UP-Bihar और दिल्ली जैसा क्यों नहीं तमिलनाडु? ‘हिंदू-मुस्लिम’ नहीं, ‘तेलुगु बनाम हिंदी’ पर क्यों तय होता है चुनाव?
तमिलनाडु की राजनीति UP-Bihar और दिल्ली से अलग क्यों है? यहां चुनाव धर्म नहीं बल्कि ‘तमिल बनाम हिंदी’ और पहचान की राजनीति पर क्यों तय होते हैं, जानिए पूरा विश्लेषण.
भारत की राजनीति को अक्सर ‘हिंदू बनाम मुस्लिम’ या जातीय समीकरणों के नजरिए से देखा जाता है. खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में, लेकिन तमिलनाडु में तस्वीर बिल्कुल अलग है. यहां चुनावी मुद्दे धर्म नहीं, बल्कि भाषा, क्षेत्रीय पहचान और सांस्कृतिक गौरव के इर्द-गिर्द घूमते हैं. द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और आल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम जैसी पार्टियां दशकों से इसी मॉडल पर चुनाव जीतती रही हैं. तमिल राजनीति में आज भी इसका असर देखने को मिलता है.
द्रविड़ आंदोलन है तमिलनाडु की राजनीति का असली DNA?
दरअसल, तमिलनाडु सहित दक्षिण भारत की राजनीति को उत्तर भारतीय राज्यों के सियासी चश्मे से नहीं देखा जा सकता है, ना ही इस तरीके से उसे समझा जा सकता है. तमिलनाडु की राजनीति को समझने के लिए द्रविड़ आंदोलन को समझना जरूरी है. 20वीं सदी में शुरू हुआ यह आंदोलन उत्तर भारतीय प्रभुत्व, ब्राह्मण वर्चस्व और हिंदी थोपने के खिलाफ था. इसी आंदोलन से DMK और AIADMK जैसी पार्टियों का जन्म हुआ. इसने राजनीति की दिशा बदल दी. धर्म की जगह पहचान (Identity Politics) को केंद्र में ला दिया. यही वजह है कि तमिलनाडु में सत्ता के दो ही वैचारिक केंद्र हैं. यही वजह है कि डीएमके और एआईएडीएमके के नेता एमके स्टालिन और पलानीसामी के बीच इस बार भी टक्कर है.
क्या ‘हिंदी बनाम तमिल’ सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा है?
यहां हिंदी विरोध केवल भाषा का सवाल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़ा विषय है. 1960 के दशक के एंटी-हिंदी आंदोलनों ने राज्य की राजनीति को स्थायी रूप से प्रभावित किया. आज भी 'हिंदी थोपने' का मुद्दा चुनावों में उठता है. सीएम एमके स्टालिन जैसे नेता इसे खुलकर उठाते हैं. जहां उत्तर भारत में धर्म पहचान बनता है, वहीं तमिलनाडु में भाषा पहचान की धुरी है.
क्या यहां जाति की राजनीति नहीं होती?
तमिलनाडु में जाति का प्रभाव मौजूद है, लेकिन इसका स्वरूप अलग है. यहां ओबीसी और गैर-ब्राह्मण राजनीति पहले से मजबूत है, जिससे सामाजिक संतुलन काफी हद तक स्थापित हो चुका है. यही वजह है कि उत्तर भारत की तरह ‘हिंदू-मुस्लिम’ ध्रुवीकरण यहां ज्यादा असरदार नहीं बन पाता.
क्या वेलफेयर पॉलिटिक्स असली गेमचेंजर है?
तमिलनाडु में चुनाव जीतने का बड़ा फॉर्मूला वेलफेयर स्कीम्स हैं. जैसे मुफ्त बिजली, लैपटॉप, राशन और महिलाओं के लिए फ्री बस यात्रा. DMK और AIADMK दोनों ने इसे लगातार मजबूत किया है. इसका असर यह है कि वोटर का फोकस रोजमर्रा के फायदे पर रहता है, न कि धार्मिक मुद्दों पर.
क्या बीजेपी के लिए पांव जमाना मुश्किल है?
बीजेपी तमिलनाडु में जनाधार मजबूत करने की कोशिश कर रही है, लेकिन हिंदुत्व का नैरेटिव यहां सीमित असर ही दिखा पाया है. क्षेत्रीय पहचान ज्यादा प्रभावी है. हालांकि के. अन्नामलाई के नेतृत्व में पार्टी धीरे-धीरे अपना आधार बढ़ा रही है.
क्या UP-Bihar और तमिलनाडु की तुलना सही है?
अगर तुलना करें तो अंतर साफ दिखता है. उत्तर भारत में धर्म और जाति चुनावी केंद्र हैं, जबकि तमिलनाडु में भाषा और क्षेत्रीय पहचान. वहां धार्मिक ध्रुवीकरण असरदार होता है, यहां वेलफेयर और पहचान की राजनीति निर्णायक बनती है.
क्या ट्रेंड बदलेगा?
समय के साथ राजनीति बदलती है. शहरीकरण, युवा वोटर्स और राष्ट्रीय पार्टियों की सक्रियता तमिलनाडु की राजनीति को प्रभावित कर सकती है, लेकिन फिलहाल द्रविड़ मॉडल ही यहां सबसे प्रभावी है. दरअसल, तमिलनाडु भारत की राजनीति का एक अलग मॉडल पेश करता है, जहां चुनाव धर्म के बजाय भाषा, पहचान और क्षेत्रीय गौरव के आधार पर लड़े और जीते जाते हैं. यही कारण है कि उत्तर भारत का नैरेटिव यहां सीधे लागू नहीं होता. यहां राजनीति की असली कुंजी ‘पहचान’ है.