Sabarimala Case: जो भक्त नहीं, वो परंपरा को कैसे चुनौती दे? सुप्रीम कोर्ट का केंद्र से सवाल- प्वाइंट्स में समझें

सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से अहम सवाल उठाया कि जो व्यक्ति उस धर्म या परंपरा का अनुयायी (भक्त) नहीं है, वह उस धार्मिक प्रथा को चुनौती कैसे दे सकता है. कोर्ट ने इस मुद्दे पर स्पष्टता मांगी कि ऐसी याचिकाओं की स्वीकार्यता का आधार क्या होना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला विवाद पर सुनवाई के दौरान एक बार फिर धर्म और संविधान के बीच संतुलन को लेकर बड़ी बहस छिड़ गई है. 9 जजों की संविधान पीठ इस मामले में सिर्फ महिलाओं के प्रवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह तय कर रही है कि धार्मिक परंपराओं की सीमा क्या है और न्यायपालिका की भूमिका कितनी हो सकती है.

सुनवाई के दूसरे दिन कोर्ट ने संकेत दिए कि वह यह तय करने का अधिकार रखता है कि कोई प्रथा अंधविश्वास है या नहीं. वहीं केंद्र सरकार की ओर से Tushar Mehta ने तर्क दिया कि ऐसे मामलों में फैसला अदालत नहीं, बल्कि विधायिका को करना चाहिए. इस पर कोर्ट ने साफ किया कि संविधान के दायरे में रहते हुए न्यायपालिका भी इन पहलुओं की जांच कर सकती है.

सबरीमाला विवाद पर कोर्ट ने क्या? 

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह यह तय करने का अधिकार रखता है कि कोई धार्मिक प्रथा अंधविश्वास है या नहीं.
  • Tushar Mehta ने कहा कि 'मान लें कि कोई प्रथा अंधविश्वासपूर्ण है, तब भी यह अदालत का काम नहीं है कि वह उसे अंधविश्वास घोषित करे.'
  • जस्टिस Ahsanuddin Amanullah ने कहा कि 'आगे क्या होना है, यह विधायिका तय करेगी... लेकिन अदालत में यह नहीं कहा जा सकता कि वही अंतिम शब्द है.'
  • केंद्र ने कहा कि 'माननीय न्यायमूर्ति कानून के क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं, धर्म के नहीं.'
  • केंद्र का तर्क 'जो नागालैंड के लिए धार्मिक हो सकता है, वह मेरे लिए अंधविश्वास हो सकता है.'
  • जस्टिस Joymalya Bagchi ने पूछा 'क्या अदालत ‘डॉक्ट्रिन ऑफ अनऑक्यूपाइड फील्ड’ का इस्तेमाल करके रोक नहीं लगा सकती...?
  • केंद्र ने कहा कि कोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है, लेकिन 'स्वास्थ्य, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था” के आधार पर न कि अंधविश्वास बताकर.
  • जस्टिस B V Nagarathna ने कहा कि 'आप किसी दूसरे धर्म के विचारों को लागू करके यह नहीं कह सकते...”
  • 2018 में Supreme Court of India ने महिलाओं के प्रवेश पर रोक को असंवैधानिक बताया था.

मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की अध्यक्षता में 9 जजों की संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है.

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