ईरान-इजरायल जंग में 'मौन' भारत अब क्या बोलेगा, दुश्मन चीन का दोस्त 'बेचारा' पाकिस्तान ‘समझौता-गुरु’ बन बैठा!
ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच सीजफायर हो गया, जिसका श्रेय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को दिया है. इसके बाद से भारत की तटस्थ नीति पर सवाल उठने लगे हैं. रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जेएस सोढ़ी ने कहा कि चीन-पाकिस्तान ने कूटनीतिक फायदा उठाया, जबकि भारत पीछे रह गया.
ईरान-इजरायल जंग में भारत की चुप्पी पर उठे सवाल
Iran Israel US Ceasefire Pakistan Role India Neutral Stance: कई खाड़ी देशों सहित इजरायल और अमेरिका जैसे ताकतवरों से लगातार 40 दिन अपने बलबूते दिन-रात भिड़ने के बाद भी हार न मानने वाले ईरान का लोहा दुनिया मान रही है. भारत इस जंग में अपने दो दोस्तों (इजरायल-ईरान) की खूनी भिड़ंत में 40 दिन तक खुद को खामोश रखकर हम तटस्थ हैं, का ही राग अलापता रह गया. तब तक दूसरी ओर भारत के दुश्मन पड़ोसी देशों चतुर चीन और मक्कार पाकिस्तान ने अमेरिका से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से हाथ मिलाकर ही क्यों न सही, ईरान-अमेरिका और इजराइल की इस खूनी जंग में ‘सीजफायर’ के श्रेय का सेहरा अपने सिर बंधवा लिया. नतीजा सामने है कि, भारत उस पाकिस्तान के इस हैरतअंगेज कदम को जमाने के सामने अपनी चुंधियाई आंखों से ताकता ही रह गया जो पाकिस्तान दिन-रात भारत की नींद और चैन का दुश्मन बना रहता है.”
ऐसे में सवाल पैदा होना लाजिमी है कि आइंदा क्या ईरान की तरह अगर भारत को आज जंग में किसी मोर्चे पर मुकाबला करना हो तो क्या हम 40 दिन लगातार ईरान की सी टक्कर देने की कुव्वत या लाव-लश्कर अपने फौजी बेड़े में आज के हालातों में रखते हैं? भारत के परिप्रेक्ष्य में जियोपॉलिटिक्स, अंतरराष्ट्रीय विदेश और कूटनीति, सैन्य रक्षा से जुड़े इन्हीं तमाम अहम सवालों के जवाब के लिए स्टेट मिरर हिंदी के एडिटर इनवेस्टीगेशन ने एक्सक्लूसिव बात की भारतीय थलसेना के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी से.
क्यों, कैसे और कहां चूक गया भारत?
पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल जसिंदर सिंह सोढ़ी ने कहा, “जहां तक ईरान, इजरायल अमेरिका के साथ 40 दिन लगातार चली खूनी जंग में भारत की भूमिका की बात है तो, इसमें खामोशी रहकर और खुद को तटस्थ रखने की दलील देकर एक कोने में खड़ा कर लेने के चलते हम (भारत), जियोपॉलिटिक्स, अंतरराष्ट्रीय विदेश और कूटनीतिक नजर से बुरी तरह से पिछड़ गए हैं. जाने-अनजाने होने वाली ऐसी चूक या गलतियां किसी भी विकासशील देश के विदेश और कूटनीतिक भविष्य के लिए घातक या कहूं कि दीमक से भी ज्यादा खतरनाक सिद्ध होती हैं. आज नहीं तो कल हमारे सामने आज इस मामले में बरती गई खामोशी का खामियाजा भुगतने के लिए तैयार रहना होगा.”
क्या भारत की खामोशी दुश्मन की जीत बनी?
ईरान-इजरायल-अमेरिका की त्रिकोणीय जंग में 'तटस्थता' के नाम पर भारत की खामोशी को क्या मौकापरस्त हमारे दुश्मन देशों चीन और पाकिस्तान ने आपदा को अवसर में नहीं बदल डाला है? स्टेट मिरर हिंदी के सवाल के जवाब में भारतीय फौज के पूर्व ले. कर्नल सोढ़ी बोले, “हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े लिखे को फारसी क्या? जो जमाने को दिखाई दे रहा है वही मैं भी देख रहा हूं. हम माने या न मानें लेकिन भारत की खामोशी का फायदा चीन-पाकिस्तान भरपूर उठा चुके हैं... और तो और पाकिस्तान ने अगर भारत की खामोशी का फायदा उठाया तो उसका गिला-शिकवा क्या. वह तो खुले तौर पर भारत का दुश्मन है."
