिससे अंतिम समय में वोट ट्रांसफर आसान हो जाता है.
2. असम में RSS की भूमिका मजबूत कैसे?
असम में RSS का नेटवर्क वर्षों से सामाजिक और सीमा सुरक्षा मुद्दों से जुड़ा रहा है. यहां भारतीय जनता पार्टी और मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के साथ मिलकर यह संगठन ग्राउंड लेवल पर मजबूत संरचना बनाता है. घुसपैठ, नागरिकता और पहचान जैसे मुद्दों पर RSS का नैरेटिव वोटर माइंडसेट को प्रभावित करता है. सीमावर्ती इलाकों में इसका बूथ नेटवर्क बहुत सक्रिय माना जाता है, जिससे चुनावी मशीनरी मजबूत होती है.
3. केरल में RSS की भूमिका अलग कैसे?
केरल में RSS का इतिहास लंबा है, लेकिन राजनीतिक जमीन अलग है क्योंकि यहां मजबूत वामपंथी परंपरा है. सीपीआई (Marxist) से सीधा टकराव इसकी पहचान बन चुका है. यहां शाखाओं और वैचारिक प्रशिक्षण के जरिए RSS अपनी मौजूदगी बनाए रखता है, लेकिन वोट को सीट में बदलने में सीमित सफलता मिलती है. यानी यहां यह “ideological force” ज्यादा है, चुनावी मशीन कम.
4. पुडुचेरी में RSS की भूमिका सीमित क्यों?
पुडुचेरी छोटा और केंद्रशासित प्रदेश है, जहां क्षेत्रीय दलों का प्रभाव ज्यादा है. RSS यहां बूथ स्तर पर काम करता है, लेकिन इसका नेटवर्क तुलनात्मक रूप से छोटा है. हिंदू वोटों के कंसोलिडेशन और BJP को अप्रत्यक्ष समर्थन देने की भूमिका यहां दिखाई देती है, लेकिन यह निर्णायक शक्ति नहीं बन पाता.
5. क्या RSS वोट दिलाता है या माहौल बनाता है?
आरएसएस किसी भी चुनाव में सीधे चुनाव प्रचार नहीं करता, लेकिन यह “voter mindset shaping” में काम करता है. यानी यह वोटर की प्राथमिकताओं, भावनाओं और मुद्दों की समझ को प्रभावित करता है. जब संगठन और राजनीतिक पार्टी (जैसे BJP) मिलकर काम करते हैं, तो यह प्रभाव वोट ट्रांसफर में बदल सकता है.
6. पन्ना प्रमुख और बूथ मैनेजमेंट कितना असर डालते हैं?
आरएसएस के नेटवर्क में बूथ और पन्ना स्तर की मैपिंग बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है. हर पन्ने पर कुछ कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी होती है, जो वोटरों से व्यक्तिगत संपर्क रखते हैं. यह मॉडल चुनाव के अंतिम चरण में मतदाताओं को बूथ तक पहुंच को मजबूत करता है. यही माइक्रो-मैनेजमेंट कई बार करीबी सीटों पर फर्क डाल देता है.
7. क्या RSS हर राज्य में एक जैसा असर दिखाता है?
संघ का असर पूरी तरह सामाजिक और राजनीतिक जमीन पर निर्भर करता है. असम में यह मजबूत संगठनात्मक शक्ति के रूप में काम करता है, केरल में वैचारिक प्रभाव तक सीमित रहता है, और पुडुचेरी में सहायक भूमिका निभाता है. यानी RSS एक 'फिक्स्ड फॉर्मूला' नहीं बल्कि “अडैप्टिव नेटवर्क सिस्टम ” है.
8. क्यों कहा जाता है Invisible Engine?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को चुनावी राजनीति में एक “invisible engine” इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह सीधे सत्ता की दौड़ में नहीं उतरता, लेकिन जमीनी नेटवर्क और विचारधारा के जरिए चुनावी परिणामों पर असर डालता है. हालांकि, इसका प्रभाव हर राज्य में अलग-अलग होता है—कहीं यह चुनावी ताकत बन जाता है, कहीं सिर्फ वैचारिक उपस्थिति तक सीमित रहता है.
9. क्या संघ की रणनीति आज नहीं, भविष्य पर टिकी है?
केरल के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि यहां पर संघ का असर कई दशकों से है. उसके लक्षण अब यहां की राजनीति भी देखने को मिलता है. आरएसएस की भूमिका बूथ स्तर तक लोगों से सीधा संवाद कर करीबी सियासी संगठनों के पक्ष में वोटिंग के लिए तैयार करना है. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए संघ के प्रचारक और स्वयंसेवक इस बार भी एक्टिव हैं. उन्होंने कहा कि केरल की 140 सीटों में 20 से 25 सीटों पर संघ का असर है. इस बार इंटरनल सर्वे में संकेत मिले हैं कि बीजेपी 3 से पांच सीटों पर चुनाव जीत सकती है. वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी होने की संभावना है.
संघ प्रचारक के मुताबिक, केरल में यूडीएफ बनाम एलडीएफ चुनाव होने से अंतिम समय वोट पोलराइजेशन उन्हीं दोंनों के बीच हो जाता है. इस बार अंतिम समय में हवा कुछ बने, बीजेपी का केरल में ग्राफ बढ़ना तय है. बीजेपी कितनी सीटें जीत पाएगी, ये बात अलग है, लेकिन 2031 का चुनाव उसके लिए निर्णायक साबित होगा. उन्होंने कहा कि संघ का फोकस जनाधार को उस स्तर ले जाना है, जो आगामी चुनाव बड़ी संख्या में सीट दिला दे. साथ ही ये भी बताया कि पांच राज्यों में से असम में संघ की भूमिका सबसे ज्यादा मजबूत होने वाली है.




