ओवैसी ने क्यों कहा - लेबनान पर इजरायल के खिलाफ बोले भारत, अक्साई चीन और PoK का जोड़ दिया कनेक्शन
AIMIM प्रमुख ओवैसी के बयान के बाद यह सवाल फिर उठ रहा है कि क्या भारत को पश्चिम एशिया के संघर्षों पर अधिक आक्रामक रुख अपनाना चाहिए? या अपनी पारंपरिक “नॉन-एलाइंड” नीति पर ही कायम रहना चाहिए.
इजरायल और लेबनान के बीच जारी तनाव एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में है. इसी मुद्दे पर AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के बयान ने भारत में नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है. ओवैसी ने जहां इजरायल की लेबनान नीति पर सवाल उठाए, वहीं इस मुद्दे को अक्साई चिन और PoK जैसे भारत के भू-राजनीतिक दावों से जोड़ते हुए सरकार की विदेश नीति पर भी टिप्पणी की है. उनके बयान के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है कि क्या भारत को इस संघर्ष पर खुलकर रुख अपनाना चाहिए या अपनी पारंपरिक संतुलित नीति पर कायम रहना चाहिए.
सुरक्षा मसला 3 घंटे का मजाक नहीं
AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी कहते हैं, "देश की विदेश नीति और आंतरिक सुरक्षा कोई तीन घंटे का मजाक नहीं है. अगर कोई इसे हल्के में ले रहा है, तो यह सही नहीं है." पड़ोसी देश पाकिस्तान का जिक्र करते हुए कहा ते वह एक नाकाम देश है, जो भूमिका निभा रहा है, उसे हमें ही संभालना चाहिए था. अब सीजफायर हो गया है, जिससे बेगुनाह लोगों की मौतें कम होंगी, लेकिन अभी भी समय है. हम BJP सरकार से आग्रह करेंगे कि वह लेबनान में भी सीजफायर के लिए जार दे.
उन्होंने आगे कहा कि सरका और बीजेपी को इस मसले पर BJP खुलकर बोलना चाहिए और कहना चाहिए कि इजरायल लेबनान में जो कर रहा है, वह गलत है. उसने लेबनान के 20 प्रतिशत इलाके पर कब्जा कर लिया है. अगर हम इस पर चुप रहते हैं, तो हम अक्साई चिन और PoK वापस कैसे लेंगे? यह कुछ ऐसा है जिसके बारे में हमें सोचने की जरूरत है.
लेबनान पर हमले को लेकर नेतन्याहू का स्टैंड क्या?
इजरायल और लेबनान के बीच तनाव की सबसे बड़ी वजह दक्षिणी लेबनान में सक्रिय समूह हिजबुल्लाह को माना जाता है. इजरायल का कहना है कि वह अपनी उत्तरी सीमा और नागरिकों की सुरक्षा के लिए कार्रवाई करता है, क्योंकि हिजबुल्लाह की ओर से रॉकेट और ड्रोन हमले लगातार होते रहे हैं. इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का रुख साफ रहा है कि जब तक सीमा पर सुरक्षा खतरा खत्म नहीं होता, तब तक सैन्य दबाव और जवाबी कार्रवाई जारी रह सकती है.
इजरायल सरकार इसे “डिफेंसिव एक्शन” यानी आत्मरक्षा बताती है. उसका दावा है कि लेबनान सरकार अपने क्षेत्र में हिजबुल्लाह को पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर पा रही है, इसलिए यह कार्रवाई जरूरी हो जाती है. वहीं, इजरायल यह भी कहता है कि वह नागरिकों को नुकसान कम से कम करने की कोशिश करता है, हालांकि जमीनी हालात में नुकसान और तनाव दोनों बढ़ते रहते हैं. इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस संघर्ष को लेकर लगातार चिंता बनी रहती है और कई देश संयम और सीजफायर की अपील करते हैं.
लेबनान का स्टैंड इस विवाद पर क्या?
लेबनान की सरकार और वहां के राजनीतिक वर्ग का कहना है कि इजरायल उसकी संप्रभुता का उल्लंघन कर रहा है. लेबनान का आरोप है कि इजरायल बार-बार उसकी सीमा और कुछ क्षेत्रों में सैन्य कार्रवाई करके नागरिक इलाकों को प्रभावित करता है. लेबनान इस पूरे संघर्ष को अपनी जमीन पर बाहरी आक्रमण के रूप में देखता है और संयुक्त राष्ट्र से हस्तक्षेप की मांग करता है.
लेबनान के भीतर स्थिति और जटिल इसलिए है क्योंकि हिजबुल्लह सिर्फ एक सैन्य संगठन नहीं बल्कि एक राजनीतिक ताकत भी है, जिसका सरकार और समाज में प्रभाव है. यही वजह है कि लेबनान की आधिकारिक विदेश नीति और घरेलू राजनीतिक स्थिति हमेशा एक जैसी नहीं होती.
लेबनान लगातार अंतरराष्ट्रीय समुदाय से सीजफायर की मांग करता रहा है और कहता है कि युद्ध से सबसे ज्यादा नुकसान आम नागरिकों को होता है. वहां की अर्थव्यवस्था पहले से ही संकट में है, ऐसे में लंबे संघर्ष से स्थिति और खराब हो जाती है. इसलिए लेबनान का मुख्य फोकस तनाव कम करना और कूटनीतिक समाधान की ओर बढ़ना है.
भारत इस मसले को कैसे हैंडल करेगा?
भारत की विदेश नीति हमेशा से “रणनीतिक संतुलन” और “गैर-हस्तक्षेप” पर आधारित रही है. भारत दोनों पक्षों से सीधे टकराव की बजाय शांति और बातचीत के जरिए समाधान की वकालत करता है. इजरायल भारत का महत्वपूर्ण रक्षा और तकनीकी साझेदार है, वहीं भारत के लेबनान और अरब देशों के साथ भी मजबूत संबंध हैं.
इसी वजह से भारत इस संघर्ष पर बहुत सावधानी से प्रतिक्रिया देता है. भारत आमतौर पर संयुक्त राष्ट्र के मंच पर सीजफायर, मानवीय सहायता और नागरिक सुरक्षा की बात करता है. भारत का रुख यह रहता है कि किसी भी तरह की हिंसा में निर्दोष नागरिकों की जान जाना चिंता का विषय है और बातचीत ही एकमात्र स्थायी समाधान है.
जहां तक राजनीतिक बयानों का सवाल है, भारत सरकार अक्सर ऐसे मुद्दों पर सीधे पक्ष लेने से बचती है, ताकि उसकी बहु-ध्रुवीय विदेश नीति संतुलित बनी रहे. भारत इस पूरे क्षेत्र में स्थिरता चाहता है क्योंकि पश्चिम एशिया में अस्थिरता का असर ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक व्यापार पर भी पड़ता है.