चीन भी कैसे पीछे नहीं रहा?
र्व ले. कर्नल ने कहा, "दुनिया भर में सबसे ज्यादा टैरिफ भारत के ऊपर लादने वाले अमेरिका को औकात में लाने के लिए बीते साल हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक सम्मेलन में हिस्सा लेने खुद चीन गए थे. वहां मोदी और पुतिन की दोस्ती देखकर जिस तरह से अमेरिका तड़पा था, वह तड़पन या उस जलन का अहसास तो अमेरिका और ट्रंप को ही हुआ होगा."
गरीब-पिट्ठू पाकिस्तान ने कैसे गड़बड़ की?
जेएस सोढ़ी ने कहा, "अब सोचिए कि वही चीन पाकिस्तान के साथ मिलकर आज अमेरिका को सेफ-जोन देने के लिए ईरान अमेरिका के बीच सीजफायर की टेबल पर बैठकर समझौता कराने में कामयाब हो गया. आपदा को अवसर में बदलने की जो मिसाल चीन और पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ दांव खेलकर इस्तेमाल की है. असल में अंतरराष्ट्रीय विदेश और कूटनीति व जियोपॉलिटिक्स तो यही है. दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त. जिस पाकिस्तान को हम हमेशा गरीब, अमेरिका का पिट्ठू, अमेरिका और चीन के हाथों की कठपुतली, गरीब और भिखमंगा नाम से कहते और बुलाते नहीं थकते हैं, मौका मिलने पर उसी पाकिस्तान ने चीन के साथ मिलकर ईरान-अमेरिका के बीच ‘सीजफायर’ का सेहरा अपने सिर बांधकर, सौ सुनार की एक लुहार की, वाली कहावत जमाने में चरितार्थ कर दी. संभव है कि मेरी यह सच बात बहुतों को आसानी से हजम न हो, मगर दुनिया जो खुली आंखों से देख रही है. सच तो यही है."
क्या हम 40 दिन जंग लड़ सकते हैं?
स्टेट मिरर हिंदी के एक सवाल के जवाब में भारतीय थलसेना के पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल जे एस सोढ़ी कहते हैं, “ईरान-इजरायल अमेरिका के बीच जो हो रहा है, वह समाज और वैश्विक स्तर पर शांति के लिए बेशक घातक है. ऐसे में सुरक्षित तो भारत भी खुद को न समझे. जहां तक सवाल है कि क्या ईरान की तरह ही अगर भारत को आज किसी दुश्मन से लगातार 40 दिन तक जंग लड़नी पड़ जाए तो, क्या भारत के पास इतना लाव-लश्कर है? इस सवाल के जवाब में मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि भारत को अपना रक्षा बजट बढ़ाना चाहिए. फाइटर जैट्स (लड़ाकू विमान) तीव्र गति से आयात या अपने ही देश में निर्मित कराए जाने का बहुत तेजी से इंतजाम कराया जाना चाहिए. साल 2030 के बाद भारत पर मंडराते 3.5 फ्रंट वॉर को ध्यान में रखते हुए भारतीय फौज को आरक्षित बजट इस्तेमाल करने में लचीलापन लाना चाहिए."
भारतीय फौज क्यों पिछड़ सकती है?
पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल जे एस सोढ़ी ने कहा, "सैन्य बजट के इस्तेमाल पर लगे तमाम बैरिकेट्स को हटाकर, बजट के इस्तेमाल की प्रक्रिया को तत्काल बेहद आसान करना होगा, ताकि देश की सरकार द्वारा आवंटित सालाना रक्षा बजट की बची हुई भारी-भरकम रकम को अगले वित्तीय वर्ष में जोड़ने के बजाए, चालू वित्तीय वर्ष में ही इस्तेमाल करने की सहूलियत मिल सके. जब तक यह बातें गंभीरता से अमल में नहीं लाई जाएंगी तब तक जैसा आज चल रहा है वैसा ही आगे भी चलता रहेगा. किसी भी देश की सेना को सालाना मोटा बजट मिलने के साथ साथ उसके चालू वर्ष में ही इस्तेमाल करने की सुविधा भी तो मिले. जोकि भारतीय फौज में नहीं है.”